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🌟 भीष्म साहनी – लेखक परिचय (सारांश)
भीष्म साहनी (1915–2003) आधुनिक हिंदी साहित्य के एक प्रतिष्ठित कहानीकार, उपन्यासकार और नाटककार थे। इनका जन्म 8 अगस्त 1915 को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में हुआ। उनके बड़े भाई सुप्रसिद्ध अभिनेता बलराज साहनी थे। भीष्म साहनी ने अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. किया तथा 1958 में पंजाब विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. उपाधि प्राप्त की।
उन्होंने ‘नई कहानियाँ’ पत्रिका का संपादन किया और प्रगतिशील लेखक संघ तथा एफ्रो-एशियाई लेखक संघ से जुड़े रहे। उनकी ‘तमस’ कृति पर प्रसिद्ध टेलीफिल्म भी बनी। ‘कुन्तो’, ‘बसंती’, ‘झरोखे’ जैसे उपन्यास तथा ‘भाग्य रेखा’, ‘वांगन’ जैसी कहानी-संग्रह उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। नाटक ‘कबीरा खड़ा बाज़ार में’ और आत्मकथा ‘बलराज माई ब्रदर’ भी चर्चित हैं।
11 जुलाई 2003 को दिल्ली में उनका निधन हुआ।
🌟 ‘भाग्य रेखा’ – कहानी का सारांश
यह कहानी कनॉट सर्कस, नई दिल्ली के वातावरण में घटती है, जहाँ एक दमे का रोगी (क्षय रोगी) बेरोजगार मज़दूर, खाकी कपड़े पहने धूप से बचने के लिए पेड़ की छाया में बैठा है। उसकी तीन उंगलियाँ मशीन में कट चुकी हैं, इसलिए वह कोई रोजगार नहीं पा रहा।
धीरे-धीरे बातचीत में वह एक ज्योतिषी का हाथ देखता है। ज्योतिषी उसकी कटी उँगलियों वाली हथेली में “धन लाभ” की झूठी उम्मीद दिखाता है। लेकिन जब सच्चाई पूछी जाती है, तो ज्योतिषी बताता है कि उसकी भाग्य रेखा ही नहीं है।
इसी बीच मज़दूरों का विशाल जुलूस निकलता है — मई दिवस का जुलूस। दमे का रोगी उस जुलूस को देख धीरे-धीरे मुस्कराने लगता है। उसे महसूस होता है कि असली भाग्य-रेखा किसी की हथेली में नहीं, बल्कि संघर्ष और एकता में लिखी होती है।
अंत में वह अपनी हथेली फिर ज्योतिषी को दिखाकर कहता है—
“फिर देख हथेली साले, तू कैसे कहता है कि भाग्य रेखा कमजोर है?”
यह संवाद यह साबित करता है कि उसका भाग्य उसकी हिम्मत, संघर्ष और मजदूरों की शक्ति में है।
🌟 व्याख्या (Vyakya)
कहानी में लेखक ने मजदूर वर्ग के संघर्ष, बेरोजगारी और समाज की कठोर वास्तविकताओं को दिखाया है। भाग्य बताने वाले लोग झूठी उम्मीदें देते हैं, जबकि असली भाग्य-रेखा मेहनत, एकजुटता और संघर्ष में छिपी होती है। मई दिवस के जुलूस को देखकर मज़दूर को एहसास होता है कि ताकत उसकी हथेली की रेखाओं में नहीं, बल्कि उसके साहस में है। कहानी पूँजीवाद, शोषण और गरीबी की मार्मिक स्थिति को उजागर करती है।
🌟 1 अंक का प्रश्न (One Liner Question with Answer)
प्र. ‘भाग्य रेखा’ कहानी के लेखक कौन हैं?
उत्तर: भीष्म साहनी।
🌟 2 अंक के प्रश्न–उत्तर (2 Marks Questions)
प्र1. दमे के रोगी की उँगलियाँ कैसे कटीं?
उत्तर: वह कालका वर्कशॉप में काम करता था। मशीन में दुर्घटना के कारण उसके दाएँ हाथ की तीन उंगलियाँ कट गईं।
प्र2. ज्योतिषी दमे के रोगी की हथेली देखकर क्या कहता है?
उत्तर: वह पहले धन प्राप्ति की मीठी बातें करता है, फिर अंत में कहता है कि उसकी भाग्य रेखा ही नहीं है।
🌟 5 अंक का प्रश्न–उत्तर (Long Answer – 5 Marks)
प्र. ‘भाग्य रेखा’ कहानी मजदूर वर्ग की पीड़ा को कैसे प्रस्तुत करती है? समझाइए।
उत्तर:
कहानी मजदूर वर्ग की दयनीय स्थिति, बेरोजगारी और शोषण को अत्यंत यथार्थ ढंग से प्रस्तुत करती है। दमे का रोगी अपने कटी उँगलियों के कारण रोजगार से वंचित हो चुका है। कोई मालिक उसे काम नहीं देता। गरीबी, बीमारी और बेबसी उसके जीवन का हिस्सा बन चुके हैं।
ज्योतिषी जैसे लोग उसकी कमजोरी का फायदा उठाकर झूठी आशाएँ देते हैं।
मई दिवस का जुलूस मजदूरों की एकता और संघर्ष की शक्ति दिखाता है। जुलूस देखकर रोगी समझता है कि उसकी असली “भाग्य रेखा” इन मेहनतकश मजदूरों के संघर्ष और सामूहिक शक्ति में ही है।
कहानी इस संदेश के साथ समाप्त होती है कि भाग्य हथेली में नहीं, बल्कि मेहनत और संघर्ष में छिपा होता है।
🌟 10 अंक का प्रश्न–उत्तर (Very Long – 10 Marks)
प्र. ‘भाग्य रेखा’ कहानी का विस्तृत विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
‘भाग्य रेखा’ नई कहानी आंदोलन की एक महत्वपूर्ण रचना है, जिसमें भीष्म साहनी ने समाज के सबसे शोषित वर्ग—मजदूरों—के जीवन का यथार्थ चित्रण किया है। कहानी का केंद्र बिंदु एक मजदूर है जो मशीन दुर्घटना के कारण अपने हाथ की तीन उंगलियाँ खो चुका है। बीमारी, गरीबी और बेरोजगारी उसके जीवन को निराशा से भर देते हैं।
कहानी में ज्योतिषी अंधविश्वास और ढोंग का प्रतीक है जो गरीबों की मजबूरी का फायदा उठाता है। वह जानता है कि गरीब व्यक्ति आशा के सहारे ही जीता है, इसलिए वह मीठी बातें करके उनका शोषण करता है।
कहानी का turning point मई दिवस का मजदूर जुलूस है। जुलूस मजदूर वर्ग की शक्ति, एकता, संघर्ष और सामूहिक चेतना को दर्शाता है।
जुलूस देखकर दमे का रोगी समझ जाता है कि उसकी भाग्य रेखा उसकी हथेली में नहीं, बल्कि संघर्ष में है। वह ज्योतिषी से कहता है—
“फिर देख हथेली, साले, तू कैसे कहता है कि भाग्य रेखा कमजोर है?”
यह पंक्ति कहानी का मूल संदेश देती है कि किसी का भाग्य सितारे या रेखाएँ नहीं बनातीं, बल्कि उसकी हिम्मत, मेहनत और संघर्ष बनाते हैं।
कहानी की भाषा सरल, सहज और संवादप्रधान है, जो पाठक को सीधे पात्र से जोड़ देती है। अंत में लेखक ने मजदूर वर्ग की पीड़ा और संघर्ष की आशा को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है।
इस प्रकार ‘भाग्य रेखा’ एक सामाजिक, यथार्थवादी और चेतनावर्धक कहानी है।
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