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विनय के पद
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Table of Contents

विनय के पद

🔶 विनय के पद का कवि का जीवन परिचय :

गोस्वामी तुलसीदास गोस्वामी तुलसीदास (सन् 1532–1623 ई.) हिंदी साहित्य के महान भक्ति कवि थे। वे रामभक्ति शाखा के सगुणोपासक कवि माने जाते हैं। उनका जन्म संवत् 1589 विक्रम (1532 ई.) में उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले के राजापुर ग्राम में हुआ था। वे सरयूपारीय ब्राह्मण थे।

उनके पिता का नाम आत्माराम दूबे और माता का नाम हुलसी था। बचपन में उनका नाम रामबोला था। अभुक्त मूल नक्षत्र में जन्म होने के कारण माता-पिता ने उनका त्याग कर दिया। बाद में मुनिया नामक दासी ने उनका पालन-पोषण किया, किंतु उसके निधन के बाद तुलसीदास जी दर-दर भटकने लगे।

संयोगवश उनकी भेंट स्वामी नरहरिदास जी से हुई, जिन्होंने उन्हें रामकथा और भक्ति मार्ग की शिक्षा दी। बाद में तुलसीदास जी काशी गए और वहाँ धार्मिक शास्त्रों का अध्ययन किया। उनका विवाह रत्नावली से हुआ, परंतु पत्नी के उपदेश से उनके जीवन में बड़ा परिवर्तन आया और वे गृहत्याग कर रामभक्ति में लीन हो गए।

उन्होंने रामचरितमानस जैसे महान ग्रंथ की रचना की। संवत् 1680 वि. (1623 ई.) में गंगा तट पर उनका देहावसान हुआ।


🔶 तुलसीदास की प्रमुख कृतियाँ

रामचरितमानस, विनय पत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली, बरवै रामायण, वैराग्य संदीपनी, जानकी मंगल, पार्वती मंगल, रामलला नहछू आदि।


🔶 “विनय के पद” का भावार्थ / व्याख्या

(१) ऐसी मूढ़ता या मन की। परिहरि राम-भगति-सुरसरिता, आस करत ओसकन की ।। धूम-समूह निरखि चातक ज्यों, तृषित जानि मति घन की। नहिं तहँ सीतलता न बारि, पुनि हानि होत लोचन की ।। ज्यों गच-काँच बिलोकि सेन जड़, छाँह आपने तन की। टूटत अति आतुर अहार-बस, छति बिसारि आनन की ।। कहँ लों कहाँ कुचाल कृपानिधि, जानत हौ गति जन की। तुलसिदास प्रभु हरहु दुसह दुख, करहु लाज निजपन की ।।

 व्याख्या:-

इस पद में गोस्वामी तुलसीदास मानव मन की मूर्खता, भ्रम और सांसारिक मोह को उजागर करते हुए रामभक्ति की महत्ता को स्पष्ट करते हैं। कवि ईश्वर के प्रति विनय भाव से प्रार्थना करता है और मनुष्य की गलत प्रवृत्तियों पर करुण दृष्टि डालता है।

कवि कहते हैं कि यह मनुष्य के मन की सबसे बड़ी मूढ़ता है कि वह राम-भक्ति रूपी पवित्र गंगा को छोड़कर तुच्छ और क्षणिक वस्तुओं की आशा करता है। यहाँ “राम-भगति-सुरसरिता” से तात्पर्य है—रामभक्ति, जो जीवन को पवित्र, शीतल और सुखमय बना देती है। इसके विपरीत मनुष्य संसार के छोटे-छोटे सुखों (ओस की बूंदों) की कामना करता है, जो थोड़ी देर में नष्ट हो जाते हैं।

इसके बाद कवि चातक पक्षी का उदाहरण देते हैं। चातक पक्षी बादलों को देखकर यह समझ लेता है कि अब वर्षा होगी और उसकी प्यास बुझ जाएगी, लेकिन कई बार बादल गरजते तो हैं, पर वर्षा नहीं करते। न वहाँ ठंडक मिलती है, न पानी, उल्टे उसकी आँखों को हानि होती है। इसी प्रकार मनुष्य भी सांसारिक साधनों को देखकर सुख की आशा करता है, लेकिन अंत में उसे केवल निराशा और दुःख ही प्राप्त होता है।

अगले उदाहरण में कवि कहते हैं कि जैसे कोई मूर्ख पशु या व्यक्ति काँच को देखकर उसे रत्न समझ लेता है और उसी में अपने शरीर की छाया देखकर धोखा खा जाता है, वैसे ही मनुष्य भी मिथ्या आडंबर और बाहरी चमक-दमक को वास्तविक सुख समझ बैठता है। वह अपने वास्तविक हित को भूलकर क्षणिक सुखों के पीछे दौड़ता रहता है।

कवि आगे कहते हैं कि जैसे कोई अत्यधिक भूखा व्यक्ति भोजन के लोभ में टूटे हुए बर्तन या हानिकारक वस्तु की भी परवाह नहीं करता और अपने मुँह की क्षति को भूल जाता है, उसी प्रकार मनुष्य भी इच्छाओं और लालच के वशीभूत होकर अपने जीवन को हानि पहुँचा लेता है। वह यह नहीं सोचता कि इस मार्ग का अंत दुःख और विनाश है।

अंत में तुलसीदास जी कृपानिधान प्रभु राम से विनम्र प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं—हे प्रभु! मैं कब तक इस गलत राह पर चलता रहूँगा? आप तो अपने भक्तों की स्थिति को भली-भाँति जानते हैं। कृपा करके मेरे असहनीय दुःखों को दूर कीजिए और अपनी प्रतिष्ठा (भक्त-वत्सलता) की रक्षा कीजिए।

इस प्रकार यह पद मनुष्य को यह संदेश देता है कि संसार की आशाएँ भ्रमपूर्ण हैं, केवल रामभक्ति ही सच्चा, स्थायी और शीतल सुख प्रदान कर सकती है। तुलसीदास का यह पद विनय, आत्मग्लानि और ईश्वर-कृपा की गहन भावना से परिपूर्ण है।


(२) माधव ! मोह-फाँस क्यों टूटै। बाहर कोटि उपाय करिय, अभ्यंतर ग्रंथि न छूटै ।। घृतपूरन कराह अंतरगत, ससि-प्रतिबिम्ब दिखावै। ईंधन अनल लगाय कलपसत, औटत नास न पावै ।। तरु-कोटर महँ बस बिहंग, तरु काटे मरै न जैसे। साधन करिय बिचार-हीन, मन सुद्ध होइ नहिं तैसे ।। अंतर मलिन बिषय मन अति, तन पावन करिय पखारे। मरइ न उरग अनेक जतन, बलमीकि बिविध बिधि मारे ।। तुलसीदास हरि-गुरु-करुना बिनु, बिमल बिबेक न होई। बिनु बिबेक संसार-घोर-निधि, पार न पावै कोई ।।

🔹  व्याख्या :-

इस पद में गोस्वामी तुलसीदास ने मोह-माया के बंधन, बाहरी साधनों की निष्फलता और हरि-गुरु की कृपा से प्राप्त विवेक की महत्ता को अत्यंत प्रभावशाली उदाहरणों के माध्यम से समझाया है। यह पद आत्मविश्लेषण और आध्यात्मिक चेतना से परिपूर्ण है।

कवि भगवान श्रीकृष्ण (माधव) से प्रश्न करते हुए कहते हैं कि मनुष्य का मोह-रूपी फंदा क्यों नहीं टूटता? इसका कारण यह है कि मनुष्य बाहर से तो असंख्य उपाय करता है, किंतु उसके हृदय के भीतर स्थित गाँठ (अज्ञान, अहंकार और विषय-वासना) नहीं खुलती। जब तक मन के भीतर की अशुद्धि दूर नहीं होती, तब तक बाहरी साधनों से मुक्ति संभव नहीं है।

इसके बाद कवि एक गूढ़ उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि जैसे घी से भरे कढ़ाहे के भीतर चंद्रमा का प्रतिबिंब दिखाई देता है, परंतु जब नीचे आग जलाई जाती है तो ईंधन जलने से कढ़ाहा जलता रहता है, लेकिन उसमें भरा घी नष्ट नहीं होता। आशय यह है कि बाहरी प्रयास किए जाते हैं, पर भीतर छिपे मोह और वासनाएँ जस की तस बनी रहती हैं। केवल दिखावटी साधना से मन की अशुद्धि नष्ट नहीं होती।

अगले उदाहरण में कवि कहते हैं कि जैसे किसी पेड़ के खोखले तने में रहने वाला पक्षी, पेड़ काटने पर भी तुरंत नहीं मरता, वैसे ही बिना विवेक के किए गए साधन भी मन को शुद्ध नहीं कर पाते। यदि साधना विचारहीन और विवेक-रहित हो, तो उसका कोई वास्तविक लाभ नहीं होता।

इसके बाद तुलसीदास कहते हैं कि यदि मन भीतर से अत्यंत मलिन और विषय-वासनाओं से भरा हो, तो केवल शरीर को धोकर पवित्र करने से क्या लाभ? यह वैसा ही है जैसे किसी साँप को मारने के लिए अनेक प्रयास किए जाएँ, पर वह फिर भी न मरे—जैसे महर्षि वाल्मीकि ने भी उसे मारने के लिए अनेक उपाय किए। भाव यह है कि जब तक मूल कारण (मन की अशुद्धि) समाप्त नहीं होता, तब तक समस्या बनी रहती है।

अंत में कवि अत्यंत महत्वपूर्ण निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि हरि और गुरु की कृपा के बिना निर्मल विवेक की प्राप्ति नहीं होती। और बिना विवेक के यह संसार, जो एक भयानक समुद्र के समान है, उसे कोई भी व्यक्ति पार नहीं कर सकता। विवेक ही वह दीपक है जो मनुष्य को सही और गलत का ज्ञान कराता है।


(३) अस कछु समुझि परत रघुराया। बिनु तव कृपा दयालु ! दास-हित! मोह न छूटै माया।। बाक्य-ग्यान अत्यंत निपुन, भव पार न पावै कोई। निसि गृहमध्य दीप की बातन्ह, तम निवृत्त नहिं होई। जैसे कोइ एक दीन दुखित अति, असन-हीन दुख पावै। चित्र कलपतरु कामधेनु गृह, लिखे न बिपत्ति नसाबै ।। षटरस बहु प्रकार भोजन कोउ, दिन अरु रैन बखानै। बिनु बोले संतोष-जनित सुख, खाइ सोइ पै जानै ।। जब लगि नहिं निज हृद प्रकास, अरु बिषय-आस मन माहीं। तुलसीदास तब लगि जग-जोनि भ्रमत, सपनेहुँ सुख नाहीं ।।

🔹 व्याख्या :-

इस पद में गोस्वामी तुलसीदास ने यह स्पष्ट किया है कि केवल ज्ञान, वाणी या बुद्धि की चतुराई से मोक्ष संभव नहीं है। सच्ची मुक्ति के लिए ईश्वर की कृपा, अंतःकरण की शुद्धि और आत्मबोध अनिवार्य है। कवि यहाँ भगवान श्रीराम से करुणापूर्वक विनय करते हैं।

कवि कहते हैं—हे रघुनाथ! अब मुझे यह कुछ-कुछ समझ में आने लगा है कि आपकी कृपा के बिना, हे दयालु प्रभु, आपके भक्त के हित के लिए भी मोह और माया का बंधन नहीं टूटता। मनुष्य चाहे कितना ही प्रयास क्यों न कर ले, यदि ईश्वर की अनुकम्पा न हो तो वह संसार के जाल से मुक्त नहीं हो सकता।

आगे कवि कहते हैं कि कोई व्यक्ति यदि वाक्-ज्ञान में अत्यंत निपुण भी हो, अर्थात् शास्त्रों का अच्छा वक्ता या विद्वान हो, तब भी वह संसार-सागर पार नहीं कर सकता। इसका उदाहरण देते हुए कवि कहते हैं कि जैसे रात में घर के भीतर रखे दीपक की बातों से अंधकार दूर नहीं होता। जब तक दीपक जलाया न जाए, अंधकार बना रहता है। उसी प्रकार केवल ज्ञान की चर्चा से अज्ञान दूर नहीं होता, जब तक वह हृदय में प्रकाश बनकर न उतरे।

इसके बाद कवि एक अत्यंत मार्मिक उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि जैसे कोई अत्यंत गरीब और भूखा व्यक्ति, जो भोजन के अभाव में दुःखी हो, उसके घर में यदि केवल चित्रों में बने कल्पवृक्ष या कामधेनु लिखे हों, तो क्या उसकी विपत्ति दूर हो सकती है? चित्रों से न तो भूख मिटती है, न ही दुःख समाप्त होता है। भाव यह है कि सैद्धांतिक ज्ञान व्यावहारिक अनुभव के बिना निष्फल है।

अगले उदाहरण में तुलसीदास कहते हैं कि कोई व्यक्ति यदि छह रसों वाले अनेक प्रकार के स्वादिष्ट भोजन का दिन-रात वर्णन करता रहे, परंतु स्वयं खाए नहीं, तो क्या उसे तृप्ति मिल सकती है? नहीं। भोजन खाने से जो संतोषजन्य सुख मिलता है, उसे वही जान सकता है जो वास्तव में भोजन करता है। इसी प्रकार ईश्वर-भक्ति का आनंद केवल वही अनुभव कर सकता है जो भक्ति को जीवन में उतारता है।

अंत में कवि अत्यंत महत्वपूर्ण सत्य को प्रकट करते हैं। वे कहते हैं कि जब तक मनुष्य के अपने हृदय में आत्मप्रकाश नहीं होता और जब तक उसके मन में विषयों की आस बनी रहती है, तब तक वह संसार की विभिन्न योनियों में भटकता रहता है। ऐसे व्यक्ति को स्वप्न में भी सच्चा सुख प्राप्त नहीं होता


(४) कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो। श्री रघुनाथ-कृपालु कृपा तें, संत-सुभाव गहाँगो ।। जथालाभ संतोष सदा, काहू सों कछु न चहाँगो। परहित-निरत निरंतर, मन-क्रम-बचन नेम निबहीँगो ।। परुष बचन अति दुसह स्रवन सुनि, तेहि पावक न दहौंगो। बिगत मान, सम सीतल मन, पर गुन, नहिं दोष कहीँगो ।। परिहरि देह-जनित चिंता, दुख-सुख समबुद्धि सहाँगो तुलसीदास प्रभु यहि पथ रहि, अबिचल हरि-भक्ति लहाँगो ।

🔹 व्याख्या

इस पद में गोस्वामी तुलसीदास ने संत-जीवन के आदर्श और भक्त के आचरण का सुंदर चित्र प्रस्तुत किया है। कवि ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि यदि श्रीराम की कृपा बनी रहे, तो वे जीवन भर इसी पवित्र और श्रेष्ठ जीवन-पद्धति पर चलना चाहते हैं।

कवि कहते हैं कि—हे कृपालु श्री रघुनाथ! आपकी कृपा से मैं संतों के स्वभाव को धारण कर सकूँ। संत-स्वभाव का अर्थ है—विनम्रता, संयम, करुणा और आत्मसंयम। कवि यह स्वीकार करते हैं कि यह गुण मानव में स्वयं से नहीं आते, बल्कि ईश्वर की कृपा से ही प्राप्त होते हैं।

आगे कवि कहते हैं कि वे जैसा मिले, उसी में संतोष करेंगे और किसी से कुछ भी पाने की इच्छा नहीं रखेंगे। संतोष को वे सबसे बड़ा धन मानते हैं। वे सदा परहित में लगे रहेंगे और अपने मन, कर्म और वचन—तीनों से नियमपूर्वक सदाचार का पालन करेंगे। इससे स्पष्ट होता है कि सच्ची भक्ति केवल विचारों तक सीमित नहीं, बल्कि आचरण में भी दिखाई देनी चाहिए।

इसके बाद कवि कहते हैं कि यदि कोई उन्हें कटु और कठोर वचन भी कहे, जो सुनने में अत्यंत दुःखद हों, तब भी वे उन्हें अपने हृदय में स्थान नहीं देंगे। ऐसे वचनों को वे आग के समान मानकर भी स्वयं को जलने नहीं देंगे, अर्थात् क्रोध और द्वेष से दूर रहेंगे।

कवि आगे कहते हैं कि वे अहंकार से मुक्त होकर सभी के प्रति समभाव रखेंगे। उनका मन शीतल रहेगा और वे दूसरों के गुणों को ग्रहण करेंगे, दोषों की चर्चा नहीं करेंगे। यह संत-स्वभाव की सर्वोच्च विशेषता है—दूसरों में अच्छाई देखना।

अंत में तुलसीदास कहते हैं कि वे शरीर से उत्पन्न होने वाली चिंताओं को त्याग देंगे और सुख-दुःख को समान भाव से सहन करेंगे। हे प्रभु! यदि मैं इस मार्ग पर स्थिर रहूँ, तो मुझे अडिग हरि-भक्ति प्राप्त होगी, जो जीवन का परम लक्ष्य है।


🔶विनय के पद का परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्न-उत्तर


✨ अति लघु उत्तरीय प्रश्न (1 अंक)

प्रश्न 1. तुलसीदास किस भक्ति शाखा के कवि हैं?
उत्तर: रामभक्ति शाखा के।

प्रश्न 2. तुलसीदास जी किस देवता के उपासक थे?
उत्तर: भगवान श्रीराम के।

प्रश्न 3. “राम-भगति-सुरसरिता” से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: रामभक्ति रूपी पवित्र गंगा।

प्रश्न 4. चातक पक्षी का उदाहरण किस भाव को दर्शाता है?
उत्तर: मिथ्या आशा और भ्रम को।

प्रश्न 5. तुलसीदास के अनुसार मोह-बंधन क्यों नहीं टूटता?
उत्तर: ईश्वर की कृपा और विवेक के अभाव में।

प्रश्न 6. ‘विनय के पद’ में संत-स्वभाव का एक गुण लिखिए।
उत्तर: संतोष।

प्रश्न 7. तुलसीदास के अनुसार सच्चा सुख कैसे प्राप्त होता है?
उत्तर: हरि-भक्ति से।

प्रश्न 8. तुलसीदास किस भाषा में काव्य-रचना करते थे?
उत्तर: अवधी भाषा में।


✨ लघु उत्तरीय प्रश्न (2–3 अंक)

प्रश्न 1. तुलसीदास ने रामभक्ति को “सुरसरिता” क्यों कहा है?
उत्तर: तुलसीदास ने रामभक्ति को सुरसरिता इसलिए कहा है क्योंकि यह मनुष्य के जीवन को पवित्र, शीतल और पापरहित बना देती है, जैसे गंगा नदी आत्मा को शुद्ध करती है।


प्रश्न 2. चातक पक्षी का उदाहरण देकर कवि क्या समझाना चाहते हैं?
उत्तर: चातक पक्षी बादलों को देखकर वर्षा की आशा करता है, परंतु वर्षा न होने पर भी प्रतीक्षा करता रहता है। इससे कवि मनुष्य की व्यर्थ और भ्रमपूर्ण आशाओं को दर्शाते हैं।


प्रश्न 3. बाहरी साधनों से मोह क्यों नहीं टूटता?
उत्तर: बाहरी साधन केवल दिखावटी होते हैं। जब तक मन के भीतर का अज्ञान, अहंकार और विषय-वासना समाप्त नहीं होती, तब तक मोह-बंधन नहीं टूटता।


प्रश्न 4. ‘वाक्-ज्ञान’ से संसार-सागर पार क्यों नहीं होता?
उत्तर: वाक्-ज्ञान केवल बोलने तक सीमित होता है। जब तक ज्ञान हृदय में उतरकर आचरण में न आए, तब तक उससे मुक्ति संभव नहीं होती।


प्रश्न 5. चित्रित कल्पवृक्ष और कामधेनु का उदाहरण क्या बताता है?
उत्तर: यह उदाहरण बताता है कि केवल ज्ञान या कल्पना से दुःख दूर नहीं होता। वास्तविक लाभ तभी होता है जब ज्ञान को व्यवहार में लाया जाए।


प्रश्न 6. संतोष को तुलसीदास ने क्यों महत्वपूर्ण माना है?
उत्तर: संतोष मनुष्य को लालच और ईर्ष्या से मुक्त करता है। संतोषी व्यक्ति शांत, प्रसन्न और स्थिर रहता है, इसलिए तुलसीदास ने इसे महान गुण माना है।


प्रश्न 7. संत-स्वभाव के दो गुण लिखिए।
उत्तर: संत-स्वभाव के दो गुण हैं—विनम्रता और परोपकार।


प्रश्न 8. कठोर वचनों के प्रति संत का व्यवहार कैसा होना चाहिए?
उत्तर: संत को कठोर वचनों को सहन करना चाहिए और उन पर क्रोध नहीं करना चाहिए। उसे मन को शीतल और संयमित रखना चाहिए।


प्रश्न 9. तुलसीदास के अनुसार सच्चा सुख कब प्राप्त होता है?
उत्तर: सच्चा सुख तब प्राप्त होता है जब हृदय में आत्मप्रकाश हो और मन विषय-आसक्तियों से मुक्त हो जाए।


प्रश्न 10. “विनय के पद” में तुलसीदास किससे कृपा की प्रार्थना करते हैं और क्यों?
उत्तर: तुलसीदास भगवान श्रीराम से कृपा की प्रार्थना करते हैं क्योंकि उनकी कृपा से ही विवेक, भक्ति और मोह-मुक्ति संभव है।

✨ दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5–10 अंक)


प्रश्न 1. “विनय के पद” का मूल भाव विस्तार से स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
“विनय के पद” तुलसीदास जी की गहन भक्ति, आत्मग्लानि और विनम्रता की श्रेष्ठ अभिव्यक्ति हैं। इन पदों का मूल भाव यह है कि मनुष्य अपने अहंकार, मोह और विषय-वासनाओं के कारण ईश्वर से दूर हो जाता है। कवि मानते हैं कि केवल बाहरी साधन, ज्ञान या आडंबर से मुक्ति संभव नहीं है। सच्चा उद्धार तभी होता है जब मनुष्य ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, विनय और श्रद्धा का भाव रखता है। इन पदों में तुलसीदास ईश्वर से कृपा की याचना करते हैं और स्वीकार करते हैं कि बिना प्रभु की अनुकंपा के मनुष्य संसार-सागर पार नहीं कर सकता। यह काव्य आत्मशुद्धि, विवेक और भक्तिमय जीवन का संदेश देता है।


प्रश्न 2. प्रथम पद में तुलसीदास ने मनुष्य की मूर्खता को किन उदाहरणों द्वारा स्पष्ट किया है?

उत्तर:
प्रथम पद में तुलसीदास ने मनुष्य की मूर्खता और भ्रम को अत्यंत प्रभावशाली उदाहरणों द्वारा स्पष्ट किया है। उन्होंने चातक पक्षी का उदाहरण दिया है, जो बादलों को देखकर वर्षा की आशा करता है, परंतु वर्षा न होने पर भी व्यर्थ प्रतीक्षा करता रहता है। इससे मनुष्य की झूठी आशा प्रकट होती है।
इसके अतिरिक्त कवि ने काँच को रत्न समझने का उदाहरण दिया है, जो बाहरी चमक-दमक के भ्रम को दर्शाता है। तीसरा उदाहरण अत्यधिक भूखे व्यक्ति का है, जो भोजन की लालसा में अपने नुकसान की भी परवाह नहीं करता। इन सभी उदाहरणों से तुलसीदास यह सिद्ध करते हैं कि मनुष्य सांसारिक सुखों के पीछे भागकर रामभक्ति जैसे सच्चे सुख को छोड़ देता है।


प्रश्न 3. तुलसीदास के अनुसार बाहरी साधन और दिखावटी साधना क्यों निष्फल हैं?

उत्तर:
तुलसीदास के अनुसार बाहरी साधन और दिखावटी साधना इसलिए निष्फल हैं क्योंकि वे केवल शरीर या बाहरी व्यवहार को प्रभावित करते हैं, मन को नहीं। मन के भीतर अज्ञान, अहंकार और विषय-वासनाओं की गाँठ बनी रहती है। जब तक यह आंतरिक मलिनता दूर नहीं होती, तब तक कोई भी साधना सफल नहीं हो सकती। कवि मानते हैं कि सच्ची साधना वही है जो हृदय को शुद्ध करे और विवेक को जाग्रत करे। बाहरी कर्मकांड केवल भ्रम उत्पन्न करते हैं, मोक्ष नहीं देते।


प्रश्न 4. द्वितीय पद में प्रयुक्त उदाहरणों का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
द्वितीय पद में तुलसीदास ने घी से भरे कढ़ाहे, खोखले पेड़ में रहने वाले पक्षी और साँप के उदाहरण दिए हैं। घी से भरे कढ़ाहे में आग जलाने पर भी घी नष्ट नहीं होता, इससे यह स्पष्ट होता है कि बाहरी प्रयासों से भीतर का दोष समाप्त नहीं होता।
खोखले पेड़ में रहने वाला पक्षी पेड़ कटने पर भी तुरंत नहीं मरता, जिससे यह संकेत मिलता है कि बिना विवेक के की गई साधना व्यर्थ होती है। साँप का उदाहरण यह बताता है कि मूल कारण को समाप्त किए बिना समस्या समाप्त नहीं होती। इन उदाहरणों से कवि आंतरिक शुद्धि पर बल देते हैं।


प्रश्न 5. तुलसीदास के अनुसार केवल ‘वाक्-ज्ञान’ से मोक्ष क्यों संभव नहीं है?

उत्तर:
तुलसीदास के अनुसार केवल वाक्-ज्ञान अर्थात् बोलने, उपदेश देने या शास्त्रों की चर्चा करने से मोक्ष संभव नहीं है। जब तक ज्ञान जीवन में व्यवहार के रूप में न उतरे, तब तक उसका कोई महत्व नहीं। कवि दीपक के उदाहरण से समझाते हैं कि दीपक के बारे में बात करने से अंधकार दूर नहीं होता, उसे जलाना पड़ता है। इसी प्रकार ज्ञान को अनुभव और आचरण में लाना आवश्यक है।


प्रश्न 6. तृतीय पद में दिए गए कल्पवृक्ष और कामधेनु के उदाहरण का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:
कल्पवृक्ष और कामधेनु के चित्र किसी भूखे व्यक्ति की भूख नहीं मिटा सकते। यह उदाहरण यह स्पष्ट करता है कि केवल कल्पना, वर्णन या ज्ञान से जीवन की समस्याएँ हल नहीं होतीं। वास्तविक लाभ तभी मिलता है जब ज्ञान को व्यवहार में अपनाया जाए। ईश्वर-भक्ति का सुख भी तभी प्राप्त होता है जब भक्त वास्तव में भक्ति करता है, न कि केवल उसके बारे में बोलता है।


प्रश्न 7. तुलसीदास के अनुसार आत्मप्रकाश का क्या महत्व है?

उत्तर:
आत्मप्रकाश का अर्थ है—हृदय में सच्चे ज्ञान और विवेक का उदय। तुलसीदास के अनुसार आत्मप्रकाश के बिना मनुष्य विषय-वासना में उलझा रहता है और संसार में भटकता रहता है। आत्मप्रकाश से ही मनुष्य को सही-गलत का बोध होता है और वही सच्चे सुख की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। इसके बिना मनुष्य को स्वप्न में भी शांति नहीं मिलती।


प्रश्न 8. चौथे पद में वर्णित संत-स्वभाव की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर:
चौथे पद में तुलसीदास ने संत-स्वभाव का आदर्श रूप प्रस्तुत किया है। संत व्यक्ति संतोषी होता है और किसी से कुछ नहीं चाहता। वह निरंतर परोपकार में लगा रहता है और मन, वचन तथा कर्म से सदाचार का पालन करता है। वह कठोर वचनों को सहन करता है, अहंकार से मुक्त रहता है, दूसरों के गुणों को ग्रहण करता है और दोष नहीं देखता। वह सुख-दुःख को समान भाव से स्वीकार करता है और अडिग हरि-भक्ति में लीन रहता है।


प्रश्न 9. तुलसीदास की भक्ति भावना पर विस्तार से प्रकाश डालिए।

उत्तर:
तुलसीदास की भक्ति भावना दीनता, करुणा और आत्मसमर्पण से परिपूर्ण है। वे स्वयं को तुच्छ और ईश्वर को सर्वशक्तिमान मानते हैं। उनकी भक्ति में अहंकार नहीं, बल्कि विनय और श्रद्धा है। वे ईश्वर को भक्त-वत्सल और कृपालु मानते हैं। उनकी भक्ति समाज को नैतिकता, करुणा और मर्यादा का संदेश देती है।


प्रश्न 10. “विनय के पद” से हमें कौन-कौन से नैतिक और आध्यात्मिक मूल्य प्राप्त होते हैं?

उत्तर:
“विनय के पद” से हमें विनम्रता, संतोष, सहनशीलता, परोपकार, आत्मसंयम, विवेक और ईश्वर-भक्ति जैसे महान मूल्य प्राप्त होते हैं। ये पद मनुष्य को अहंकार और मोह से मुक्त होकर सरल, पवित्र और सदाचारी जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। तुलसीदास का यह काव्य आज भी मानव जीवन के लिए मार्गदर्शक है।


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