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-दुष्यंत कुमार
🌺 कवि परिचय : दुष्यंत कुमार (संक्षेप में)
दुष्यंत कुमार आधुनिक हिंदी साहित्य के एक सशक्त एवं प्रगतिशील ग़ज़लकार थे, जिन्होंने समाज की वास्तविकता को बेबाक आवाज़ दी। उनका जन्म 1 सितंबर 1933 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर ज़िले के राजपुर नवादा गाँव में हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा गाँव की पाठशाला में तथा उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की।
उन्होंने आकाशवाणी, संस्कृति विभाग और साहित्य जगत में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उनकी प्रमुख कृतियाँ—
साये में धूप, सूर्य का स्वागत, जलते हुए वन का बसंत, एक कंठ विषपायी, छोटे-छोटे सवाल, आँगन में एक वृक्ष आदि प्रसिद्ध हैं।
आपातकाल काल में उनकी लेखनी और भी तीक्ष्ण हो गई, जिससे उन्हें अपार लोकप्रियता मिली।
30 दिसंबर 1975 को मात्र 42 वर्ष की आयु में उनका देहावसान हो गया।
🌼 कविता का सारांश (कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हरेक घर के लिए)
यह कविता समाज में व्याप्त असमानता, भ्रष्ट व्यवस्था, टूटी उम्मीदों और संघर्षशील मनुष्य की व्यथा को प्रकट करती है।
कवि कहता है कि कभी यह सपना था कि हर घर में उजाला होगा, हर व्यक्ति सुख पाएगा, लेकिन वास्तविकता में तो शहर तक में चिराग़ उपलब्ध नहीं।
लोगों की हालत यह है कि कपड़ा न हो तो पांवों से पेट बाँधकर चल पड़ते हैं — अर्थात जीवन की कठिनाइयों से जूझते रहते हैं।
शासन और व्यवस्था सच बोलने वाले कवियों की आवाज़ दबाना चाहती है, क्योंकि उन्हें परिवर्तन से डर लगता है।
अंत में कवि कहता है कि यदि जीना है तो अपने बगीचे में फूलों के नीचे जिया जाए और यदि मरना हो तो दूसरों की गलियों में भी अपने फूलों की खुशबू छोड़ जाई जाए।
🌿 कविता की व्याख्या (सरल एवं परीक्षा-योग्य)
कवि उन वादों पर कटाक्ष करता है जो जनता से किए जाते हैं—हर घर में खुशहाली और उजाला लाने का, पर वास्तव में व्यवस्था आम लोगों को मूलभूत सुविधाएँ तक नहीं दे पा रही।

दुष्यंत कुमार
कवि समाज की विडंबना दिखाता है कि जहाँ पेड़ों की छाया शीतल होनी चाहिए, वहाँ धूप चुभने लगती है — यह प्रतीक है कि अच्छे वातावरण में भी वास्तविक सुख नहीं मिलता।
गरीबी इतनी गहरी है कि लोग तन ढकने की चिंता छोड़, किसी तरह यात्रा और जीवन काटते हैं।
कवि यह भी कहता है कि चाहे भगवान न मिले, लेकिन मनुष्य का सुंदर सपना और आशा ही उसे जीने का सहारा है।
शासक अपने तंत्र को सुरक्षित रखने के लिए कवि की आवाज़ बंद कर देना चाहते हैं, क्योंकि कविता में समाज को बदलने की ताकत होती है।
अंत में कवि कहता है कि जीना हो तो अपने सपनों की छाँव में जियो और मरना हो तो अपनी खुशबू दूसरों की गलियों में फैलाकर जाओ — अर्थात् जीवन को उद्देश्यपूर्ण और सार्थक बनाओ।
🌟 One Learning Question (एक सीख देने वाला प्रश्न)
प्रश्न: इस कविता से हमें सबसे बड़ी सीख क्या मिलती है?
उत्तर: कविता हमें सिखाती है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी कठोर क्यों न हों, हमें अपनी आवाज़, अपने सपनों और आशाओं को जीवित रखना चाहिए। सामाजिक अन्याय के विरुद्ध बोलना भी जरूरी है।
🎯 2 अंक के प्रश्न-उत्तर (2 Marks Questions)
1. ‘चिराग़ाँ’ का प्रतीकात्मक अर्थ क्या है?
उत्तर: ‘चिराग़ाँ’ प्रकाश, आशा, खुशहाली और समाज में समानता के प्रतीक के रूप में प्रयुक्त हुआ है।
2. कवि ने ‘यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है’ क्यों कहा?
उत्तर: कवि दिखाना चाहता है कि जहाँ आराम और शांति मिलनी चाहिए, वहाँ भी असुविधा और पीड़ा महसूस होती है—अर्थात् व्यवस्था पूरी तरह असंतुलित हो चुकी है।
3. कविता में कवि किस बात से व्यथित है?
उत्तर: कवि समाज में फैलती असमानता, टूटी उम्मीदों, भ्रष्ट व्यवस्था और गरीबों की कठिन परिस्थितियों से दुखी है।
🌻 5 अंक के प्रश्न-उत्तर (5 Marks Questions)
प्रश्न: कविता “कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हरेक घर के लिए” में सामाजिक विसंगतियों का चित्रण कीजिए।
उत्तर (5 अंक):
कवि दुष्यंत कुमार इस कविता में समाज की गंभीर समस्याओं को उजागर करते हैं। वह बताते हैं कि शासन द्वारा किए गए वादे मात्र दिखावा होते हैं; हर घर में उजाला लाने की बात तो दूर, शहर तक में चिराग़ उपलब्ध नहीं।
गरीबी और लाचारी इतनी है कि लोग कपड़े न होने पर भी यात्रा जारी रखते हैं।
प्राकृतिक वातावरण तक अपना स्वभाव खो चुका है — जहाँ पेड़ों की छाया सुखद होनी चाहिए, वहाँ धूप चुभती है।
कवि यह भी बताता है कि व्यवस्था परिवर्तन का विरोध करती है और कवियों की आवाज़ दबा देती है।
समाज में निराशा होते हुए भी कवि आशा बनाए रखने की बात करता है। इस प्रकार यह कविता सामाजिक विषमता और व्यवस्थागत विफलता का सशक्त चित्रण है।
🌺 10 अंक का प्रश्न-उत्तर (10 Marks Question)
प्रश्न (10 अंक): दुष्यंत कुमार की कविता “कहाँ तो तय था चिराग़ाँ हरेक घर के लिए” का भावार्थ विस्तार से लिखिए तथा बताइए कि यह कविता आज के समाज से किस प्रकार जुड़ी है।
उत्तर (10 अंक):
यह कविता समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, असमानता और टूटे हुए राजनीतिक वादों का तीखा व्यंग्य प्रस्तुत करती है। कवि कहता है कि कभी यह तय हुआ था कि हर घर में उजाला पहुँचेगा, हर व्यक्ति को खुशहाली मिलेगी, लेकिन वास्तविकता बिल्कुल उलट है—शहर तक में लोग मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।
पेड़ों की छाया में धूप लगना व्यवस्था की नाकामी का प्रतीक है। गरीबी का ऐसा रूप है कि लोग तन ढकने की चिंता छोड़ जीवन की कठिन यात्रा जारी रखते हैं।
कवि यह भी इंगित करता है कि सत्ता को परिवर्तन से भय है, इसलिए वह कवियों की आवाज़ पर नियंत्रण करना चाहती है। इससे समाज में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित हो जाती है।
इन सब कठिनाइयों के बीच भी कवि मनुष्य के सपनों और उनकी सुंदरता को महत्वपूर्ण मानता है। मनुष्य अपने सपनों और उम्मीदों के सहारे जीवन को अर्थपूर्ण बनाता है।
अंतिम पंक्तियों में कवि जीवन का सार बताता है—यदि जियो तो अपने सपनों के बगीचे में जियो और यदि मरो, तो अपनी खुशबू दूसरों की गलियों में भी छोड़ जाओ।
यह कविता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, क्योंकि आज भी समाज में असमानता, राजनीतिक वादाखिलाफी, गरीबी और व्यवस्था की कमजोरियाँ दिखाई देती हैं। इसीलिए यह ग़ज़ल सामाजिक चेतना की अमर आवाज़ बनकर आज भी मार्गदर्शन करती है।
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