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कवि परिचय – कबीर दास
कबीर दास हिंदी साहित्य के महान संत कवि, समाज सुधारक और निर्गुण भक्ति धारा के प्रमुख कवि माने जाते हैं। उनका जन्म लगभग 1398 ई. (कुछ विद्वान 1440 ई. भी मानते हैं) में काशी (वर्तमान वाराणसी, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उनके जन्म के संबंध में अनेक मत प्रचलित हैं। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार उनका पालन-पोषण नीरू और नीमा नामक जुलाहा दंपति ने किया। इसी कारण उनका बचपन साधारण वातावरण में बीता और वे जीवन भर श्रम तथा सादगी के समर्थक रहे।
कबीर के गुरु संत स्वामी रामानन्द थे। कहा जाता है कि रामानन्द जी के संपर्क में आने के बाद कबीर ने भक्ति का मार्ग अपनाया। वे किसी एक धर्म या संप्रदाय के पक्षधर नहीं थे। उन्होंने हिंदू और मुस्लिम दोनों समाजों में फैली धार्मिक कट्टरता, अंधविश्वास, जाति-पाँति और बाहरी आडंबरों का खुलकर विरोध किया। उनका मानना था कि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग प्रेम, सत्य, भक्ति और अच्छे कर्म हैं।
कबीर औपचारिक रूप से शिक्षित नहीं थे। उन्होंने स्वयं कहा है—
“मसि कागद छूयो नहीं, कलम गह्यो नहिं हाथ।”
इसका अर्थ है कि उन्होंने स्वयं पुस्तकें नहीं लिखीं। उनके उपदेश और वचन उनके शिष्यों ने बाद में संकलित किए। उनकी वाणी का प्रमुख संग्रह ‘बीजक’ है।
कबीर की भाषा अत्यंत सरल, सहज और जनसामान्य की भाषा थी। उन्होंने अपनी रचनाओं में अवधी, ब्रज, खड़ी बोली, भोजपुरी, पंजाबी तथा राजस्थानी आदि भाषाओं के शब्दों का प्रयोग किया। उनकी भाषा को सामान्यतः सधुक्कड़ी भाषा कहा जाता है। उनकी रचनाएँ आज भी समाज को सत्य, प्रेम, समानता और मानवता का संदेश देती हैं।
कबीर ने अपना अंतिम समय मगहर (उत्तर प्रदेश) में बिताया। माना जाता है कि उनका निधन लगभग 1518 ई. में हुआ। आज भी उनकी शिक्षाएँ पूरे विश्व में सम्मान के साथ पढ़ी और समझी जाती हैं।
कबीर का साहित्यिक परिचय
कबीर केवल कवि ही नहीं, बल्कि एक महान संत, चिंतक और समाज सुधारक भी थे। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में फैली बुराइयों पर तीखा प्रहार किया। उनका उद्देश्य लोगों को सच्चे धर्म, मानवता और ईश्वर-भक्ति का मार्ग दिखाना था। उन्होंने प्रेम, सत्य, समानता और आत्मज्ञान को जीवन का सबसे बड़ा धन माना।
उनकी रचनाओं में धार्मिक पाखंड, जातिवाद, ऊँच-नीच और दिखावटी पूजा-पाठ का स्पष्ट विरोध दिखाई देता है। वे कहते हैं कि ईश्वर मंदिर, मस्जिद या तीर्थों में नहीं, बल्कि मनुष्य के शुद्ध हृदय में निवास करता है।
प्रमुख रचनाएँ
कबीर की वाणी का प्रमुख संग्रह ‘बीजक’ है। इसके तीन मुख्य भाग हैं—
1. साखी
दोहा छंद में लिखे गए उपदेशात्मक कथन। इनमें जीवन, धर्म, भक्ति और नैतिकता का सरल संदेश दिया गया है।
2. सबद
गेय पद, जिनमें ईश्वर-भक्ति, प्रेम और आध्यात्मिक अनुभूतियों का वर्णन मिलता है।
3. रमैनी
मुख्यतः चौपाई छंद में लिखी गई रचनाएँ, जिनमें दार्शनिक एवं रहस्यवादी विचार व्यक्त किए गए हैं।
भाषा-शैली
- सरल, सहज और लोकभाषा आधारित।
- सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोग।
- दोहा, पद और चौपाई छंदों का सुंदर उपयोग।
- प्रतीकात्मक एवं व्यंग्यात्मक शैली।
- सामान्य जीवन के उदाहरणों द्वारा गहन आध्यात्मिक विचारों की अभिव्यक्ति।
काव्य की विशेषताएँ
- निर्गुण भक्ति का प्रचार।
- मानवता और समानता का संदेश।
- जाति-पाँति और अंधविश्वास का विरोध।
- प्रेम, सत्य और सदाचार पर बल।
- धार्मिक आडंबरों की आलोचना।
- सरल भाषा में गहरे जीवन-दर्शन की अभिव्यक्ति।
- नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा।
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य
- पूरा नाम: संत कबीर दास
- जन्म: लगभग 1398 ई. (कुछ विद्वानों के अनुसार 1440 ई.)
- जन्म स्थान: काशी (वाराणसी)
- पालन-पोषण: नीरू और नीमा
- गुरु: संत स्वामी रामानन्द
- प्रमुख ग्रंथ: बीजक
- बीजक के भाग: साखी, सबद, रमैनी
- भाषा: सधुक्कड़ी
- साहित्यिक धारा: निर्गुण भक्ति
- निधन: लगभग 1518 ई., मगहर
सभी साखियों की सरल व्याख्या (WB Board Class 12 Hindi Notes)
साखी – 1
मूल पंक्तियाँ
माटी का एक नाग बनाके, पूजे लोग लुगाया।
जिंदा नाग जब घर में निकले, ले लाठी धमकाया।।
सरल व्याख्या
कबीरदास जी कहते हैं कि लोग मिट्टी से साँप की मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करते हैं, लेकिन जब वास्तव में जीवित साँप उनके सामने आ जाता है, तो वे उसे लाठी से मारने के लिए दौड़ पड़ते हैं।
कवि इस उदाहरण के माध्यम से मनुष्य के दिखावे और पाखंड पर व्यंग्य करते हैं। लोग केवल परंपरा निभाने के लिए पूजा करते हैं, परंतु उनके मन में वास्तविक करुणा, प्रेम और सम्मान नहीं होता। कबीर का संदेश है कि केवल मूर्तियों की पूजा करने से धर्म नहीं होता, बल्कि सभी जीवों के प्रति दया और प्रेम रखना ही सच्चा धर्म है।
मुख्य संदेश: सच्ची भक्ति दिखावे में नहीं, बल्कि व्यवहार में होती है।
साखी – 2
मूल पंक्तियाँ
माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूँगी तोहे।।
सरल व्याख्या
यहाँ मिट्टी कुम्हार से कहती है कि आज तुम मुझे अपने पैरों से रौंद रहे हो, लेकिन एक दिन ऐसा भी आएगा जब मृत्यु के बाद तुम्हारा शरीर भी मिट्टी में मिल जाएगा और तब मैं तुम्हें अपने भीतर समा लूँगी।
कबीरदास इस दोहे के माध्यम से मनुष्य को अहंकार छोड़ने की शिक्षा देते हैं। जीवन अस्थायी है और मृत्यु निश्चित है। इसलिए मनुष्य को कभी घमंड नहीं करना चाहिए।
मुख्य संदेश: अहंकार का अंत निश्चित है, इसलिए विनम्र बनें।
साखी – 3
मूल पंक्तियाँ
तीरथ गए से एक फल, संत मिले फल चार।
सतगुरु मिले अनेक फल, कहे कबीर विचार।।
सरल व्याख्या
कबीरदास कहते हैं कि तीर्थ यात्रा करने से थोड़ा-सा पुण्य मिलता है, संतों की संगति से उससे अधिक लाभ मिलता है, लेकिन यदि किसी सच्चे गुरु का मार्गदर्शन मिल जाए तो मनुष्य का पूरा जीवन सफल हो जाता है।
वे बताते हैं कि सच्चा गुरु अज्ञान को दूर करके ज्ञान का प्रकाश देता है।
मुख्य संदेश: जीवन में सच्चे गुरु का स्थान सबसे ऊँचा है।
साखी – 4
मूल पंक्तियाँ
सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार।
लोचन अनंत उघारिया, अनंत दिखावनहार।।
सरल व्याख्या
कबीरदास कहते हैं कि सच्चे गुरु की महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता। गुरु मनुष्य की अज्ञान रूपी आँखें खोल देते हैं और उसे सत्य का मार्ग दिखाते हैं।
गुरु के ज्ञान से मनुष्य ईश्वर और जीवन के वास्तविक स्वरूप को पहचानता है।
मुख्य संदेश: गुरु जीवन का सबसे बड़ा मार्गदर्शक होता है।
साखी – 5
मूल पंक्तियाँ
सतगुरु सवां न कोई सगा, सोधी सई न दाति।
हरि जी सवां न कोइ हितू, हरिजन सई न जाति।।
सरल व्याख्या
कबीरदास कहते हैं कि सच्चे गुरु से बड़ा कोई अपना नहीं है और भगवान से बड़ा कोई हितैषी नहीं है। जो व्यक्ति ईश्वर का सच्चा भक्त होता है, उसकी कोई जाति या ऊँच-नीच नहीं होती।
कवि जाति-भेद का विरोध करते हुए मानव समानता का संदेश देते हैं।
मुख्य संदेश: ईश्वर की दृष्टि में सभी मनुष्य समान हैं।
साखी – 6
मूल पंक्तियाँ
अंखड़ियाँ झांई परी, पंथ निहारि निहारि।
जीभड़िया छाला परा, राम पुकारि पुकारि।।
सरल व्याख्या
कवि कहते हैं कि ईश्वर की प्रतीक्षा करते-करते आँखें थक गई हैं और बार-बार भगवान का नाम लेने से जीभ पर छाले पड़ गए हैं।
इस दोहे में भक्त की गहरी श्रद्धा, धैर्य और ईश्वर के प्रति प्रेम का सुंदर चित्रण है।
मुख्य संदेश: सच्ची भक्ति में धैर्य और समर्पण आवश्यक है।
साखी – 7
मूल पंक्तियाँ
सबै रसाइन मैं किया, हरि रस सम नहि कोइ।
रंचक घट मैं संचरै, तौ सब तन कंचन होइ।।
सरल व्याख्या
कबीरदास कहते हैं कि संसार के सभी सुखों का अनुभव करने पर भी भगवान के प्रेम जैसा आनंद कहीं नहीं मिलता। यदि ईश्वर-भक्ति का थोड़ा-सा भी रस मन में आ जाए, तो मनुष्य का जीवन पवित्र और श्रेष्ठ बन जाता है।
मुख्य संदेश: ईश्वर-भक्ति सबसे बड़ा आनंद है।
साखी – 8
मूल पंक्तियाँ
तूं तूं करता तूं भया, मुझमें रही न हूँ।
वारी तेरे नाऊँ परि, जित देखौं तित तूं।।
सरल व्याख्या
कबीरदास कहते हैं कि भगवान का निरंतर स्मरण करते-करते उनका अपना अहंकार समाप्त हो गया। अब उन्हें चारों ओर केवल ईश्वर ही दिखाई देते हैं।
यह दोहा आत्मसमर्पण और ईश्वर से एकाकार होने की भावना को व्यक्त करता है।
मुख्य संदेश: अहंकार छोड़कर ईश्वर में लीन होना ही सच्ची भक्ति है।
साखी – 9
मूल पंक्तियाँ
मन मथुरा दिल द्वारिका, काया कासी जानि।
दसवां द्वारा देहरा, तामैं जोति पिछानि।।
सरल व्याख्या
कबीरदास कहते हैं कि ईश्वर की खोज बाहर तीर्थों में करने की आवश्यकता नहीं है। मनुष्य का अपना शरीर ही सबसे बड़ा तीर्थ है। यदि मन शुद्ध हो, तो उसी में ईश्वर का प्रकाश दिखाई देता है।
मुख्य संदेश: ईश्वर हमारे भीतर ही निवास करते हैं।
साखी – 10
मूल पंक्तियाँ
हेरत हेरत हे सखी, रहा कबीर हिराइ।
बूँद समानी समुंद में, सो कत हेरी जाइ।।
सरल व्याख्या
कबीरदास कहते हैं कि जैसे पानी की एक बूँद समुद्र में मिलकर अलग नहीं पहचानी जा सकती, उसी प्रकार आत्मा जब परमात्मा में मिल जाती है, तो उसका अलग अस्तित्व नहीं रहता।
यह दोहा आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है।
मुख्य संदेश: आत्मा का अंतिम लक्ष्य परमात्मा में विलीन होना है।
साखी – 11
मूल पंक्तियाँ
जाकै मुंह माथा नहीं, नांही रूप कुरूप।
पुहुप बास तै पातरा, ऐसा तत्त अनूप।।
सरल व्याख्या
कबीरदास कहते हैं कि परमात्मा का कोई रूप, रंग, आकार या शरीर नहीं है। वह निराकार और सर्वव्यापी है। उसकी उपस्थिति फूल की सुगंध की तरह हर जगह अनुभव की जा सकती है, लेकिन उसे देखा नहीं जा सकता।
यह दोहा निर्गुण भक्ति की भावना को प्रकट करता है।
मुख्य संदेश: ईश्वर निराकार, सर्वव्यापी और अनुभव करने योग्य हैं।
साखियों का मुख्य संदेश
इन सभी साखियों के माध्यम से कबीरदास ने मनुष्य को सत्य, प्रेम, विनम्रता, समानता, गुरु-भक्ति, आत्मज्ञान और ईश्वर-भक्ति का मार्ग अपनाने की प्रेरणा दी है। उन्होंने बाहरी आडंबर, जाति-भेद, अंधविश्वास और अहंकार का विरोध करते हुए सच्चे धर्म और मानवता का संदेश दिया है। ये साखियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी अपने समय में थीं।
साखी के 25 महत्वपूर्ण MCQs (WB Board Class 12 | परीक्षा उपयोगी)
1. ‘साखी एवं पद’ के रचयिता कौन हैं?
A. तुलसीदास
B. सूरदास
C. कबीरदास
D. रहीम
✅ उत्तर: C. कबीरदास
2. कबीरदास किस भक्ति धारा के प्रमुख कवि थे?
A. सगुण भक्ति
B. निर्गुण भक्ति
C. रीतिकाल
D. छायावाद
✅ उत्तर: B. निर्गुण भक्ति
3. ‘माटी का एक नाग बनाके’ साखी में कबीर किस पर व्यंग्य करते हैं?
A. प्रकृति पर
B. अंधविश्वास और पाखंड पर
C. शिक्षा पर
D. राजनीति पर
✅ उत्तर: B. अंधविश्वास और पाखंड पर
4. ‘माटी कहे कुमार से’ साखी का मुख्य संदेश क्या है?
A. परिश्रम का महत्व
B. अहंकार का त्याग
C. धन का महत्व
D. शिक्षा का महत्व
✅ उत्तर: B. अहंकार का त्याग
5. ‘माटी कहे कुमार से’ में ‘कुमार’ का अर्थ है—
A. राजा
B. किसान
C. कुम्हार
D. बढ़ई
✅ उत्तर: C. कुम्हार
6. कबीर के अनुसार तीर्थ यात्रा से अधिक लाभ किससे मिलता है?
A. धन से
B. संतों की संगति से
C. व्यापार से
D. युद्ध से
✅ उत्तर: B. संतों की संगति से
7. कबीर के अनुसार सबसे अधिक लाभ किससे मिलता है?
A. तीर्थ यात्रा से
B. संत से
C. सतगुरु से
D. मित्र से
✅ उत्तर: C. सतगुरु से
8. ‘सतगुरु की महिमा अनंत’ में गुरु का कार्य क्या बताया गया है?
A. धन देना
B. अज्ञान दूर करना
C. घर बनाना
D. व्यापार करना
✅ उत्तर: B. अज्ञान दूर करना
9. कबीर के अनुसार सबसे बड़ा हितैषी कौन है?
A. मित्र
B. गुरु
C. भगवान (हरि)
D. परिवार
✅ उत्तर: C. भगवान (हरि)
10. ‘हरिजन’ शब्द का अर्थ क्या है?
A. राजा
B. भगवान का भक्त
C. साधु
D. ब्राह्मण
✅ उत्तर: B. भगवान का भक्त
11. ‘अंखड़ियाँ झांई परी’ में भक्त किसकी प्रतीक्षा कर रहा है?
A. गुरु की
B. मित्र की
C. भगवान की
D. राजा की
✅ उत्तर: C. भगवान की
12. ‘हरि रस’ का अर्थ क्या है?
A. फल का रस
B. ईश्वर-भक्ति का आनंद
C. औषधि
D. जल
✅ उत्तर: B. ईश्वर-भक्ति का आनंद
13. कबीर के अनुसार सबसे श्रेष्ठ रस कौन-सा है?
A. श्रृंगार रस
B. वीर रस
C. हरि रस
D. हास्य रस
✅ उत्तर: C. हरि रस
14. ‘तूं तूं करता तूं भया’ में ‘मैं’ किसका प्रतीक है?
A. ज्ञान
B. अहंकार
C. प्रेम
D. शरीर
✅ उत्तर: B. अहंकार
15. ‘जित देखौं तित तूं’ का क्या अर्थ है?
A. चारों ओर ईश्वर का अस्तित्व है।
B. चारों ओर मनुष्य हैं।
C. चारों ओर जंगल हैं।
D. चारों ओर मंदिर हैं।
✅ उत्तर: A. चारों ओर ईश्वर का अस्तित्व है।
16. ‘मन मथुरा दिल द्वारिका’ में कबीर क्या संदेश देते हैं?
A. तीर्थ यात्रा आवश्यक है।
B. ईश्वर मनुष्य के भीतर निवास करते हैं।
C. केवल मंदिर में भगवान हैं।
D. केवल काशी पवित्र है।
✅ उत्तर: B. ईश्वर मनुष्य के भीतर निवास करते हैं।
17. ‘दसवां द्वारा’ का संबंध किससे है?
A. मंदिर
B. शरीर के आध्यात्मिक द्वार से
C. महल से
D. नदी से
✅ उत्तर: B. शरीर के आध्यात्मिक द्वार से
18. ‘बूँद समानी समुंद में’ किसका प्रतीक है?
A. वर्षा
B. आत्मा का परमात्मा में मिल जाना
C. नदी
D. समुद्र यात्रा
✅ उत्तर: B. आत्मा का परमात्मा में मिल जाना
19. ‘हेरत हेरत हे सखी’ में कवि किस अनुभव का वर्णन करते हैं?
A. प्रकृति का
B. आत्मा और परमात्मा के मिलन का
C. युद्ध का
D. शिक्षा का
✅ उत्तर: B. आत्मा और परमात्मा के मिलन का
20. ‘जाकै मुंह माथा नहीं’ में ईश्वर का कौन-सा स्वरूप बताया गया है?
A. साकार
B. निराकार
C. मानव रूप
D. राजा
✅ उत्तर: B. निराकार
21. फूल की सुगंध का उदाहरण किसके लिए दिया गया है?
A. प्रकृति
B. प्रेम
C. ईश्वर की सर्वव्यापकता
D. शिक्षा
✅ उत्तर: C. ईश्वर की सर्वव्यापकता
22. कबीरदास की भाषा कौन-सी मानी जाती है?
A. संस्कृत
B. ब्रजभाषा
C. सधुक्कड़ी
D. उर्दू
✅ उत्तर: C. सधुक्कड़ी
23. ‘साखी’ शब्द किस शब्द से बना है?
A. साक्षी
B. साथी
C. साधु
D. सत्य
✅ उत्तर: A. साक्षी
24. साखियों का मुख्य उद्देश्य क्या है?
A. मनोरंजन करना
B. धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा देना
C. इतिहास बताना
D. राजनीति समझाना
✅ उत्तर: B. धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा देना
25. कबीर की साखियों का मुख्य संदेश क्या है?
A. धन कमाना
B. बाहरी आडंबर करना
C. सत्य, प्रेम, समानता, गुरु-भक्ति और ईश्वर-भक्ति का पालन करना
D. केवल तीर्थ यात्रा करना
✅ उत्तर: C. सत्य, प्रेम, समानता, गुरु-भक्ति और ईश्वर-भक्ति का पालन करना
🎯 परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न (Very Important)
1. साखी शब्द का अर्थ क्या है?
उत्तर:
‘साखी’ शब्द ‘साक्षी’ से बना है, जिसका अर्थ गवाह या प्रत्यक्षदर्शी होता है। कबीरदास ने अपनी साखियों (दोहों) के माध्यम से जीवन, धर्म, भक्ति, नैतिकता और सत्य का उपदेश दिया है। उनकी साखियाँ मनुष्य को सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं तथा जीवन के महत्वपूर्ण अनुभवों को सरल भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
2. ‘माटी कहे कुमार से’ का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर:
इस साखी का मुख्य संदेश है कि मनुष्य को कभी अहंकार नहीं करना चाहिए। जिस प्रकार कुम्हार मिट्टी को रौंदकर बर्तन बनाता है, उसी प्रकार एक दिन मृत्यु के बाद मनुष्य स्वयं मिट्टी में मिल जाता है। इसलिए जीवन में विनम्रता, सादगी और अच्छे कर्मों का पालन करना चाहिए, क्योंकि मृत्यु सभी के लिए निश्चित है।
3. कबीर के अनुसार सतगुरु का महत्व क्या है?
उत्तर:
कबीरदास के अनुसार सतगुरु का स्थान जीवन में सबसे श्रेष्ठ होता है। सतगुरु मनुष्य के अज्ञान को दूर करके ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। वे सही और गलत का अंतर समझाते हैं तथा ईश्वर तक पहुँचने का सही मार्ग दिखाते हैं। कबीर मानते हैं कि तीर्थ यात्रा और संत संगति से भी अधिक लाभ सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है।
4. ‘हरि रस’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘हरि रस’ का अर्थ ईश्वर-भक्ति का दिव्य आनंद है। कबीरदास कहते हैं कि संसार के सभी सुखों से बढ़कर भगवान के प्रेम और भक्ति का आनंद है। यदि मनुष्य के हृदय में थोड़ा-सा भी हरि रस प्रवेश कर जाए, तो उसका जीवन पवित्र, शांत और आनंदमय बन जाता है।
5. ‘तूं तूं करता तूं भया’ का भावार्थ लिखिए।
उत्तर:
इस साखी में कबीरदास कहते हैं कि भगवान का निरंतर स्मरण करते-करते उनका अहंकार पूरी तरह समाप्त हो गया। अब उन्हें अपने अस्तित्व का कोई अभिमान नहीं रह गया है। उन्हें संसार की प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक प्राणी में केवल ईश्वर का ही स्वरूप दिखाई देता है। यह साखी पूर्ण आत्मसमर्पण, भक्ति और ईश्वर से एकाकार होने की भावना को व्यक्त करती है।
6. ‘मन मथुरा दिल द्वारिका’ में कबीर क्या संदेश देते हैं?
उत्तर:
इस साखी में कबीरदास यह संदेश देते हैं कि ईश्वर की खोज बाहरी तीर्थों में नहीं, बल्कि अपने मन और हृदय में करनी चाहिए। मनुष्य का शरीर ही सबसे बड़ा मंदिर है। यदि मन शुद्ध और पवित्र हो, तो ईश्वर का प्रकाश स्वयं भीतर अनुभव किया जा सकता है। इसलिए सच्ची भक्ति बाहरी आडंबरों में नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि में है।
7. ‘बूँद समानी समुंद में’ का प्रतीकात्मक अर्थ क्या है?
उत्तर:
इस साखी में बूँद आत्मा का तथा समुद्र परमात्मा का प्रतीक है। जिस प्रकार पानी की बूँद समुद्र में मिलकर अपना अलग अस्तित्व खो देती है, उसी प्रकार आत्मा भी परमात्मा में मिलकर एकाकार हो जाती है। यह साखी आत्मा और परमात्मा के पूर्ण मिलन तथा आध्यात्मिक एकता का संदेश देती है।
8. ‘जाकै मुंह माथा नहीं’ में ईश्वर का कौन-सा स्वरूप वर्णित है?
उत्तर:
इस साखी में कबीरदास ने ईश्वर के निराकार (निर्गुण) स्वरूप का वर्णन किया है। वे बताते हैं कि ईश्वर का कोई रूप, रंग, आकार या शरीर नहीं है। वे फूलों की सुगंध की तरह हर जगह विद्यमान हैं, जिन्हें देखा नहीं जा सकता, केवल अनुभव किया जा सकता है। यही निर्गुण भक्ति का मूल सिद्धांत है।
पदों की पंक्ति-दर-पंक्ति सरल व्याख्या (WB Board Class 12 Hindi Notes)
पद – 1
मूल पद
झगरा एक निबेरहु राम।
जे तुम्ह अपने जन सौं काम।।
ब्रह्मा बड़ा कि जिन रे उपाया।
वेद बड़ा कि जहाँ ते आया।।
यह मन बड़ा कि जेहिं मन मानै।
राम बड़ा कि रामहिं जानै।।
कहै कबीर हौं भया उदास।
तीरथ बड़ा कि हरि का दास।।
सरल व्याख्या
इस पद में कबीरदास भगवान से एक प्रश्न का समाधान करने की प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं कि संसार में अनेक लोग अलग-अलग बातों को सबसे बड़ा मानते हैं, इसलिए इस विवाद का अंत होना चाहिए।
कबीर प्रश्न करते हैं— क्या ब्रह्मा बड़े हैं या वे परमात्मा, जिन्होंने ब्रह्मा की रचना की? क्या वेद बड़े हैं या वह परम सत्य, जिससे वेदों का ज्ञान उत्पन्न हुआ? क्या मन बड़ा है या वह ईश्वर, जिसे मन स्वीकार करता है? क्या राम बड़े हैं या वह संत, जिसने राम के वास्तविक स्वरूप को जान लिया है?
अंत में कबीर कहते हैं कि वे इस विवाद से दुखी हो गए हैं। वे पूछते हैं कि तीर्थ बड़ा है या भगवान का सच्चा भक्त? उनका निष्कर्ष यह है कि बाहरी आडंबरों से अधिक महत्व सच्ची भक्ति, ईश्वर-ज्ञान और संतों की संगति का है।
मुख्य संदेश
- ईश्वर सबसे महान हैं।
- बाहरी कर्मकांड से अधिक महत्व सच्ची भक्ति का है।
- ईश्वर को जानने वाला संत अत्यंत सम्माननीय होता है।
पद – 2
मूल पद
चला हंसा वा देस जहँ पिया बसै चितचोर।
सुरत सोहागिन है पनिहारिन भरै ठाढ़ बिन डोर।।
बहि देसवाँ बादर ना उमड़ै रिमझिम बरसै मेह।
चौबारे में बैठ रहो ना जा भीजहु निर्देह।।
बहि देसवा नित्त पूर्णिमा कबहुँ न होय अँधेर।
एक सूरज कै कबन बतावै कोटिन सूरज उँजेर।।
सरल व्याख्या
इस पद में कबीरदास आत्मा और परमात्मा के मिलन का अत्यंत सुंदर चित्र प्रस्तुत करते हैं।
वे कहते हैं कि हंस (आत्मा) उस दिव्य लोक की ओर चल पड़ा है जहाँ उसका प्रिय परमात्मा निवास करता है। वहाँ प्रेम रूपी पनिहारिन बिना रस्सी के ही ज्ञान का जल भरती रहती है। यह स्थान आध्यात्मिक आनंद और शांति का प्रतीक है।
कबीर आगे कहते हैं कि उस दिव्य लोक में बादल नहीं घिरते, फिर भी आनंद की वर्षा होती रहती है। वहाँ कभी अंधकार नहीं होता, क्योंकि वहाँ ज्ञान का प्रकाश सदा विद्यमान रहता है। वहाँ एक सूर्य नहीं, बल्कि करोड़ों सूर्यों के समान तेज फैला हुआ है।
यह पूरा पद आध्यात्मिक संसार, आत्मा की मुक्ति और परमात्मा से मिलने के आनंद का प्रतीकात्मक वर्णन करता है।
मुख्य संदेश
- आत्मा का अंतिम लक्ष्य परमात्मा से मिलन है।
- ईश्वर का लोक ज्ञान, प्रेम और प्रकाश से भरपूर है।
- आध्यात्मिक जीवन ही सच्चा आनंद देता है।
पद – 3
मूल पद
ना जाने साहब कैसा है,
मुल्ला होकर बाँग जो देवे, क्या तेरा साहब बहरा है?
कीड़ी के पग नेउर बाजे, सो भी साहब सुनता है।
माला फेरी तिलक लगाया, लंबा जटा बढ़ाता है।
अंतर तेरे कुफर-कटारी, यो नहि साहब मिलता है।।
सरल व्याख्या
इस पद में कबीरदास धार्मिक आडंबरों और दिखावे की तीखी आलोचना करते हैं।
वे कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति ऊँची आवाज़ में अज़ान देता है, तो क्या उसका भगवान बहरे हैं कि उन्हें इतनी ऊँची आवाज़ से पुकारना पड़े? ईश्वर तो इतने सर्वज्ञ और सर्वव्यापी हैं कि वे चींटी के पैरों की हल्की-सी आहट भी सुन लेते हैं।
कबीर आगे कहते हैं कि केवल हाथ में माला फेरने, माथे पर तिलक लगाने या लंबी जटा रखने से भगवान नहीं मिलते। यदि मनुष्य के मन में घृणा, छल, कपट और बुरे विचार भरे हों, तो बाहरी पूजा-पाठ का कोई महत्व नहीं रह जाता।
सच्ची भक्ति बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि मन की पवित्रता, प्रेम, सत्य और निष्कपट आचरण में है।
मुख्य संदेश
- ईश्वर बाहरी आडंबरों से नहीं, बल्कि सच्चे मन से प्रसन्न होते हैं।
- धार्मिक दिखावा व्यर्थ है।
- मन की शुद्धता ही सच्ची भक्ति का आधार है।
पद के 25 महत्वपूर्ण MCQs (WB Board Class 12 | परीक्षा उपयोगी)
1. ‘साखी एवं पद’ के रचयिता कौन हैं?
A. तुलसीदास
B. सूरदास
C. कबीरदास
D. रहीम
✅ उत्तर: C. कबीरदास
2. पहले पद में कबीर किससे विवाद का समाधान करने की प्रार्थना करते हैं?
A. गुरु से
B. राजा से
C. राम (ईश्वर) से
D. संत से
✅ उत्तर: C. राम (ईश्वर) से
3. ‘झगरा एक निबेरहु राम’ का मुख्य भाव क्या है?
A. युद्ध का वर्णन
B. धार्मिक विवाद का समाधान
C. प्रकृति का वर्णन
D. मित्रता का महत्व
✅ उत्तर: B. धार्मिक विवाद का समाधान
4. पहले पद में कबीर किसे सबसे महान मानते हैं?
A. ब्रह्मा को
B. वेदों को
C. ईश्वर को
D. मन को
✅ उत्तर: C. ईश्वर को
5. कबीर के अनुसार तीर्थ से बड़ा कौन है?
A. राजा
B. गुरु
C. हरि का दास (सच्चा भक्त)
D. विद्वान
✅ उत्तर: C. हरि का दास (सच्चा भक्त)
6. दूसरे पद में ‘हंस’ किसका प्रतीक है?
A. पक्षी
B. आत्मा
C. संत
D. गुरु
✅ उत्तर: B. आत्मा
7. ‘चितचोर’ शब्द किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
A. राजा
B. गुरु
C. परमात्मा
D. मित्र
✅ उत्तर: C. परमात्मा
8. दूसरे पद में आत्मा कहाँ जाना चाहती है?
A. तीर्थ
B. जंगल
C. परमात्मा के धाम
D. नगर
✅ उत्तर: C. परमात्मा के धाम
9. ‘सुरत सोहागिन’ का क्या अर्थ है?
A. सुंदर स्त्री
B. ईश्वर से प्रेम करने वाली आत्मा
C. रानी
D. पनिहारिन
✅ उत्तर: B. ईश्वर से प्रेम करने वाली आत्मा
10. दूसरे पद में किसका वर्णन किया गया है?
A. युद्ध का
B. प्रकृति का
C. आध्यात्मिक लोक का
D. व्यापार का
✅ उत्तर: C. आध्यात्मिक लोक का
11. उस दिव्य लोक में कैसा प्रकाश रहता है?
A. चंद्रमा का
B. दीपक का
C. करोड़ों सूर्यों के समान
D. बिजली का
✅ उत्तर: C. करोड़ों सूर्यों के समान
12. तीसरे पद में कबीर किसकी आलोचना करते हैं?
A. शिक्षा की
B. धार्मिक आडंबरों की
C. प्रकृति की
D. साहित्य की
✅ उत्तर: B. धार्मिक आडंबरों की
13. ‘क्या तेरा साहब बहरा है?’ से कवि क्या कहना चाहते हैं?
A. ईश्वर सुन नहीं सकते।
B. ईश्वर को ऊँची आवाज़ से पुकारने की आवश्यकता नहीं है।
C. ईश्वर दूर रहते हैं।
D. ईश्वर नाराज़ हैं।
✅ उत्तर: B. ईश्वर को ऊँची आवाज़ से पुकारने की आवश्यकता नहीं है।
14. ‘कीड़ी के पग नेउर बाजे’ का क्या अर्थ है?
A. चींटी गाती है।
B. ईश्वर सूक्ष्म से सूक्ष्म ध्वनि भी सुन लेते हैं।
C. कीड़े उड़ते हैं।
D. चींटी बोलती है।
✅ उत्तर: B. ईश्वर सूक्ष्म से सूक्ष्म ध्वनि भी सुन लेते हैं।
15. केवल माला फेरने और तिलक लगाने से क्या भगवान मिल जाते हैं?
A. हाँ
B. नहीं
C. कभी-कभी
D. केवल संतों को
✅ उत्तर: B. नहीं
16. कबीर के अनुसार सच्ची भक्ति का आधार क्या है?
A. धन
B. बाहरी पूजा
C. मन की पवित्रता
D. प्रसिद्धि
✅ उत्तर: C. मन की पवित्रता
17. ‘अंतर तेरे कुफर-कटारी’ का आशय क्या है?
A. मन में बुरे विचार होना।
B. तलवार रखना।
C. युद्ध करना।
D. पूजा करना।
✅ उत्तर: A. मन में बुरे विचार होना।
18. कबीर किस प्रकार की भक्ति का समर्थन करते हैं?
A. दिखावटी भक्ति
B. सच्ची और निष्कपट भक्ति
C. केवल मंदिर पूजा
D. केवल तीर्थ यात्रा
✅ उत्तर: B. सच्ची और निष्कपट भक्ति
19. कबीर के अनुसार ईश्वर कहाँ निवास करते हैं?
A. केवल मंदिर में
B. केवल मस्जिद में
C. प्रत्येक प्राणी के हृदय में
D. केवल तीर्थों में
✅ उत्तर: C. प्रत्येक प्राणी के हृदय में
20. कबीर की वाणी का मुख्य उद्देश्य क्या है?
A. मनोरंजन करना
B. धन कमाना
C. सत्य, प्रेम और भक्ति का संदेश देना
D. युद्ध का वर्णन करना
✅ उत्तर: C. सत्य, प्रेम और भक्ति का संदेश देना
21. पहले पद का मुख्य संदेश क्या है?
A. धन का महत्व
B. ईश्वर और सच्ची भक्ति सर्वोपरि हैं।
C. युद्ध आवश्यक है।
D. केवल वेदों का अध्ययन करना चाहिए।
✅ उत्तर: B. ईश्वर और सच्ची भक्ति सर्वोपरि हैं।
22. दूसरे पद का मुख्य विषय क्या है?
A. प्रकृति
B. आत्मा और परमात्मा का मिलन
C. शिक्षा
D. समाज सुधार
✅ उत्तर: B. आत्मा और परमात्मा का मिलन
23. तीसरे पद का मुख्य संदेश क्या है?
A. ऊँची आवाज़ में पूजा करनी चाहिए।
B. केवल माला जपने से भगवान मिलते हैं।
C. सच्ची भक्ति मन की शुद्धता में है।
D. केवल तीर्थ यात्रा करनी चाहिए।
✅ उत्तर: C. सच्ची भक्ति मन की शुद्धता में है।
24. कबीर किसका विरोध करते हैं?
A. प्रेम का
B. धार्मिक पाखंड और आडंबर का
C. भक्ति का
D. सत्य का
✅ उत्तर: B. धार्मिक पाखंड और आडंबर का
25. ‘साखी एवं पद’ का मुख्य संदेश क्या है?
A. धन कमाना ही जीवन का उद्देश्य है।
B. बाहरी कर्मकांड ही सबसे महत्वपूर्ण हैं।
C. सच्ची भक्ति, गुरु का सम्मान, आत्मज्ञान, मानवता और ईश्वर-प्रेम ही जीवन का वास्तविक मार्ग है।
D. केवल तीर्थ यात्रा करने से मोक्ष मिलता है।
✅ उत्तर: C. सच्ची भक्ति, गुरु का सम्मान, आत्मज्ञान, मानवता और ईश्वर-प्रेम ही जीवन का वास्तविक मार्ग है।
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