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केदारनाथ अग्रवाल
✅ कविता की व्याख्या (Vyakhiya)
कविता में कवि ने बसंत ऋतु की हवा को मानवीय रूप देकर प्रस्तुत किया है। बसंती हवा स्वयं को “बड़ी मस्तमौला, निडर और बेफिक्र” बताती है। उसका कोई घर-बार नहीं, कोई बंधन नहीं—वह पूरी तरह स्वतंत्र है।
जहाँ हवा चलती है, वहाँ जीवन की नई चेतना फैल जाती है। पेड़-पौधे लहराने लगते हैं, नदियाँ गुनगुनाने लगती हैं, खेतों में हरियाली मुस्कुराने लगती है।
हवा का स्वभाव शरारती और चुलबुला है—वह पेड़ों को हिलाती है, पथिक को छेड़ती है, फसलों को नचाती है और प्रकृति में अपार आनंद भर देती है।
अंत में हवा की मस्ती इतनी बढ़ जाती है कि पूरी प्रकृति—धरती, धूप और खेत—सब मिलकर हँस उठते हैं।
कवि का संदेश है कि प्रकृति में जीवन, आनंद और उल्लास बसंत की हवा की तरह हमेशा प्रवाहित रहता है।
✅ One Liner Question (1 अंक) with Answer
प्रश्न 1. ‘बसंती हवा’ कविता के कवि कौन हैं?
उत्तर: केदारनाथ अग्रवाल।
प्रश्न 2. केदारनाथ अग्रवाल किस काव्यधारा से जुड़े थे?
उत्तर: प्रगतिशील काव्यधारा।
प्रश्न 3. ‘अपूर्वा’ के लिए केदारनाथ जी को कौन-सा पुरस्कार मिला?
उत्तर: साहित्य अकादमी पुरस्कार (1986)।
प्रश्न 4. बसंती हवा अपने स्वभाव को कैसा बताती है?
उत्तर: बावली, मस्तमौला और निडर।
✅ 2 Marks Question with Answers
प्रश्न 1. बसंती हवा को ‘मस्तमौला’ क्यों कहा गया है?
उत्तर:
कवि ने बसंती हवा को मस्तमौला इसलिए कहा है क्योंकि वह पूरी तरह स्वतंत्र है। वह किसी बंधन, उद्देश्य या चिंता से मुक्त होकर जहाँ चाहती है, वहाँ घूमती है और प्रकृति में आनंद भर देती है।
प्रश्न 2. कविता में बसंती हवा ने किन-किन स्थानों का भ्रमण किया है?
उत्तर:
बसंती हवा शहर, गाँव, बस्ती, नदी, रेत, निर्जन स्थानों, खेतों और पोखरों से होकर गुजरती है। वह प्रकृति के हर हिस्से में जीवन और चंचलता भरती है।
प्रश्न 3. हवा के चलने से खेतों में कैसा दृश्य उत्पन्न होता है?
उत्तर:
हवा के चलने से गेहूँ और सरसों के खेत लहराने लगते हैं, फसलें झूमने लगती हैं और पूरा वातावरण आनंद से भर जाता है।
✅ 5 Marks Question with Answer
प्रश्न: बसंती हवा के स्वभाव और क्रियाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बसंती हवा का स्वभाव अत्यंत चंचल, निडर और मस्तमौला है। वह कहती है कि उसका कोई घर-बार नहीं और वह पूरी तरह स्वतंत्र है।
वह जहाँ चाहती है, स्वतंत्र रूप से घूमती है। कविता में हवा महुए और आम के पेड़ों को हिलाती है, गेहूँ के खेतों में लहरें दौड़ाती है, अलसी की कलसी को गिराने की कोशिश करती है, सरसों को झुलाने का प्रयास करती है और अरहर को शरमा देती है।
हवा की शरारत पथिक पर भी दिखाई देती है, जिसे वह हल्का-सा धक्का देती है। उसकी मस्ती से पूरी प्रकृति हँसने लगती है। इस प्रकार बसंती हवा प्रकृति में जीवन, उल्लास और चंचलता का प्रतीक बन कर उभरती है।
✅ 10 Marks Question with Answer (लंबा उत्तर – परीक्षा के लिए 100% उपयोगी)
प्रश्न: ‘बसंती हवा’ कविता में केदारनाथ अग्रवाल ने किस प्रकार बसंत ऋतु की हवा को मानवीय रूप में प्रस्तुत किया है? विस्तार से समझाइए।
उत्तर:
‘बसंती हवा’ कविता में केदारनाथ अग्रवाल ने बसंत ऋतु की हवा को एक चंचल, निडर, मस्तमौला और स्वतंत्र स्त्री के रूप में चित्रित किया है। हवा स्वयं कहती है कि वह अनोखी है, बेफिक्र है और किसी भी प्रकार के बंधन या चिंता में नहीं रहती। उसका कोई घर-बार, प्रेमी या दुश्मन नहीं—वह स्वतंत्र रूप से हर दिशा में घूमती रहती है।
कवि ने हवा की गति और मस्ती को बड़े ही सुंदर और जीवंत रूप में प्रस्तुत किया है। बसंती हवा गाँव-शहर, नदी-रेत, खेत-खलिहानों और बागों से होकर गुजरती है। वह महुए और आम के पेड़ों को झकझोरती है, गेहूँ के खेतों में अनगिनत लहरें दौड़ाती है और अलसी-सरसों जैसे पौधों को झुलाने की कोशिश करती है।
हवा का चुलबुला स्वभाव पथिक के साथ भी दिखाई देता है—वह उसे हल्का-सा ढकेलकर शरारत करती है और स्वयं भी हँसती है। उसकी इस मस्ती से खेत, धूप और वातावरण भी हँसने लगते हैं।
कवि का उद्देश्य यह दिखाना है कि बसंत की हवा केवल प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि जीवन में उत्साह, आनंद और नई ऊर्जा का प्रतीक है। बसंती हवा प्रकृति में खुशियाँ बिखेरती है और संसार को नवजीवन से भर देती है।
इस प्रकार कविता बसंत ऋतु की सुंदरता और जीवंतता का अनोखा चित्रण प्रस्तुत करती है।
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