educatedindia786.com

Amazon

"Love Amazon? Shop through our link and help Educated India empower more students — no extra cost to you!"

जीवन की निरन्तरता पाठ में केन्द्रक कोशिका का दिमाग है।
educatedindia786.com

Flipkart

"Flipkart fan? Click our link before you buy and support quality education with every purchase!"

Table of Contents

जीवन की निरन्तरता

जीवन की निरंतरता

जीवों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है—अपने जैसे नए जीवों को उत्पन्न करना और अपनी जाति को बनाए रखना। इसे ही जीवन की निरंतरता कहते हैं।

जीवन की निरंतरता मुख्य रूप से निम्न प्रक्रियाओं से बनी रहती है—

  1. कोशिका विभाजन और कोशिका-चक्र

  2. प्रजनन

  3. पुष्पीय पौधों में लैंगिक प्रजनन

  4. वृद्धि और विकास


1. कोशिका विभाजन और कोशिका-चक्र

कोशिका विभाजन क्या है?

जब एक मूल कोशिका विभाजित होकर दो या अधिक नई कोशिकाएँ बनाती है, तो इस प्रक्रिया को कोशिका विभाजन (Cell Division) कहते हैं।

कोशिका विभाजन जीवों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके द्वारा—

  • शरीर की वृद्धि होती है।

  • क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की मरम्मत होती है।

  • नई कोशिकाएँ बनती हैं।

  • एककोशिकीय जीवों में प्रजनन हो सकता है।

  • लैंगिक प्रजनन के लिए युग्मक बनते हैं।

उदाहरण

यदि त्वचा की कोई कोशिका नष्ट हो जाती है, तो नई कोशिकाएँ बनकर उस स्थान की मरम्मत करती हैं। यह कोशिका विभाजन के कारण होता है।


कोशिका-चक्र (Cell Cycle)

किसी कोशिका के बनने से लेकर उसके अगले विभाजन तक होने वाली घटनाओं के क्रम को कोशिका-चक्र कहते हैं।

सरल रूप में—

कोशिका का निर्माण → वृद्धि → DNA की प्रतिकृति → विभाजन → नई कोशिकाएँ

कोशिका-चक्र को मुख्यतः दो भागों में समझा जा सकता है—

1. अंतरावस्था (Interphase)

इस अवस्था में कोशिका विभाजन के लिए तैयारी करती है।

इस दौरान—

  • कोशिका की वृद्धि होती है।

  • आवश्यक प्रोटीन बनते हैं।

  • DNA की प्रतिकृति होती है।

  • कोशिका में ऊर्जा और अन्य पदार्थों का संचय होता है।

2. विभाजन अवस्था

इस अवस्था में कोशिका वास्तव में विभाजित होती है।

कक्षा 10 के स्तर पर मुख्यतः दो प्रकार के कोशिका विभाजन समझना आवश्यक है—

  • समसूत्री विभाजन (Mitosis)

  • अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis)


समसूत्री विभाजन (Mitosis)

जिस कोशिका विभाजन में एक मूल कोशिका से सामान्यतः दो पुत्री कोशिकाएँ बनती हैं और उनमें गुणसूत्रों की संख्या मूल कोशिका के समान रहती है, उसे समसूत्री विभाजन कहते हैं।

उदाहरण

यदि मूल कोशिका में 46 गुणसूत्र हैं, तो समसूत्री विभाजन के बाद बनने वाली दोनों कोशिकाओं में भी सामान्यतः 46-46 गुणसूत्र होंगे।

समसूत्री विभाजन का महत्व

  • शरीर की वृद्धि

  • कोशिकाओं की मरम्मत

  • पुराने या मृत कोशिकाओं का स्थान लेना

  • अलैंगिक प्रजनन में सहायता

याद रखें

Mitosis = संख्या समान रहती है।


अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis)

जिस कोशिका विभाजन में गुणसूत्रों की संख्या घटकर आधी हो जाती है और सामान्यतः चार कोशिकाएँ बनती हैं, उसे अर्धसूत्री विभाजन कहते हैं।

यह मुख्य रूप से युग्मक (Gametes) के निर्माण में महत्वपूर्ण है।

मनुष्य में—

शुक्राणु = 23 गुणसूत्र
अंडाणु = 23 गुणसूत्र

जब शुक्राणु और अंडाणु मिलते हैं—

23 + 23 = 46 गुणसूत्र

इस प्रकार अगली पीढ़ी में गुणसूत्रों की संख्या सामान्य बनी रहती है।

याद रखने की ट्रिक

Mitosis → 2 कोशिकाएँ → गुणसूत्र समान

Meiosis → 4 कोशिकाएँ → गुणसूत्र आधे


2. प्रजनन (Reproduction)

जीव द्वारा अपने समान नए जीवों को उत्पन्न करने की प्रक्रिया को प्रजनन कहते हैं।

प्रजनन का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य है—

जीवों की जाति या प्रजाति की निरंतरता बनाए रखना।

यदि जीव प्रजनन न करें, तो एक पीढ़ी के समाप्त होने के बाद उस प्रजाति का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।


प्रजनन के प्रकार

प्रजनन मुख्यतः दो प्रकार का होता है—

1. अलैंगिक प्रजनन

2. लैंगिक प्रजनन


अलैंगिक प्रजनन

जिस प्रजनन में सामान्यतः एक ही जनक भाग लेता है और नर तथा मादा युग्मकों का संलयन नहीं होता, उसे अलैंगिक प्रजनन कहते हैं।

इसमें बनने वाली संतति सामान्यतः जनक के समान होती है।

प्रमुख प्रकार

1. द्विखंडन

एक कोशिका दो नई कोशिकाओं में विभाजित हो जाती है।

उदाहरण — अमीबा

अमीबा की कोशिका विभाजित होकर दो अमीबा बना सकती है।


2. बहुखंडन

एक कोशिका से एक साथ अनेक नई कोशिकाएँ बनती हैं।

उदाहरण — प्लाज्मोडियम


3. मुकुलन (Budding)

जनक के शरीर पर एक छोटी-सी कली या मुकुल बनती है। यह धीरे-धीरे बढ़ती है और अलग होकर नया जीव बना सकती है।

उदाहरण — यीस्ट


4. विखंडन (Fragmentation)

शरीर कई टुकड़ों में टूट जाता है और प्रत्येक टुकड़ा नया जीव बना सकता है।

उदाहरण — स्पाइरोगाइरा


5. पुनर्जनन (Regeneration)

शरीर का कोई भाग अलग होने के बाद उससे पूरा जीव बन सकता है।

उदाहरण — प्लेनेरिया


6. कायिक प्रवर्धन (Vegetative Propagation)

पौधों में जड़, तना या पत्ती जैसे कायिक भागों से नया पौधा बनता है।

उदाहरण—

  • आलू → तना

  • अदरक → तना

  • ब्रायोफिलम → पत्ती

  • शकरकंद → जड़

लाभ

  • जल्दी नए पौधे प्राप्त होते हैं।

  • केवल एक पौधे से कई पौधे बनाए जा सकते हैं।

  • कुछ पौधों में बीज के बिना भी नए पौधे प्राप्त किए जा सकते हैं।

  • वांछित गुणों वाले पौधों को बनाए रखना आसान होता है।


लैंगिक प्रजनन

जिस प्रजनन में सामान्यतः नर और मादा युग्मक भाग लेते हैं और उनके संलयन से युग्मनज (Zygote) बनता है, उसे लैंगिक प्रजनन कहते हैं।

सरल क्रम

नर युग्मक + मादा युग्मक → निषेचन → युग्मनज → भ्रूण → नया जीव

लैंगिक प्रजनन का एक बड़ा लाभ है कि इसमें आनुवंशिक विविधता (Variation) उत्पन्न होती है।

यही विविधता बदलते वातावरण में जीवों के अनुकूलन और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।


3. पुष्पीय पौधों में लैंगिक प्रजनन

फूल पौधों में लैंगिक प्रजनन का प्रमुख अंग है।

एक सामान्य फूल में चार प्रमुख भाग होते हैं—

  1. बाह्यदल (Sepal)

  2. दल/पंखुड़ी (Petal)

  3. पुंकेसर (Stamen)

  4. स्त्रीकेसर/अंडप (Carpel/Pistil)


पुंकेसर — नर प्रजनन अंग

पुंकेसर फूल का नर प्रजनन अंग है।

इसके दो मुख्य भाग हैं—

1. परागकोश (Anther)

यहाँ परागकण (Pollen grains) बनते हैं।

परागकणों में नर युग्मक बनने की प्रक्रिया होती है।

2. तंतु (Filament)

यह परागकोश को सहारा देता है।


स्त्रीकेसर — मादा प्रजनन अंग

स्त्रीकेसर फूल का मादा प्रजनन अंग है।

इसके तीन प्रमुख भाग हैं—

1. वर्तिकाग्र (Stigma)

यह सबसे ऊपरी भाग है।

इसकी सतह सामान्यतः चिपचिपी होती है, जिससे परागकण यहाँ चिपक सकते हैं।

2. वर्तिका (Style)

यह वर्तिकाग्र और अंडाशय के बीच स्थित होती है।

3. अंडाशय (Ovary)

अंडाशय के अंदर बीजांड (Ovule) होते हैं।

बीजांड में मादा युग्मक उपस्थित होता है।


परागण (Pollination)

परागकोश से परागकणों का वर्तिकाग्र तक पहुँचना परागण कहलाता है।

परागण दो प्रकार का हो सकता है—

1. स्वपरागण

एक ही फूल या उसी पौधे के फूल से परागकण उसी पौधे के वर्तिकाग्र तक पहुँचते हैं।

2. परपरागण

एक पौधे के फूल के परागकण उसी प्रजाति के दूसरे पौधे के फूल के वर्तिकाग्र तक पहुँचते हैं।

परागण में सहायता करने वाले माध्यम—

  • वायु

  • जल

  • कीट

  • पक्षी आदि


निषेचन (Fertilization)

नर और मादा युग्मक के संलयन को निषेचन कहते हैं।

फूलों में परागकण वर्तिकाग्र पर पहुँचने के बाद अंकुरित होकर परागनलिका बनाते हैं।

परागनलिका वर्तिका से होते हुए अंडाशय और फिर बीजांड तक पहुँचती है।

वहाँ नर युग्मक और मादा युग्मक का संलयन होता है।

नर युग्मक + मादा युग्मक → युग्मनज

युग्मनज आगे चलकर भ्रूण का निर्माण करता है।


निषेचन के बाद फूल में परिवर्तन

निषेचन के बाद—

बीजांड → बीज

अंडाशय → फल

युग्मनज → भ्रूण

भ्रूण → नया पौधा

यह बोर्ड परीक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।


द्विनिषेचन (Double Fertilization)

पुष्पीय पौधों की एक विशेषता है द्विनिषेचन

इसमें एक नर युग्मक अंडाणु से मिलकर युग्मनज बनाता है।

दूसरा नर युग्मक ध्रुवीय नाभिकों के साथ मिलकर एंडोस्पर्म नाभिक बनाता है, जिससे बाद में भ्रूण के पोषण के लिए एंडोस्पर्म विकसित होता है।

इसलिए इसे द्विनिषेचन कहते हैं।


4. वृद्धि और विकास

वृद्धि (Growth) क्या है?

जीव के आकार, भार, आयतन या कोशिकाओं की संख्या में होने वाली स्थायी और सामान्यतः अपरिवर्तनीय वृद्धि को वृद्धि कहते हैं।

उदाहरण—

एक बीज से छोटा पौधा और फिर बड़ा पौधा बनना।

वृद्धि के कारण

वृद्धि मुख्यतः दो प्रक्रियाओं से संबंधित है—

  • कोशिका विभाजन

  • कोशिकाओं का आकार बढ़ना


विकास (Development) क्या है?

जीव के जीवन में होने वाले आकार, संरचना, कार्य और संगठन से संबंधित क्रमिक परिवर्तनों को विकास कहते हैं।

अर्थात्—

वृद्धि = शरीर का बड़ा होना

विकास = शरीर का अधिक परिपक्व और कार्यात्मक बनना


वृद्धि और विकास में अंतर

वृद्धिविकास
आकार या भार में वृद्धिसंरचना और कार्य में क्रमिक परिवर्तन
इसे मापा जा सकता हैइसमें गुणात्मक परिवर्तन भी होते हैं
मुख्यतः कोशिका विभाजन और वृद्धि से संबंधितवृद्धि के साथ अंगों और कार्यों का परिपक्व होना
उदाहरण: पौधे की लंबाई बढ़नाउदाहरण: पौधे में फूल और फल बनना

पौधों में वृद्धि

पौधों की वृद्धि मुख्यतः विभज्योतक ऊतकों (Meristematic tissues) के कारण होती है।

इन ऊतकों की कोशिकाएँ लगातार विभाजित हो सकती हैं।

मुख्य विभज्योतक—

1. शीर्षस्थ विभज्योतक

जड़ और तने के शीर्ष पर पाया जाता है।

कार्य → लंबाई में वृद्धि

2. पार्श्व विभज्योतक

पौधे की मोटाई बढ़ाने में सहायता करता है।

3. अंतर्वेशी विभज्योतक

कुछ पौधों में गांठों या उनके आसपास पाया जाता है और लंबाई की वृद्धि में सहायता करता है।


पौधों के हार्मोन और वृद्धि

पौधों में कुछ रासायनिक पदार्थ वृद्धि और विकास को नियंत्रित करते हैं। इन्हें पादप हार्मोन या फाइटोहॉर्मोन कहते हैं।

महत्वपूर्ण पादप हार्मोन—

ऑक्सिन (Auxin)

मुख्य कार्य—

  • कोशिका की लंबाई बढ़ाना

  • तने की वृद्धि

  • प्रकाशानुवर्तन में सहायता

  • जड़ बनने में सहायता

  • कुछ परिस्थितियों में फल विकास में सहायता

जिबरेलिन (Gibberellin)

मुख्य कार्य—

  • तने की लंबाई बढ़ाना

  • अंतरपर्व की वृद्धि

  • बीज अंकुरण में सहायता

  • कुछ पौधों में फूल आने को प्रभावित करना

साइटोकाइनिन (Cytokinin)

मुख्य कार्य—

  • कोशिका विभाजन को बढ़ावा देना

  • कोशिका वृद्धि और विकास में सहायता

  • पत्तियों के वृद्धावस्था की प्रक्रिया को धीमा करना

एथिलीन (Ethylene)

मुख्य कार्य—

  • फलों के पकने में सहायता

  • कुछ वृद्धि संबंधी प्रक्रियाओं को प्रभावित करना

एब्सिसिक अम्ल (ABA)

यह मुख्यतः वृद्धि को रोकने या धीमा करने वाला हार्मोन माना जाता है।

मुख्य कार्य—

  • बीज की निष्क्रियता/डॉर्मेंसी में सहायता

  • प्रतिकूल परिस्थितियों में पौधे की प्रतिक्रिया

  • रंध्र बंद करने में सहायता


जीवन की निरंतरता — पूरा अध्याय एक नजर में

                 जीवन की निरंतरता
                        │
        ┌───────────────┼────────────────┐
        │               │                │
  कोशिका विभाजन      प्रजनन          वृद्धि-विकास
        │               │                │
   ┌────┴────┐      ┌───┴───┐       कोशिका विभाजन
   │         │      │       │            │
समसूत्री   अर्धसूत्री अलैंगिक लैंगिक      │
विभाजन     विभाजन     │       │           │
   │         │       एक जनक  दो युग्मक     │
   │         │                         ┌───┴───┐
   │         │                         │       │
शरीर की    युग्मक                  वृद्धि   विकास
वृद्धि      निर्माण
                         │
                पुष्पीय पौधों में
                  लैंगिक प्रजनन
                         │
              परागण → निषेचन
                         │
                    युग्मनज
                         │
                      भ्रूण
                         │
                       बीज
                         │
                     नया पौधा

⭐ बोर्ड परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण बातें

  1. कोशिका विभाजन → नई कोशिकाओं के निर्माण की प्रक्रिया।

  2. समसूत्री विभाजन → दो पुत्री कोशिकाएँ, गुणसूत्र संख्या सामान्यतः समान।

  3. अर्धसूत्री विभाजन → युग्मक निर्माण, गुणसूत्र संख्या आधी।

  4. प्रजनन → जाति की निरंतरता के लिए आवश्यक।

  5. अलैंगिक प्रजनन → सामान्यतः एक जनक।

  6. लैंगिक प्रजनन → नर और मादा युग्मकों का संलयन।

  7. पुंकेसर → नर प्रजनन अंग।

  8. स्त्रीकेसर → मादा प्रजनन अंग।

  9. परागण → परागकण का वर्तिकाग्र तक पहुँचना।

  10. निषेचन → नर और मादा युग्मक का संलयन।

  11. युग्मनज → निषेचन का उत्पाद।

  12. बीजांड → बीज

  13. अंडाशय → फल

  14. पुष्पीय पौधों में द्विनिषेचन एक महत्वपूर्ण विशेषता है।

  15. वृद्धि → आकार/भार में स्थायी वृद्धि।

  16. विकास → संरचना एवं कार्य में क्रमिक परिवर्तन।

  17. ऑक्सिन → कोशिका लंबाई और प्रकाशानुवर्तन में महत्वपूर्ण।

  18. जिबरेलिन → तने की वृद्धि और बीज अंकुरण में महत्वपूर्ण।

  19. साइटोकाइनिन → कोशिका विभाजन।

  20. एथिलीन → फल पकना।

  21. ABA → वृद्धि अवरोध और प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रतिक्रिया।

 

कोशिका विभाजन

A. सही विकल्प का चयन कीजिए — MCQ [1 अंक]

1. क्रोमोसोम मुख्य रूप से किससे बने होते हैं?

उत्तर: (b) DNA और प्रोटीन से

2. क्रोमोसोम्स का द्विगुणन होता है—

उत्तर: (a) इंटरफेज में

3. सेंट्रोसोम का कार्य है—

उत्तर: (a) कोशिका विभाजन को प्रारंभ करना तथा स्पिंडल तंतुओं के निर्माण में सहायता करना।

4. क्रोमैटिड्स का पृथक्करण होता है—

उत्तर: (c) एनाफेज

5. वह न्यूक्लिक अम्ल जिससे क्रोमोसोम मुख्य रूप से बना है—

उत्तर: (a) DNA

6. जिस प्रकार के कोशिका विभाजन में क्रोमोसोम की संख्या आधी हो जाती है, वह है—

उत्तर: अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis)

7. असूत्री कोशिका विभाजन एक प्रकार का है—

उत्तर: (c) प्रत्यक्ष कोशिका विभाजन

8. असूत्री कोशिका विभाजन होता है—

उत्तर: (b) जीवाणु कोशिका में

9. असूत्री कोशिका विभाजन नहीं होता है—

उत्तर: (प्रश्न में दिए विकल्पों के अनुसार) अमीबा/यीस्ट/जीवाणु में प्रत्यक्ष विभाजन की बात संदर्भ पर निर्भर है; सामान्य उदाहरणों में अमीबा और जीवाणु में प्रत्यक्ष विभाजन बताया जाता है।

10. समसूत्रण कोशिका विभाजन इनमें नहीं होता है—

उत्तर: (a) स्पर्मेटोसाइट
(स्पर्मेटोसाइट में अर्धसूत्री विभाजन प्रमुख रूप से होता है।)

11. समसूत्रण के फलस्वरूप पुत्री कोशिकाओं में क्रोमोसोम की संख्या हो जाती है—

उत्तर: (a) मातृ कोशिका के बराबर

12. समसूत्री विभाजन के अंत में एक मातृ कोशिका से पुत्री कोशिकाओं की संख्या होती है—

उत्तर: (a) 2

13. दो सिस्टर क्रोमैटिड अलग होते हैं—

उत्तर: (c) एनाफेज

14. किस अवस्था में केंद्रक झिल्ली तथा न्यूक्लियोलस लुप्त होते हैं?

उत्तर: (b) प्रोफेज

15. निम्न में से DNA का संरचनात्मक अवयव नहीं है—

उत्तर: (b) यूरेसिल क्षार

16. एमाइटोसिस/असूत्री विभाजन का सही लक्षण है—

उत्तर: (d) गुणसूत्र तथा स्पिंडल तंतु का निर्माण नहीं होता।

17. मियोसिस से संबंधित सही कथन है—

उत्तर: (c) यह आनुवंशिक विभिन्नता वाली हैप्लॉइड युग्मकों का निर्माण करता है।

18. निम्न घटनाओं का सही क्रम है—

(A) संतति गुणसूत्र विपरीत ध्रुवों की ओर जाते हैं → एनाफेज
(B) केंद्रक झिल्ली तथा न्यूक्लियोलस लुप्त होते हैं → प्रोफेज

उत्तर: (b) A–एनाफेज, B–प्रोफेज

19. मनुष्य की नवीन संतति कोशिका में प्रत्येक गुणसूत्र के साथ DNA अणुओं की संख्या होती है—

उत्तर: (b) 1
(विभाजन पूरा होने के बाद प्रत्येक क्रोमोसोम सामान्यतः एक DNA अणु वाली एक क्रोमैटिड के रूप में रहता है।)

20. सही जोड़ा चुनिए—

उत्तर: टेलोफेज — केंद्रक झिल्ली तथा न्यूक्लियोलस का पुनः प्रकट होना।

21. गुणसूत्र के अंतिम भाग का नाम है—

उत्तर: (b) टेलोमियर


B. अति संक्षिप्त उत्तर [1 अंक]

1. कोशिका विभाजन की किस अवस्था में क्रोमोसोम स्पिंडल के मध्य क्षेत्र में सज जाते हैं?

उत्तर: मेटाफेज।

2. सेंट्रोमियर कहाँ स्थित है?

उत्तर: क्रोमोसोम के दो क्रोमैटिडों को जोड़ने वाले संकुचित भाग पर।

3. किस कोशिका विभाजन में केंद्रक और कोशिका-द्रव्य प्रत्यक्ष रूप से विभाजित होते हैं?

उत्तर: असूत्री विभाजन।

4. कोशिका विभाजन के समय स्पिंडल तंतु क्रोमोसोम के किस भाग से जुड़े होते हैं?

उत्तर: सेंट्रोमियर/काइनेटोकोर से।

5. किस अवस्था में क्रोमोसोम स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं?

उत्तर: प्रोफेज।

6. किस अवस्था में क्रोमोसोम के क्रोमैटिड अलग होते हैं?

उत्तर: एनाफेज।

7. DNA में एडेनिन और गुआनिन किस प्रकार के नाइट्रोजन क्षार हैं?

उत्तर: प्यूरीन।

8. DNA का पूरा नाम लिखिए।

उत्तर: डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल (Deoxyribonucleic Acid)।

9. कौन-सा नाइट्रोजन बेस DNA में होता है, लेकिन RNA में नहीं?

उत्तर: थाइमिन।

10. असूत्री कोशिका विभाजन कहाँ होता है?

उत्तर: अमीबा और कुछ सरल/एककोशिकीय जीवों में।

11. किस प्रकार के कोशिका विभाजन में स्पिंडल तंतु नहीं बनते?

उत्तर: असूत्री विभाजन।

12. वनस्पति और जंतु कोशिका का उदाहरण दीजिए जिसमें असूत्री विभाजन होता है।

उत्तर: वनस्पति में कुछ निम्न श्रेणी के जीवों की कोशिकाएँ; जंतु में अमीबा जैसे एककोशिकीय जीव में प्रत्यक्ष विभाजन देखा जाता है।

13. प्रोफेज : केंद्रक झिल्ली और न्यूक्लियोलस का लुप्त होना :: टेलोफेज : ______

उत्तर: केंद्रक झिल्ली और न्यूक्लियोलस का पुनः प्रकट होना।

14. माइटोसिस : भ्रूणमूल :: मियोसिस : ______

उत्तर: स्पोर मातृ कोशिका/युग्मक-जनक कोशिका।

15. माइटोसिस : भ्रूणमूल :: मियोसिस : ______

उत्तर: स्पोर मातृ कोशिका।

16. प्यूरीन : एडेनिन :: पिरिमिडिन : ______

उत्तर: थाइमिन।

17. कोशिका में तर्कु तंतुओं के बनने से क्या होगा?

उत्तर: क्रोमोसोमों को विभाजन के दौरान विपरीत ध्रुवों तक ले जाने में सहायता होगी।


रिक्त स्थान भरिए

1. एडेनिन एक प्रकार का ______ नाइट्रोजनयुक्त क्षार है।

उत्तर: प्यूरीन।

2. ______ कोशिका विभाजन में तर्कु तंतुओं का निर्माण नहीं होता।

उत्तर: असूत्री।

3. ______ अणु की संकुचित कुंडलित संरचना ही गुणसूत्र है।

उत्तर: DNA-प्रोटीन/क्रोमैटिन पदार्थ।

4. मनुष्य के शरीर की दैहिक कोशिका में ______ ऑटोसोम होते हैं।

उत्तर: 44।

5. यदि मनुष्य में गैमेट मियोसिस के बजाय माइटोसिस से बने, तो प्रत्येक गैमेट में ______ गुणसूत्र होंगे।

उत्तर: 46।


सही या गलत

1. डिम्बाणु केवल माइटोसिस के कारण उत्पन्न होता है।

उत्तर: गलत।

2. DNA में एडेनिन गुआनिन से हाइड्रोजन बंध द्वारा जुड़ा है।

उत्तर: गलत।
एडेनिन थाइमिन से जुड़ता है।

3. माइटोसिस के दौरान क्रॉसिंग ओवर होता है।

उत्तर: गलत।
क्रॉसिंग ओवर मियोसिस के प्रोफेज-I में होता है।

4. प्रत्येक न्यूक्लियोसाइड में नाइट्रोजनयुक्त क्षार तथा फॉस्फोरिक अम्ल होता है।

उत्तर: गलत।
न्यूक्लियोसाइड = नाइट्रोजन क्षार + शर्करा।
न्यूक्लियोटाइड = नाइट्रोजन क्षार + शर्करा + फॉस्फेट।


C. संक्षिप्त उत्तर [2 अंक]

1. यूकैरियोटिक क्रोमोसोम की आकारिक संरचना का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।

उत्तर:
यूकैरियोटिक क्रोमोसोम DNA और प्रोटीन से बना होता है। विभाजन के समय यह संघनित होकर स्पष्ट दिखाई देता है। सामान्यतः इसमें दो सिस्टर क्रोमैटिड होते हैं, जिन्हें सेंट्रोमियर जोड़ता है। इसके सिरों को टेलोमियर कहते हैं।


2. अर्धसूत्री विभाजन कहाँ होता है? इसे न्यूनीकरण विभाजन क्यों कहते हैं?

उत्तर:
अर्धसूत्री विभाजन मुख्यतः प्रजनन कोशिकाओं में होता है और युग्मक/स्पोर निर्माण में महत्वपूर्ण है।

इसे न्यूनीकरण विभाजन कहते हैं क्योंकि इसमें गुणसूत्रों की संख्या द्विगुणित अवस्था से घटकर आधी हो जाती है।


3. कोशिका-चक्र क्या है? इसकी विभिन्न अवस्थाएँ बताइए।

उत्तर:
एक कोशिका के बनने से लेकर उसके अगले विभाजन तक होने वाली घटनाओं के क्रम को कोशिका-चक्र कहते हैं।

मुख्य अवस्थाएँ—

  1. G₁ अवस्था — कोशिका की वृद्धि।

  2. S अवस्था — DNA का द्विगुणन।

  3. G₂ अवस्था — विभाजन की तैयारी।

  4. M अवस्था — केंद्रक विभाजन और साइटोकाइनेसिस।


4. क्रोमोसोम के प्रमुख अवयवों के नाम लिखिए।

उत्तर:
क्रोमोसोम के प्रमुख भाग हैं—

  • क्रोमैटिड

  • सेंट्रोमियर

  • टेलोमियर

  • न्यूक्लियोलर ऑर्गेनाइजर

  • द्वितीयक संकुचन

  • सैटेलाइट


5. वनस्पति और जंतु कोशिका में समसूत्रण की तुलना कीजिए।

उत्तर:

वनस्पति कोशिकाजंतु कोशिका
सामान्यतः सेंट्रिओल स्पष्ट नहीं होतेसेंट्रोसोम/सेंट्रिओल उपस्थित होते हैं
साइटोकाइनेसिस में सेल प्लेट बनती हैसाइटोकाइनेसिस में क्लीवेज फरो बनता है
कोशिका प्लेट केंद्र से बाहर की ओर विकसित होती हैसंकुचन बाहर से अंदर की ओर होता है

6. कोशिका किसे कहते हैं? मुख्य रूप से कितने प्रकार से विभाजित होती है?

उत्तर:
कोशिका जीवों की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई है।

मुख्यतः कोशिका विभाजन के तीन रूप बताए जाते हैं—

  1. असूत्री विभाजन

  2. समसूत्री विभाजन

  3. अर्धसूत्री विभाजन


7. अर्धसूत्री विभाजन के तीन महत्व बताइए।

उत्तर:

  1. युग्मकों में गुणसूत्रों की संख्या आधी करता है।

  2. निषेचन के बाद प्रजाति की गुणसूत्र संख्या स्थिर रखने में सहायता करता है।

  3. क्रॉसिंग ओवर और स्वतंत्र वर्गीकरण द्वारा आनुवंशिक विविधता उत्पन्न करता है।


8. पादप और जंतु कोशिका के साइटोकाइनेसिस में तीन अंतर लिखिए।

उत्तर:

पादप कोशिकाजंतु कोशिका
सेल प्लेट बनती हैक्लीवेज फरो बनता है
गोल्जी निकाय से पेक्टिनयुक्त पदार्थ का योगदान होता हैकोशिका झिल्ली अंदर की ओर धँसती है
विभाजन केंद्र से बाहर की ओर बढ़ता हैविभाजन बाहर से केंद्र की ओर बढ़ता है

9. माइटोसिस की मेटाफेज की तीन विशेषताएँ लिखिए।

उत्तर:

  1. क्रोमोसोम कोशिका के विषुवत तल पर व्यवस्थित होते हैं।

  2. प्रत्येक क्रोमोसोम के सेंट्रोमियर से स्पिंडल तंतु जुड़े होते हैं।

  3. क्रोमोसोम अत्यधिक संघनित होने के कारण स्पष्ट दिखाई देते हैं।


10. माइटोसिस और मियोसिस में तीन अंतर बताइए।

माइटोसिसमियोसिस
सामान्यतः एक विभाजनदो क्रमिक विभाजन
दो पुत्री कोशिकाएँसामान्यतः चार पुत्री कोशिकाएँ
गुणसूत्र संख्या समान रहती हैगुणसूत्र संख्या आधी होती है
क्रॉसिंग ओवर सामान्यतः नहींप्रोफेज-I में क्रॉसिंग ओवर होता है

11. मेटाफेज में गुणसूत्र कहाँ व्यवस्थित होते हैं?

उत्तर:
गुणसूत्र कोशिका के विषुवत तल/मध्य क्षेत्र में व्यवस्थित होते हैं।


12. DNA और RNA में दो अंतर बताइए।

DNARNA
डीऑक्सीराइबोज शर्कराराइबोज शर्करा
थाइमिन उपस्थितयूरेसिल उपस्थित

13. सेंट्रोमियर कहाँ स्थित है? इसका क्या कार्य है?

उत्तर:
सेंट्रोमियर क्रोमोसोम के संकुचित भाग पर स्थित होता है और सिस्टर क्रोमैटिडों को जोड़ता है। इससे स्पिंडल तंतु जुड़ते हैं और क्रोमैटिडों के उचित पृथक्करण में सहायता मिलती है।


14. असूत्री और समसूत्री विभाजन में दो अंतर बताइए।

उत्तर:

असूत्री विभाजनसमसूत्री विभाजन
केंद्रक सीधे विभाजित होता हैक्रमिक अवस्थाओं से होकर विभाजन होता है
स्पिंडल तंतु सामान्यतः नहीं बनतेस्पिंडल तंतु बनते हैं

15. समसूत्री विभाजन के दो महत्व लिखिए।

उत्तर:

  1. जीव की वृद्धि में सहायता करता है।

  2. क्षतिग्रस्त और मृत कोशिकाओं के स्थान पर नई कोशिकाएँ बनाता है।


16. अर्धसूत्री विभाजन के दो महत्व लिखिए।

उत्तर:

  1. युग्मकों में गुणसूत्रों की संख्या आधी करता है।

  2. आनुवंशिक विविधता उत्पन्न करता है।


17. ऑटोसोम किसे कहते हैं?

उत्तर:
लिंग निर्धारण में प्रत्यक्ष रूप से भाग न लेने वाले गुणसूत्रों को ऑटोसोम/दैहिक गुणसूत्र कहते हैं। मनुष्य में 44 ऑटोसोम होते हैं।


18. लिंग क्रोमोसोम से क्या समझते हैं?

उत्तर:
वे गुणसूत्र जो जीव के लिंग निर्धारण में प्रमुख भूमिका निभाते हैं, लिंग गुणसूत्र कहलाते हैं। मनुष्य में X और Y लिंग गुणसूत्र हैं।


19. कोशिका-चक्र क्या है?

उत्तर:
एक कोशिका के निर्माण से लेकर उसके अगले विभाजन तक होने वाली सभी क्रमिक घटनाओं को कोशिका-चक्र कहते हैं।


20. साइटोकाइनेसिस किसे कहते हैं?

उत्तर:
केंद्रक विभाजन के बाद कोशिका-द्रव्य के विभाजन को साइटोकाइनेसिस कहते हैं।


21. कैरियोकाइनेसिस किसे कहते हैं?

उत्तर:
कोशिका के केंद्रक के विभाजन को कैरियोकाइनेसिस कहते हैं।


22. असूत्री कोशिका विभाजन की परिभाषा दीजिए।

उत्तर:
वह प्रत्यक्ष कोशिका विभाजन जिसमें केंद्रक बिना स्पष्ट गुणसूत्र और स्पिंडल तंतुओं के सीधे विभाजित होता है, असूत्री विभाजन कहलाता है।


23. जंतु कोशिका में साइटोकाइनेसिस की विधि बताइए।

उत्तर:
जंतु कोशिका में कोशिका-द्रव्य का विभाजन कोशिका झिल्ली के बीच से अंदर की ओर धँसने से होता है। इसे क्लीवेज फरो कहते हैं। यह फरो धीरे-धीरे गहरा होकर कोशिका को दो पुत्री कोशिकाओं में बाँट देता है।


24. कोशिका-चक्र के दो महत्व लिखिए।

उत्तर:

  1. कोशिका वृद्धि और विभाजन को नियंत्रित करता है।

  2. DNA की प्रतिकृति और कोशिका विभाजन को उचित क्रम में संचालित करता है।


25. DNA और RNA में अंतर लिखिए।

आधारDNARNA
शर्कराडीऑक्सीराइबोजराइबोज
पिरिमिडिन क्षारथाइमिन, साइटोसिनयूरेसिल, साइटोसिन
संरचनासामान्यतः द्विसूत्रीसामान्यतः एकसूत्री
मुख्य भूमिकाआनुवंशिक सूचना का भंडारणप्रोटीन निर्माण में प्रमुख भूमिका

26. दैहिक गुणसूत्र और लिंग गुणसूत्र में अंतर लिखिए।

दैहिक गुणसूत्रलिंग गुणसूत्र
शरीर की सामान्य विशेषताओं के जीन रखते हैंलिंग निर्धारण में प्रमुख भूमिका
मनुष्य में 44मनुष्य में 2
XX/XY को छोड़कर अन्य गुणसूत्रX और Y

27. प्रोफेज और टेलोफेज में विपरीत परिवर्तन के दो उदाहरण लिखिए।

उत्तर:

  1. प्रोफेज में केंद्रक झिल्ली लुप्त होती है; टेलोफेज में पुनः बनती है।

  2. प्रोफेज में न्यूक्लियोलस लुप्त होता है; टेलोफेज में पुनः दिखाई देता है।


28. मियोसिस में गुणसूत्र संख्या में कमी और क्रॉसिंग ओवर का महत्व बताइए।

उत्तर:
गुणसूत्र संख्या में कमी के कारण युग्मकों में गुणसूत्रों की संख्या आधी रहती है और निषेचन के बाद प्रजाति की सामान्य संख्या बनी रहती है।

क्रॉसिंग ओवर से जीनों का पुनर्संयोजन होता है, जिससे आनुवंशिक विविधता उत्पन्न होती है।


29. माइटोसिस की अवस्थाओं को पहचानिए।

(i) विषुवत तल पर गुणसूत्रों की व्यवस्थामेटाफेज

(ii) सिस्टर क्रोमैटिडों का विपरीत ध्रुवों की ओर जानाएनाफेज

(iii) केंद्रक झिल्ली और न्यूक्लियोलस का लुप्त होनाप्रोफेज

(iv) विपरीत ध्रुवों पर नए केंद्रक का निर्माणटेलोफेज


D. विस्तृत उत्तर [5 अंक]

1. साइटोकाइनेसिस किसे कहते हैं? वनस्पति और जंतु साइटोकाइनेसिस में अंतर बताइए।

उत्तर:
कैरियोकाइनेसिस अर्थात् केंद्रक विभाजन के बाद कोशिका-द्रव्य के विभाजन को साइटोकाइनेसिस कहते हैं। इसके फलस्वरूप एक मातृ कोशिका से दो पुत्री कोशिकाएँ बनती हैं।

वनस्पति कोशिका में साइटोकाइनेसिस

पादप कोशिका में कठोर कोशिका भित्ति होने के कारण कोशिका झिल्ली अंदर की ओर धँसकर विभाजन नहीं कर सकती। इसलिए कोशिका के मध्य भाग में सेल प्लेट का निर्माण होता है। गोल्जी निकाय से प्राप्त पदार्थ सेल प्लेट के निर्माण में सहायता करते हैं। यह सेल प्लेट धीरे-धीरे बाहर की ओर बढ़ती है और अंत में दो पुत्री कोशिकाओं के बीच नई कोशिका भित्ति का निर्माण करती है।

जंतु कोशिका में साइटोकाइनेसिस

जंतु कोशिका में कोशिका भित्ति नहीं होती। इसलिए कोशिका झिल्ली मध्य भाग में अंदर की ओर धँसती है। इसे क्लीवेज फरो कहते हैं। यह फरो गहरा होता जाता है और अंततः कोशिका दो पुत्री कोशिकाओं में विभाजित हो जाती है।


2. यूकैरियोटिक क्रोमोसोम की बाह्य संरचना का वर्णन कीजिए।

उत्तर:
यूकैरियोटिक क्रोमोसोम DNA और हिस्टोन जैसे प्रोटीन से बना होता है। कोशिका विभाजन के समय यह अधिक संघनित होकर स्पष्ट दिखाई देता है।

इसके प्रमुख भाग हैं—

  1. क्रोमैटिड — विभाजित क्रोमोसोम की प्रत्येक लंबी संरचना।

  2. सेंट्रोमियर — दोनों सिस्टर क्रोमैटिड को जोड़ने वाला संकुचित भाग।

  3. काइनेटोकोर — सेंट्रोमियर क्षेत्र से संबंधित संरचना, जिससे स्पिंडल तंतु जुड़ते हैं।

  4. टेलोमियर — क्रोमोसोम के अंतिम सिरे।

  5. द्वितीयक संकुचन/न्यूक्लियोलर ऑर्गेनाइजर क्षेत्र — कुछ क्रोमोसोमों में पाया जाता है।

  6. सैटेलाइट — कुछ क्रोमोसोमों में द्वितीयक संकुचन के बाद का छोटा भाग।


3. प्रत्येक कोशिका विभाजन के फलस्वरूप कितनी पुत्री कोशिकाएँ उत्पन्न होती हैं? विभाजन का महत्व बताइए।

उत्तर:

असूत्री विभाजन

सामान्यतः एक कोशिका से दो पुत्री कोशिकाएँ बनती हैं।

समसूत्री विभाजन

एक मातृ कोशिका से दो पुत्री कोशिकाएँ बनती हैं।

अर्धसूत्री विभाजन

एक मातृ कोशिका से सामान्यतः चार हैप्लॉइड कोशिकाएँ बनती हैं।

महत्व

  • वृद्धि में सहायता।

  • कोशिकाओं की मरम्मत।

  • प्रजनन कोशिकाओं का निर्माण।

  • गुणसूत्र संख्या बनाए रखना।

  • आनुवंशिक विविधता उत्पन्न करना।


4. यूक्रोमैटिन और हेटेरोक्रोमैटिन में तीन अंतर बताइए।

यूक्रोमैटिनहेटेरोक्रोमैटिन
कम संघनितअधिक संघनित
अपेक्षाकृत हल्का दिखाई देता हैअधिक गहरा दिखाई देता है
सामान्यतः अधिक ट्रांसक्रिप्शनल रूप से सक्रियसामान्यतः कम सक्रिय

5. अर्धसूत्री विभाजन को न्यूनीकरण विभाजन क्यों कहते हैं?

उत्तर:
अर्धसूत्री विभाजन को न्यूनीकरण विभाजन इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाती है।

उदाहरण के लिए, मनुष्य की जनन कोशिका में 46 गुणसूत्र होते हैं। मियोसिस के बाद बनने वाले युग्मकों में केवल 23 गुणसूत्र होते हैं।

निषेचन के समय—

शुक्राणु 23 + अंडाणु 23 = युग्मनज 46

इस प्रकार प्रजाति की गुणसूत्र संख्या प्रत्येक पीढ़ी में स्थिर रहती है।


6. क्रोमोसोम किसे कहते हैं? क्रोमोसोम और क्रोमैटिड में अंतर बताइए।

उत्तर:
DNA और प्रोटीन से बनी, आनुवंशिक सूचना को वहन करने वाली संघनित संरचना को क्रोमोसोम कहते हैं।

क्रोमोसोमक्रोमैटिड
आनुवंशिक पदार्थ की संघनित संरचनाप्रतिलिपित क्रोमोसोम की एक इकाई
DNA और प्रोटीन से बनाDNA और प्रोटीन से बना
प्रतिलिपि बनने के बाद दो सिस्टर क्रोमैटिड हो सकते हैंदो सिस्टर क्रोमैटिड सेंट्रोमियर से जुड़े रहते हैं

7. जीन की परिभाषा लिखिए। वनस्पति कोशिका में साइटोकाइनेसिस की विधि का वर्णन कीजिए।

उत्तर:
DNA का वह विशिष्ट भाग जो किसी विशेष आनुवंशिक सूचना को नियंत्रित करता है, जीन कहलाता है।

पादप कोशिका में साइटोकाइनेसिस सेल प्लेट निर्माण द्वारा होता है। कोशिका के मध्य में गोल्जी निकाय से संबंधित पदार्थों के एकत्र होने से सेल प्लेट बनती है। यह धीरे-धीरे दोनों दिशाओं में फैलती है और अंत में दो पुत्री कोशिकाओं को अलग करने वाली नई कोशिका भित्ति का निर्माण करती है।


8. पादप और जंतु कोशिका के समसूत्री विभाजन में अंतर बताइए। पौधे के किस भाग में माइटोसिस होता है?

उत्तर:

पादप और जंतु कोशिका के माइटोसिस में मुख्य अंतर साइटोकाइनेसिस और सेंट्रोसोम की उपस्थिति से संबंधित है।

पादप कोशिका: सेल प्लेट द्वारा साइटोकाइनेसिस।

जंतु कोशिका: क्लीवेज फरो द्वारा साइटोकाइनेसिस।

पौधों में माइटोसिस मुख्यतः विभज्योतक ऊतकों में होता है, जैसे जड़ और तने के शीर्षस्थ विभज्योतक।

यदि किसी सपुष्पक पौधे में 2n = 18 है, तो—

दैहिक/मेमोफिल कोशिका = 18 गुणसूत्र

नर युग्मक = 9 गुणसूत्र


9. पादप कोशिका के माइटोसिस में अंतिम दो अवस्थाओं का चित्र बनाकर नामांकन कीजिए।

उत्तर:
अंतिम दो अवस्थाएँ हैं—

एनाफेज

  • सिस्टर क्रोमैटिड अलग होते हैं।

  • विपरीत ध्रुवों की ओर जाते हैं।

  • स्पिंडल तंतु दिखाई देते हैं।

टेलोफेज

  • विपरीत ध्रुवों पर नए केंद्रक बनते हैं।

  • न्यूक्लियोलस पुनः बनता है।

  • क्रोमोसोम ढीले होकर क्रोमैटिन में बदलने लगते हैं।

  • इसके बाद सेल प्लेट बनने लगती है।

चित्र में नामांकित करें:

क्रोमोसोम/क्रोमैटिड, स्पिंडल तंतु, सेंट्रोमियर, ध्रुव, सेल प्लेट।


10. यूकैरियोटिक क्रोमोसोम का चित्र बनाकर छह भागों का नाम लिखिए।

उत्तर:
चित्र में निम्न छह भागों का नामांकन करें—

  1. क्रोमैटिड

  2. सेंट्रोमियर

  3. टेलोमियर

  4. न्यूक्लियोलर ऑर्गेनाइजर

  5. द्वितीयक संकुचन

  6. सैटेलाइट

परीक्षा में: X-आकार का साफ क्रोमोसोम बनाकर तीर से प्रत्येक भाग दिखाएँ।


11. क्रोमोसोम, DNA और जीन के अंतर्संबंध का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

क्रोमोसोम, DNA और जीन एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े हैं।

DNA → जीन → क्रोमोसोम

वास्तव में जीन, DNA का एक विशिष्ट भाग है। DNA प्रोटीनों के साथ मिलकर क्रोमैटिन बनाता है। कोशिका विभाजन के समय यही क्रोमैटिन संघनित होकर क्रोमोसोम बनाता है।

इसलिए—

जीन DNA का एक विशिष्ट भाग है और DNA क्रोमोसोम का प्रमुख आनुवंशिक पदार्थ है।


12. इंटरफेज के विभिन्न स्तरों में संश्लेषित रासायनिक अवयवों के प्रकार बताइए। नियंत्रण नष्ट होने पर क्या होगा?

उत्तर:

G₁ अवस्था

कोशिका की वृद्धि होती है और RNA, प्रोटीन तथा अन्य कोशिकीय पदार्थों का निर्माण होता है।

S अवस्था

DNA का द्विगुणन होता है। हिस्टोन प्रोटीन का निर्माण भी DNA पैकेजिंग के लिए आवश्यक होता है।

G₂ अवस्था

विभाजन के लिए आवश्यक प्रोटीन और अन्य पदार्थों का निर्माण होता है।

यदि कोशिका-चक्र का प्राकृतिक नियंत्रण नष्ट हो जाए, तो कोशिकाएँ अनियंत्रित रूप से विभाजित हो सकती हैं। इससे असामान्य कोशिका वृद्धि और ट्यूमर/कैंसर जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है।


13. माइटोसिस और मियोसिस में अंतर लिखिए।

आधारमाइटोसिसमियोसिस
उत्पत्ति स्थलदैहिक कोशिकाएँजनन कोशिकाएँ/जनन ऊतक
विभाजनएकदो क्रमिक विभाजन
गुणसूत्र संख्यासमान रहती हैआधी हो जाती है
पुत्री कोशिका2सामान्यतः 4
क्रॉसिंग ओवरसामान्यतः नहींप्रोफेज-I में
महत्ववृद्धि एवं मरम्मतयुग्मक/स्पोर निर्माण एवं विविधता

14. सेंट्रोमियर और टेलोमियर के महत्व का उल्लेख कीजिए। वृद्धि, प्रजनन और पुनर्गठन में कोशिका विभाजन का महत्व लिखिए।

उत्तर:

सेंट्रोमियर

  • सिस्टर क्रोमैटिड को जोड़ता है।

  • स्पिंडल तंतुओं के जुड़ने में सहायता करता है।

  • क्रोमैटिडों के उचित वितरण में महत्वपूर्ण है।

टेलोमियर

  • क्रोमोसोम के सिरों की रक्षा करता है।

  • क्रोमोसोम के सिरों को क्षतिग्रस्त होने से बचाने में महत्वपूर्ण है।

कोशिका विभाजन का महत्व

वृद्धि: नई कोशिकाओं का निर्माण करके शरीर का आकार बढ़ाता है।

प्रजनन: कुछ जीवों में कोशिका विभाजन सीधे प्रजनन में सहायता करता है और लैंगिक प्रजनन में युग्मक निर्माण के लिए आवश्यक है।

पुनर्गठन/मरम्मत: क्षतिग्रस्त या मृत कोशिकाओं के स्थान पर नई कोशिकाएँ बनाता है।


15. जीन, DNA तथा क्रोमोसोम में आपसी संबंध स्थापित कीजिए।

उत्तर:
DNA आनुवंशिक सूचना का प्रमुख पदार्थ है। DNA के विशिष्ट भागों को जीन कहते हैं। DNA प्रोटीनों के साथ मिलकर क्रोमैटिन बनाता है। कोशिका विभाजन के समय क्रोमैटिन संघनित होकर क्रोमोसोम बनाता है।

इस प्रकार—

जीन ⟶ DNA का विशिष्ट भाग

DNA + प्रोटीन ⟶ क्रोमैटिन

संघनित क्रोमैटिन ⟶ क्रोमोसोम


16. मियोसिस से संबंधित निम्न घटनाओं को समझाइए—गुणसूत्र/क्रोमैटिड का अलगाव और क्रॉसिंग ओवर।

उत्तर:

गुणसूत्रों का अलगाव

मियोसिस-I में समजात गुणसूत्र अलग होकर विपरीत ध्रुवों की ओर जाते हैं। मियोसिस-II में सिस्टर क्रोमैटिड अलग होते हैं।

इससे बनने वाली कोशिकाओं में गुणसूत्र संख्या आधी हो जाती है।

क्रॉसिंग ओवर

मियोसिस-I के प्रोफेज-I में समजात गुणसूत्रों की गैर-सिस्टर क्रोमैटिडों के बीच आनुवंशिक पदार्थ के खंडों का आदान-प्रदान होता है। इसे क्रॉसिंग ओवर कहते हैं।

इससे नए जीन संयोजन बनते हैं और आनुवंशिक विविधता बढ़ती है।


चित्रात्मक प्रश्न

1. मेटाफेज का चित्र

चित्र में अनिवार्य रूप से नामांकन करें—

  • क्रोमोसोम

  • स्पिंडल तंतु

  • ध्रुवीय क्षेत्र

  • सेंट्रोमियर

चित्र बनाने का तरीका:
दो विपरीत ध्रुव बनाएँ → दोनों से स्पिंडल तंतु बनाएँ → बीच में X-आकार के क्रोमोसोम विषुवत तल पर बनाएँ → सेंट्रोमियर दिखाएँ।


2. जंतु कोशिका के मेटाफेज का चित्र

नामांकन—

  1. क्रोमैटिड

  2. सेंट्रोमियर

  3. ध्रुवीय क्षेत्र

  4. तर्कु/स्पिंडल तंतु


3. जंतु कोशिका के एनाफेज का चित्र

नामांकन—

  1. ध्रुवीय क्षेत्र

  2. स्पिंडल तंतु

  3. क्रोमैटिड

  4. सेंट्रोमियर


4–5. आदर्श यूकैरियोटिक क्रोमोसोम का चित्र

नामांकन—

  1. क्रोमैटिड

  2. सेंट्रोमियर

  3. न्यूक्लियोलर ऑर्गेनाइजर

  4. टेलोमियर

बोर्ड टिप: चित्र साफ, बड़ा और पेंसिल से बनाएँ। सभी नामों के लिए सीधी रेखा लगाएँ।

.जीवन की निरन्तरता पाठ का (MCQ)

1 . पुत्री  कोशिकाओं के लिए मातृ कोशिका का विभाजन कहलाता है-

उतर :-कोशिका विभाजन

2 . त्रिका कोशिशका में विभाजन

उत्तर :-नहीं होता है

3 .केन्द्रक का विभाजन कहलाता है-

उत्तर :-समसूत्रण

4 .हमारे जीवन का भौतिक आधार है-

उत्तर :-जीवद्रव्य

5. कोशिका का मस्तिष्क है-

उत्तर :-सेंट्रोसोम

6. मनुष्य में गुण सूत्रों की संख्या है-

उत्तर :-46 

7. समसूत्रण है-

उत्तर :-  केन्द्रक विभाजन

8. अर्द्धसूत्री कोशिका विभाजन के फलस्वरूप पुत्री कोशिकायें बनती हैं-

उत्तर :-

9. कोशिका विभाजन की सबसे लम्बी अवस्था है-

उत्तर :-पश्चावस्था

10 . किस पौधे में कभी-कभी नर युग्मक स्वयं ही भ्रूण के रूप में विकसित हो जाता है-

उत्तर :-मंटर में

11. भू-प्रसारिका (offset) प्रकार का वर्धी  प्रजनन मिलता है- 

उत्तर :-जलकुम्भी में

12. मूंगफली का परागण होता है-

उत्तर :-स्व -परागण 

13. मक्के में परागण होता है-

उत्तर :- हवा द्वारा

14. अलैंगिक प्रजनन की विधि है-

उतर :-(a) विखण्ड

 (b) मुकुलन –

 (c) बीजाणु जनन

(d) इनमें से सभी

15.निषेचन की क्रिया मुख्यतः होती है

उत्तर :- पुष्पी पादप तथा जन्तुओं में

16. नर युग्मक तथा मादा युग्मक के संयोजन से बनता है-

उत्तर :- युग्मज

 17. निषेचित अण्डाशय से बनता है-

उत्तर :-फल

18. स्त्री केसर के आधारीय भाग को कहा गया है –

उत्तर :-गर्भाशय

19 .पुंकेसर का अग्रभाग है –

उत्तर :-पारागकोष 

20 .मानव की सबसे संवेदनशील अवस्था है :-

उत्तर :-बाल्यावस्था

.जीवन की निरन्तरता पाठ का रिक्त स्थानों की पूर्ति करो

1 .हमारे शरीर में ऑटोसोम्स की संख्या 23   है।

2 .तर्क तन्तु का निर्माण क्रियाशील एवं निर्विकल्पक अध्यात्मी प्रक्रियाओं में होता है।

3 .नाभिकीय विभाजन की  मिटोसिस और मेयोसिस अवस्थायें होती हैं।

4 .गुणसूत्रों के विनिमय की क्रिया रीकॉम्बिनेशन में होती है।

5 .सेण्ट्रोसोम  गुणसूत्रों में भाग लेता है।

6. प्रजनन द्वारा जीव अपनी जातियों का निर्माण करते हैं।

7. मलेरिया परजीवी में सामान्यता अनुक्रमणिका द्वारा प्रजनन होता है।

8. बीजाणु का निर्माण कोशिकाओं में होता है।

9. शुक्राणु एवं अण्डाणु के संगलन  को सिंगेटिजेशन कहा जाता है।

10. किशोरावस्था में द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का विकास हार्मोनों के कारण होता है।

11. जीवन चक्र है प्रारंभिक विकास तथा परिपक्वता।

12. कोशिका चक्र की विभाजन अवस्था में DNA का संश्लेषण होता है।

13. परिपक्व अण्डाशय गर्भाशय में बनाता है तथा परिपक्व ओवरी से बीज बनता है।

14. सेमल से पर-परागण होता है अणुक्रमणिका द्वारा।

15. मकरन्द का स्राव न्यूरॉन्स द्वारा होता है।

.जीवन की निरन्तरता पाठ का लघुत्तरीय प्रशन :-

1. गुणसूत्र का शाब्दिक अर्थ बताओ।

उत्तर :-गुणसूत्र का शाब्दिक अर्थ है – वह नियम या नियमावली जो किसी विशिष्ट विषय के लिए लागू होती है।

2. किस विधि द्वारा कोशिकायें विभाजित होती हैं?

उत्तर :-कोशिकाएँ अधिकांशतः मितोचोंद्रियों द्वारा विभाजित होती हैं।

3 .जब कोई एक कोशिका दो समान पुत्री कोशिकाओं में विभाजित होती हैं तो क्या वह समसुत्रण के कारण होती है?

उत्तर :-हाँ ,समसुत्रण के कारण  ही एक कोशिका दो समान पुत्री कोशिकाओं में विभाजित होती हैं। 

4. जीन कहाँ स्थित होता है?

उत्तर :-जीन नास्तिक अवस्था में स्थित होता है।

5. कोशिका विभाजन की परिभाषा लिखो।

उत्तर:-जब कोशिका अपने आप को दो या अधिक भागों में विभाजित करती है। तो उसे कोशिका विभाजन कहते है। 

6. प्रोकैरियोटिक कोशिका की परिभाषा लिखो।

उत्तर :-प्रोकैरियोटिक कोशिका एक सरल एककोशीय कोशिका है जो बिना नाभिक कोशिका या बैक्टीरिया कहलाती है।

7. अमीबा में किस प्रकार का प्रजनन होता है?

उत्तर :-अमीबा में भिन्नता संयुक्त पुदाओं के माध्यम से प्रजनन प्रक्रिया होता है ।

8. स्पोर कहने से तुम क्या समझते हो ?इसका निर्माण कहाँ होता है? 

उत्तर :-स्पोर एक सुरक्षित और विशेष शैली की पुत्री अवस्था है जो बैक्टीरिया या फंगस के जीवन का एक विकास अवधि होती है। इसका निर्माण यहाँ होता है कि जहाँ  किसी शरीरिक परिवर्तन या यातायात की जरूरत होती है।

9. वर्धी प्रजनन की परिभाषा लिखो।

उत्तर :-जब नए कोशिकाओं का निर्माण माता कोशिका के बिना होता है।वर्धी प्रजनन  कहते है। 

10. पार्थेनोजिनेसिस की परिभाषा लिखो तथा एक उदाहरण दो।
उत्तर :-इसमें नये व्यक्ति का निर्माण बिना पुरुषीय शुक्राणु के होता है। उदाहरण के रूप में, मधुमक्खीयों में स्त्रीजन्य भ्रंशावस्था।उसे पार्थेनोजिनेसिस  कहते है। 
 
11. पुंकेसर के भागों के नाम लिखो।
उत्तर :-पुंकेसर के निम्नलिखित भाग है. इसके भागों के नाम – जूतासर, तलौ, पेचिशन, स्टॉल, गोल्टैया, क्यूटैया।
 
12. स्व-परागण तथा पर-परागण की परिभाषा लिखो।
उत्तर :-स्व-परागण: जब कोशिका खुद के भीतर ही अपने जीवन की प्रक्रिया पूरी कर लेती है, परागण: जब कोशिका अपने पर्यावरण में अपने जीवन की प्रक्रिया पूरी करती है।
 
13. प्राकृतिक वर्षी प्रजनन के सम्बन्ध में लिखो।
उत्तर :-प्राकृतिक वर्षी प्रजनन वह प्रक्रिया है जिसमें वनस्पतियों द्वारा जल, पोषण, और प्रकाश के संयोजन से बीजों के उत्पन्न होने की संभावना होती है। यह प्रक्रिया प्राकृतिक तत्वों जैसे वायु, जल, मिट्टी, और सूर्य के साथ संबंधित होती है।
 
14. कृत्रिम वर्धी प्रजनन के विभिन्न विधियों का उल्लेख करो।
उत्तर :-कृत्रिम वर्धी प्रजनन के विभिन्न विधियों में जैविक तत्वों का प्रयोग होता है जो बीजों के उत्पन्न होने को बढ़ावा देने में मदद करते हैं। इसमें बीजों को पोषित करने के लिए विशेष उपकरणों का उपयोग किया जाता है।
 
15. कीटों द्वारा पर-परागण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखो।
उत्तर :-कीटों द्वारा पर-परागण एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसमें वे अपनी बीमारियों को फैलाने के लिए परागण का उपयोग करते हैं। यह विशेष रूप से पौधों और पौधों के अंशों के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है।
 
 
 

.जीवन की निरन्तरता पाठ का दीर्घ उत्तरीय प्रशन :

(2.a)कोशिका विभाजन और कोशिका चक्र (Cell division and Cell cycle)

उत्तर :-सजीवों का शरीर एक या अधिक कोशिकाओं द्वारा निर्मित होता है। जिस प्रकार किसी भवन के निर्माण में ईंटों का प्रयोग होता है, जो भवन की इकाई होती हैं, ठीक उसी प्रकार से कोशिका भी जीवन की इकाई (unit of life) है। चूंकि सजीवों का पूरा शरीर कोशिकाओं का बना होता है अतः कोशिकाओं को रचनात्मक इकाइयाँ (primary units) कहते है

उत्तर :-प्रत्येक कोशिका के भीतर जीवन संबंधी क्रियायें; जैसे रक्त परिवहन, श्वसन आदि होता रहता है। फलस्वरूप कोशिकायें क्रियात्मक इकाइयाँ हैं। अतः “कोशिका को जीवन की रचनाशील एवं क्रियाशील इकाई कहते हैं।” (Cell is the underlying and practical unit of life.)

उत्तर :- कोशिकाओं को केन्द्रकीय रचनानुसार प्रोकैरियोटिक, मिजोकैरियोटिक तथा यूकैरियोटिक में विभक्त किया जा सकता है।

(1) प्रोकैरियोटिक कोशिका : वे कोशिकायें जो केन्द्रकीय झिल्ली, केन्द्रक द्रव्य व गुणसूत्र विहीन होती हैं प्रोकैरियोटिक कोशिकायें कहलाती हैं; जैसे जीवाणु, माइकोप्लाज्मा, हरी-नीली शैवाल इत्यादि।

(ii) मिजोकैरियोटिक: कोशिका केन्द्रक युक्त कोशिकायें जिनके गुणसूत्र अम्लीय प्रोटीनयुक्त होते हैं तथा जिनके केन्द्रक को दो भागों में बाँटा जा सकता है, उन्हें मिजोकैरियोटिक कोशिकायें कहते हैं; जैसे पेरिडिनियम, नक्टिलिउका आदि। –

(III) यूकैरियोटिक कोशिका: पूर्ण विकसित कोशिका को यूकैरियोटिक कोशिका कहते हैं। ऐसी कोशिकाओं के वि केन्द्रक के उपादान (केन्द्रक झिल्ली, केन्द्रिका, केन्द्रक द्रव्य तथा केन्द्रक जाल) उपस्थित रहते हैं तथा कोशिका द्रव्य में कोशिकांग भी विद्यमान रहते हैं। इन कोशिकाओं के गुणसूत्र क्षारीय प्रोटीन युक्त होते हैं

उत्तर: प्रोकैरियोटिक कोशिका

(1) प्रोकैरियोटिक कोशिका में केन्द्रीय झिल्ली की अनुपस्थिति के कारण सत्य केन्द्रक नहीं पाया जाता है

(2) प्रोकैरियोटिक में केन्द्रिका अनुपस्थित होती है।

(3) गॉल्गीकाय, अन्तः प्रद्रव्यी पदार्थ व माइटोकॉण्ड्रिया प्रोकैरियोटिक में अनुपस्थित होते हैं।

(4) कोशिका भित्ति, प्रोकैरियोटिक की सेलुलोज रहित होती है।

(5) हरित लवक की अनुपस्थिति प्रोकैरियोटिक में होती है।

(6) प्रोकैरियोटिक कोशिका में एक गुणसूत्र होता है।

यूकैरियोटिक कोशिका

1. यूकैरियोटिक कोशिका में झिल्ली सहित सत्य केन्द्रक पाया जाता है।

2. यूकैरियोटिक कोशिका में केन्द्रिका उपस्थित होती है।

3. यूकेरियोट्स में गॉल्जीक बॉडी, एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम और प्रोकैरियोटिक मौजूद होते हैं।

4. यूकैरियोटिक की कोशिका भित्ति सेलुलोज युक्त होती है।

5. हरित लवक यूकैरियोटिक कोशिकाओं में उपस्थिति होती है।

6. यूकैरियोटिक कोशिका में अनेक गुणसूत्र होते हैं।

केन्द्रक कोशिका का दिमाग है।

उत्तर :-कोशिका का मस्तिष्क केन्द्रक कहलाता है तथा केन्द्रक निम्न रचनाओं से निर्मित होता है- (a) केन्द्रकीय झिल्ली (atomic film), (b) केन्द्रक द्रव्य (nucleo plasm), (c) केन्द्रिका (nucleolus) तथा (d) गुणसूत्र (chromosomes) केन्द्रकीय झिल्ली

(a) केन्द्रकीय झिल्ली (Atomic membrance)- केन्द्र को घेरे रहने वाली झिल्ली केन्द्रकीय झिल्ली कहलाती है।

(b) केन्द्रक द्रव्य (Nucleoplasm)- केन्द्रकीय झिल्ली गुहिका से घिरे हुए गह्वर में प्रोटिनित तरल भरा रहता है जिसे केन्द्रक द्रव्य कहते हैं।

(c) केन्द्रिका (Nucleolus)- केन्द्रक द्रव्य में एक या अधिक गोलाकार आकृतियाँ पायी जाती हैं जिन्हें केन्द्रक कहते हैं। इनमें राइबोसोम का संश्लेषण होता है जिसके कारण केन्द्रिका में राइबोसोम घने रूप से भरे होते हैं।

(d) गुणसूत्र (Chromosome)- इसके केन्द्रक द्रव्य(nucleoplasm) में एक विशेष पदार्थ न्यूक्लियोप्रोटीन (nucleoprotein) रहता है जिसे क्रोमैटिन (chromatin) कहते हैं।

कोशिका की विश्राम अवस्था में यह दानेदार (granular) रूप में के विसरित (diffused) रहता है तथा कोशिका विभाजन (cell division) के दौरान यह लम्बे सूत्रों का रूप धारण कर लेता है। इन सूत्रों को उपयुक्त रंगों में रंगने पर ये । खूब गहरे रंग जाते हैं। इसलिएइन्हें क्रोमोसोम या गुणसूत्र कहते हैं।

 उत्तर :-कोशिका  की विश्राम अवस्था में यह दानेदार (granular) रूप में के विसरित (diffused) रहता है तथा कोशिका विभाजन (cell division) के दौरान यह लम्बे सूत्रों का रूप धारण कर लेता है। इन सूत्रों को उपयुक्त रंगों में रंगने पर ये । खूब गहरे रंग जाते हैं। इसलिएइन्हें क्रोमोसोम या गुणसूत्र कहते हैं।

गुणसूत्र का पता सबसे पहले स्ट्रास बर्गर ने 1875 ई० में लगाया तथा 1918 ई० में वाल्डेयर (Waldeyer) ने इसे क्रोमोसोम का नाम दिया। एक जाति के जीवों की कोशिकाओं के केन्द्रकों में गुणसूत्र की संख्या निश्चित होती है तथा ये हमेशा जोड़े में रहते हैं।

गुणसूत्र की संख्या (Chromosome number)- शरीर में शारीरिक कोशिकायें (substantial cells or body cells) और जनन कोशिकायें (microorganism cells) ये दो प्रकार की कोशिकाएं मिलती हैं। शारीरिक कोशिकाओं में गुणसूत्र हमेशा जोड़े में रहते हैं। और इसे ‘2n’ द्वारा प्रदर्शित करते हैं तथा द्विगुणित (diploid) की संज्ञा देते हैं;

 दूसरी ओर जनन कोशिकाओं में गुणसूत्र की संख्या, शारीरिक कोशिकाओं से आधी होने के कारण अगुणित (haploid) कहलाती हैं तथा इसे ‘n’ द्वारा प्रदर्शित करते हैं। जोड़े के प्रत्येक गुणसूत्र हर दृष्टिकोण से सदृश होने के कारण समजात (homologous) कहलाते हैं। उदाहरण – हमारे शरीर की शारीरिक कोशिकाओं में गुणसूत्र की संख्या =44 एंव 2n =44 होता है।

गुणसूत्र के प्रकारउत्तर :-गुणसूत्र के प्रकार (Kinds of chromosomes)- लिंग अथवा लक्षणों के आधार पर गुणसूत्र दो प्रकार के होते है-(a) आटोसोम (Autosomes) तथा (b) लैंगिक गुणसूत्र (Sex chromosomes)

(a) आटोसोम (Autosome) – वे क्रोमोजम जिन पर शारीरिक गठन में भाग लेने वाले जौन उपस्थित रहते हैं आटोसोम कहते हैं। मनुष्य में 23 जोड़ी क्रोमोजोम में 22 जोड़ी क्रोमोजोम अटोसोम होते हैं। वे लिंग निर्धारण में भाग नहीं लेते केवल शारीरिक गठन में भाग लेते हैं।

(B) लैंगिक गुणसूत्र (Sex chromosome)- वे क्रोमोजम जिन पर लिंग निर्धारण करने वाले जीन्स उपस्थित रहते है उन्हें लैंगिक गुणसूत्र (sex chro-mosome) या एलोसम (Allosome) कहते हैं, जैसे मनुष्य में 23 जोड़ी क्रोमोजोम में 1 जोड़ी क्रोमोजोम लिग निर्धारण में भाग लेता है। अतः इसे लैंगिक गुणसूत्र कहते हैं। मानव में ये दो प्रकार के होते हैं-x-गुणसूत्र तथा Y गुणसूत्र। ४ गुणसूत्र लम्बा तथा छड़ के आकार का होता है परन ४ गुणसूत्र छोटे आकार का होता है। पुरुष में दो प्रकार के गुणसूत्र मिलते हैं लेकिन त्री में एक जोड़े × गुणसूत्र ही होते हैं।

उत्तर :-जीन (Quality)- क्रोमोजोम पर उपस्थित वे विशिष्ट कण जो आनुवांशिक लक्षणों के वाहक होते हैं उन्हें जीन कहते ये DNA द्वारा गठित होते हैं। प्रत्येक आनुवंशिक लक्षण का नियंत्रण एक जोड़ा जौन करता है जो अलग-अलग समजात गुणसू पर स्थित होते हैं। जीन को आनुवंशिकता की इकाई माना जाता है।

गुणसूत्र की बनावट पर टिपण्णीउत्तर :-गुणसूत्र की बनावट (Construction of Chromosome)- दो क्रोमोनिमाटा गुणसूक्क बिन्दु पर जुटकर जिस धागे सदृश रचना को विकसित करते हैं, गुणसूत्र कहते  हैं।

प्रत्येक गुणसूत्र में हिस्टोन (histone) नामक प्रोटीन तथा DNA एवं RNA मिलते है (DNA-Deoxyribo Nucleic Corrosive) (RNA-Ribo Nucleic Corrosive)

DNA के कई धागे आपस में लिपटकर प्रत्येक कोमोनिमाटा में एक अक्ष (pivot) बनाते हैं, जो थोड़ी-थोड़ी दूरी पर फूलकर दाने जैसी दो मोटी रचनायें बनाना है जिन्हें कोमोमियर्स (chromomeres) कहते हैं। इनके जोड़ों के अक्ष के दोनों ओर DNA धागे लूप की तरह निकले होते हैं जिनपर RNA तथा प्रोटीन से बनी मैट्रिक्स होती हैं। मुष्णसूरों पर जीन्स होती हैं जो लक्षणों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुंचाती हैं। एक गुणसूत्र पर DNA के अणुओं की संख्या 10,000 से 20,000 तक होती है।

उत्तर :-DNA की आणविक संरचना ज्ञात करने का श्रेय James D. Watson नामक अमरीकी तथा F.H.C. Cramp नामक अंग्रेज वैज्ञानिकों को जाता है, जिसके लिए सन् 1962 में इन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इनके अनुसार DNA न्यूक्लिअलोटाइड्स के बने होते हैं जिनमें शर्करा (sugar), फॉस्फेट्स तथा नाइट्रोजन आधार होता है। 

शर्करा डी ऑक्सी राइबोज प्रकार की होती है तथा नाइट्रोजन आधार-एडिनीन, ग्वानीन, साइटोसिन तथा थाइमीन-चार प्रकार के होते हैं। थाइमीन तथा साइटोसीन पिरीमिडीन (pyrimidine) एवं एडिनीन व ग्वानीन प्यूरीन (purine) के नाम से जाने जाते हैं।

DNA के कार्य (Capability of DNA) – (1) DNA आनुवंशिक लक्षणों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुँचाते हैं। (2) इनका समस्त जैविक क्रियाओं पर नियंत्रण होता है। (3) इनके द्वारा RNA का संश्लेषण होता है। (4) विकर (Chemical) के निर्माण को नियंत्रित करता है जो जीवन की समस्त क्रियाओं का नियमन करते हैं। (5) DNA के द्वारा क्रोमेटिन जाल के अधिकांश भाग का निर्माण होता है। (6) DNA के द्वारा जीवों में उत्परिवर्तन (change) होता है।

उत्तर :-RNA-RNA में मात्र एक सूत्र होता है तथा शर्करा राइबोज प्रकार की होती है। नाइट्रोजन आधारों में थाइमीन के स्थान पर यूरेसिल नामक पिरीमिडीन होता है। कोशिका में निम्न तीन प्रकार के RNA मिलते हैं।

RNA के कार्य (Function of RNA)- (1) RNA का प्रमुख कार्य प्रोटीन अणुओं का संश्लेषण करना है। (2) DNA के कार्यों में सहायक होना होता है।

 

DNA और RNA में अन्तर लिखो :-

उत्तर :-DNA 

(i) DNA में दो सूत्र होते हैं।

(ii) DNA में डिऑक्सी राइबोज शर्करा होती है।

(iii) DNA में नाइट्रोजन आधार एडिनीन, ग्वानीन, साइटोसीन तथा थाइमीन होते हैं।

(iv) DNA आनुवंशिकता का वाहक होने के साथ-साथ कोशिका की समस्त रासायनिक क्रियाओं पर नियंत्रण करता है।

RNA 

(I) RNA केवल एक सूत्र का बना होता है।

(ii) RNA में राइबोज प्रकार की शर्करा ।

(iii) RNA में थाइमीन के स्थान पर यूरेसिल होता है।

(iv) DNA द्वारा निर्मित RNA प्रोटीन अणुओं के संश्लेषण में सहायता देता है।

 उत्तर :-(1) कोशिका विभाजन परिपक्व कोशिकाओं सम्पत्र होता है। (2) इस प्रक्रिया द्वारा कोशिकाओं की मात्र संख्या में वृद्धि नहीं होती चरन् जीवधारी के आयतन में वृद्धि होते है। (3) कोशिकाओं के टूट-फूट की मरम्मत होती है। (4) गुणसूत्र की संख्या स्थिर बनी रहती है। (5) कोशिका विभाजन द्वारा प्रजनन में सहायता मिलती है एवं भ्रूण का विकास होता है।

उत्तर :- कोशिका विभाजन की क्रिया निम्नलिखित विधियों द्वारा सम्पत्र होती है-(1) स्वतंत्र कोशिका निर्माण (Free cell arrangement), (2) असूत्री विभाजन (Amitosis or Direct atomic division), (3) सूत्री कोशिका विभाजन (Mitosis) तथा (4) अर्द्धसूत्री कोशिका विभाजन (Meiosis)।

asutr kosika vibhajanअसूत्री कोशिका विभाजन :-कोशिका विभाजन को ऐसी विधि जिसमें मातृ कोशिका का केन्द्रक प्रत्यक्ष रूप से दो भागों में विभाजित होकर दो संतति कोशिकाओं की उत्पत्ति करता है, असूत्रौ विभाजन अथवा प्रत्यक्ष केन्द्रीय विभाजन कहलाती है। 

इस विभाजन में केन्द्रक एक और या मध्य में पतला होने लगता है तथा अन्त में अत्यन्त पतला होकर दो भागों में बँट जाता है। यह विधि तब तक जारी रहती है जब तक कि मातृ- कोशिका के अन्दर बहुत सारे केन्द्रकों का निर्माण नहीं हो जाता। इस प्रकार से विकसित केन्द्रक छोटे-बड़े होते हैं। प्रत्यक्ष केन्द्रकीय विभाजन के बाद कोशिका विभाजन हो सकता है अथवा नहीं भी हो सकता है।

कोशिका विभाजन की यह सरल प्रक्रिया निम्न श्रेणी के जीवों; जैसे प्रोटोजोओं, शैवाल, कवक इत्यादि में होती है। इस विभाजन के फलस्वरूप जब समान आकार की कोशिकाओं का निर्माण होता है तो इसे भंजन (parting) कहते हैं तथा असमान कोशिकाओं का निर्माण होने पर मुकुलन (Maturing) कहते हैं।

samsutr kosika vibhajanउत्तर :- शारीरिक कोशिका (physical cell) के विभाजन की वह विधि जिसमें एक मातृ कोशिका के केन्द्रक के केवल एक बार विभाजन से समरूप तथा समान गुणसूत्र की संख्या वाली दो संतति कोशिकायें (girl cells) बनती है, समसूत्रण कहलाती है।

उत्तर :- अर्द्धसूत्री कोशिका विभाजन (Meiosis cell division)- अर्द्धसूत्री कोशिका विभाजन केन्द्रक विभाजन की वह विधि है जिसमें द्विगुणित गुणसूत्र की संख्या वाली एक मातृकोशिका के लगातार दो बार विभाजन के फलस्वरूप अगुणित गुणसूत्र की संख्या वाली चार पुत्री कोशिकाएं उत्पन्न होती हैं।

कोशिका चक्र (Cell Cycle) पर टिपण्णी लिखो। • कोशिका चक्र (Cell Cycle) – कोशिका विभाजन के दौरान DNA का प्रतिकरण (replication), केन्द्र का विभाजन एवं कोशिका द्रव्य का विभाजन होता है। इसके साथ-साथ कोशिका में वृद्धि भी होती है। किसी कोशिका के निर्माण से लेकर उसके विभाजन द्वारा पुत्री कोशिकाओं के बनने तक की क्रिया को कोशिका चक्र (cell cycle) कहते हैं। 

हालांकि कोशिका में होने वाली वृद्धि एक सतत् (nonstop) प्रक्रिया है, लेकिन कोशिका चक्र की विभिन्न अवस्थानों में भिन्न-भिन्न कार्य सम्पादित होते हैं। उदाहरण के तौर पर, DNA का संश्लेषण कोशिका चक्र के एक खास अवस्था के दौरान होता है। संश्लेषित होने के बाद DNA का पुत्री कोशिकाओं में वितरण जटिल क्रियाओं द्वारा होता है। इन अवस्थाओं का आनुवंशिक नियंत्रण (hereditary control) होता है। विभाजन में सक्षम प्रत्येक कोशिका ( को कोशिका चक्र की अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है।

कोशिका चक्र की अवस्थाएँ (Periods of Cell cycle) : कोशिका चक्र की दो मुख्य अवस्थाएँ होती हैं-अंतरावस्था ( interphase) एवं माइटोटिक अथवा एम-अवस्था (Mitotic or M-phase)। कोशिका के वास्तविक विभाजन के पूर्व की अवस्था को अंतरावस्था कहते हैं। इस अवस्था में केन्द्रक चयापचयी तौर पर (metabolically) सक्रिय रहता है। इसके बाद को अवस्था को माइटोटिक अवस्था कहते हैं जिसमें केन्द्रक एवं कोशिका का वास्तविक विभाजन होता है।

अलग-अलग कोशिकाओं एवं जीवों के कोशिका चक्र की अवधि में अन्तर होता है; जैसे- मानव कोशिकाएँ लगभग २७ घंटे में एक बार विभाजित होती हैं। इस 24 घंटे के कोशिका चक्र में 95% समय अंतरावस्था में लगती है जबकि वास्तविक कोशिका विभाजन यानि माइटोटिक अवस्था लगभग एक घंटे की ही होती है। कई जीवों में कोशिका चक्र की अवधि बहुत कम होती है, जैसे योस्ट (yeast) कोशिकाएं लगभग 90 मिनटों में कोशिका चक्र पूरा करती हैं।

उत्तर :-अंतरावस्था के बाद कोशिका विभाजन की वास्तविक अवस्था को M-अवस्था या माइटोटिक अवस्था कहते हैं

समसूत्री (Mitosis)- कोशिका विभाजन की वह विधि जिसमें केन्द्र के एक बार विभाजन से समान गुण व गुणसूत्र की समान संख्या वाली दो संतति कोशिकायें उत्पन्न होती हैं, अर्द्धसूत्रण या अर्द्धसूत्री कोशिका विभाजन कहते हैं।

अवस्थान (Area)- समसूत्री कोशिका विभाजन की क्रिया शारीरिक कोशिकाओं (physical cells) में होती है, इसलिए इसे सोमैटोजिनेसिस (smatogenesis) भी कहते हैं। कोशिका विभाजन की इस क्रिया में मातृ कोशिका में गुणसूत्र की संख्या जितनी होती है, उसके द्वारा उत्पन्न संतति कोशिकाओं में गुणसूत्र की संख्या समान ही होती है। अतः इस विभाजन को समीकरणीय विभाजन (equational division) के नाम से भी जानते हैं।

उत्तर :- कैरिओकाइनेसिस  केन्द्रक विभाजन की एक विधी  है। जो चार अवस्थाओं में सम्पन्न होती है। (a )पूर्वावस्था  (b )मध्यावस्था  (c ) पस्श्चावस्था  (d )अंत्यावस्था 

उत्तर :-कोशिका विभाजन की वह विधि जिसमें केन्द्र के एक बार विभाजन से समान गुण व गुणसूत्र की समान संख्या वाली दो संतति कोशिकायें उत्पन्न होती हैं, अर्द्धसूत्रण या अर्द्धसूत्री कोशिका विभाजन कहते हैं। 

जो चार अवस्थाओं में सम्पन्न होती है। (a )पूर्वावस्था  (b )मध्यावस्था  (c ) पस्श्चावस्था  (d )अंत्यावस्था 

जन्तु कोशिका में समसूत्रण (a) पूर्वावस्था (Prophase)- ग्रीक भाषा में Ace अर्थात् First (प्रथम) यह माइटोसिस की प्रथम अवस्था है। इस अवस्था में क्रोमोजोम मोटे, घने तथा स्पष्ट हो जाते हैं तथा केन्द्रक झिल्ली केन्द्रक को चारों तरफ से स्पष्ट रूप से घेरे रहती है। इस अवस्था की निम्नलिखित विशेषताएँ होती है-

(i) केन्द्रक का आकार तथा आयतन बढ़ जाता है। (ii) जल वियोजन (Lack of hydration) के फलस्वरूप केन्द्रक जालिका (atomic reticulum) फूल कर मोटी हो जाती है तथा निश्चित संख्या में घने, मोटे क्रोमोजोम के रूप में परिणित हो जाती है। (iii) प्रत्येक क्रोमोजोम सेन्ट्रोमीयर को छोड़कर लम्बे रूप में विभक्त होकर दो क्रोमेटिड (Chromatid) की रचना करता है। ये क्रोमेटिड सेन्ट्रोमीयर पर आपस में जुड़े रहते हैं। (iv) दोनों क्रोमेटिड परस्पर एक दूसरे के साथ सर्पिलाकार रूप में ऐंठे रहते हैं जिसे स्पाइरलाइजेशन (spiralization) कहते हैं।

b) मध्यावस्था (Metphase) यह  दूसरी अवस्था है। यह अल्प स्थाई होती है। इस अवस्था की निम्नलिखित विशेषताएं होती हैं (1) मेटाफेज आरम्भ होने के पहले केन्द्रक झिल्ली तथा न्यूक्लिओलस पूर्ण रूप से विलुप्त हो जाते हैं। (I) जन्तु कोशिका में केन्द्रक के दोनों धुवों पर स्थित सेन्ट्रिओल से निकलने वाली तारक किरणें (astral beams) विस्तृत होकर स्पिण्डल तन्तु (shaft fiber) का निर्माण करती है। ये तर्क तन्तु आपस में संयुक्त होकर स्पिण्डल (axle) का निर्माण करते हैं।

(c) पश्चावस्था (Anaphase)- यह माइटोसिस विभाजना की तीसरी अवस्था है। ग्रीक में Ana का अर्थ back (पीछे) होता है। इस में अवस्था की निम्नलिखित विशेषताएं होती हैं-(i) मेटाफेज के अन्त या एनाफेज के प्रारम्भ में सेन्ट्रोमीयर एक- एक क्रोमेटिड के साथ दो भागों में विभक्त हो जाता है। इस प्रत्येक सेन्ट्रोमीयर युक्त क्रोमेटिड को पुत्री क्रोमोजोम कहा जाता है। (ii) मातृ क्रोमोजोम से उत्पन्न दो पुत्री क्रोमोजोम (सेन्ट्रोमीयर युक्त क्रोमेटिड) विपरीत ध्रुवों की ओर आकर्षित होने लगते हैं। (iii) एनाफेज में इस प्रकार क्रोमोजोम को विप- रीत ध्रुवों की ओर गति करने की घटना को क्रोमोजोमीय गति कहते है। 

(d) अन्यावस्था (Telophase) – Telo शब्द का ग्रीक अर्थ End (अन्त) है। यह माइयेसिस विभाजन की अन्तिम अवश्य है। इस अवस्था की निम्नलिखित विशेषताएं होती है- (1) तर्क (Spindle) के दोनों ध्रुवों पर समान संख्या में क्रोमोजोम उपस्थित रहते हैं। (i) दोनों धुवों पर क्रोमोजोम को घेर कर एक एक झिल्ली का निर्माण हो जाता है। यह झिल्ली साइटोप्लाज्म में उपस्थित इन्डोप्लाज्मिक रेटिकूलम (endoplasmic reticulum) से उत्पन्न होती है। (ii) न्यूक्लिओलस (Nucleolus) पुनः उत्पन्न है जाता है। 

(Q )वनस्पति कोशिका में साइटोकाइनेसिस और जन्तु कोशिका में साइटोकाइनेसिस में अंतर लिखो

उत्तर :-वनस्पति कोशिका में साइटोकाइनेसिस

1. इसमें साइटोकाइनेसिस की क्रिया सेल प्लेट बनने से होती है।

2. यह क्रिया अन्दर से बाहर की ओर होती है।

3. सेल प्लेट का निर्माण सेलूलोज द्वारा होता है।

4. सेल प्लेट द्वारा कोशिकाद्रव्य विभाजन की क्रिया सेल- प्लेटिंग कोशिका पट्टिका विधि (cell plating method) कहलाती है।

जन्तु कोशिका में साइटोकाइनेसिस

1. इसमें यह क्रिया खाँच (furrow) द्वारा होती है।

2. यह क्रिया वनस्पति कोशिका के विपरीत होती है।

3. कोशिका झिल्ली प्रोटीन अथवा लिपिड की बनी होती है।

4. जन्तु कोशिका द्रव्य विभाजन की क्रिया furrowing ) कहलाती है।

(Q )पादप तथा जन्तु कोशिका के समसूत्रण में अन्तर लोखो

उत्तर :-पादप कोशिका में समसूत्रण

1. पादप कोशिका में तर्कु मात्र केन्द्रक द्रव्य से बनता है।

2. इसमें सेण्ट्रोसोम का अभाव होता है।

3. पादप कोशिका में तर्कु का निर्माण मध्यावस्था में होता है।

4. इसमें सेण्ट्रोओल्स का विपरीत ध्रुवों की ओर जाना नहीं होता क्योंकि सेष्ट्रोसोम का अभाव होता है।

5. कोशिका द्रव्य विभाजन की विधि कोशिका पट्टी बनने के कारण होती है।

जन्तु कोशिका में समसूत्रण

1. जन्तु कोशिका में तर्क का निर्माण तारक किरणों तथा केन्द्रक द्रव्य से सम्मिलित रूप में होता है।

2. जन्तु कोशिका में सेष्ट्रोसोम कोशिका विभाजन में भाग लेता है।

3. इसमें यह पूर्वावस्था में निर्मित हो जाता है।

4. जन्तु कोशिका में सेण्ट्रोसोम के सेण्ट्रीओल्स विपरीत ध्रुवों की ओर जाते हैं।

5. इसमें कटान या खाँच बनने के कारण सम्पन्त्र होती है।

(Q )समसूत्री का महत्व लिखो

उत्तर :- समसूत्री का महत्व (Meaning of Mitosis)- समसूत्री कोशिका विभाजन के कुछ निम्नलिखित महत्व है-(1) एक मातृ कोशिका से उत्पन्न दो पुत्री कोशिकाओं में वही गुण तथा विशेषतायें आ जाती हैं जो मूल मातृ-कोशिका में थीं। इस तरह संतानें मातृ कोशिकाओं के अनुरूप ही होती हैं। (2) विभाजन वर्षों कोशिकाओं में होता है फलस्वरूप कोशिकाओं की संख्या में लगातार वृद्धि होती रहती है। (3) समसूत्रण द्वारा एककोशिकीय जीवधारियों में अलैंगिक प्रजनन की क्रिया होती है।

(Q )अर्द्धसूत्री का महत्व लिखो

उत्तर :-अर्द्धसूत्री का महत्व (Meaning of Melosis)- अर्द्धसूत्री कोशिका विभाजन के निम्न महत्व है-(1) इस विभाजन के फलस्वरूप सजीवों में गुणसूत्र की संख्या स्थिर बनी रहती है। (2) अर्द्धसूत्रण द्वारा नर तथा मादा इकाइयों का निर्माण होता है जो लैंगिक प्रजनन (sexual multiplication) के लिए आवश्यक है। 

(3) इस विभाजन द्वारा नये-नये लक्षणों का विकास होता है क्योंकि इसमें विनिमय (getting over) द्वारा जीन्स (qualities) का आदान-प्रदान होता है। (अर्द्धसूत्री कोशिका विभाजन के प्रथम पूर्वावस्था में समजात गुणसूत्र के क्रोमैटिड्स के जीन्स के आदान-प्रदान की क्रिया को विनिमय कहते हैं।) (4) इस विभाजन के फलस्वरूप माता-पिता तथा संतानों में विभिन्नतायें (varieties) आती हैं जो क्रम विकास (development) के लिए आवश्यक हैं।

(Q )समसूत्री तथा अर्द्धसूत्री में अन्तर लिखो

समसूत्री (Mitosis)

1. यह Physical cell के विभाजन की विधि है।

2. इस विभाजन के फलस्वरूप एक मातृ कोशिका से दो पुत्री कोशिकाएं उत्पन्न होती हैं।

3. पुत्री कोशिकाओं में क्रोमोजोम की संख्या मातृ कोशिका के समान रहती है।

4. इस विभाजन में getting over की क्रिया नहीं होती।

5. इस विभाजन के फलस्वरूप शारीरिक अंगों में वृद्धि, विकास तथा टूटी-फूटी कोशिकाओं की मरम्मत होती है।

6. यह एक समरूप विभाजन (Equational division) है।

7. इसके प्रोफेज में कोई उपअवस्था (subphase) नहीं होता।

 

अर्द्धसूत्री (Meiosis)

1. यह Microbe cell विभाजन की विधि है।

2. इस विभाजन के फलस्वरूप एक मातृ कोशिका से चार पुत्री कोशिकाएं उत्पन्न होती हैं।

3. पुत्री कोशिकाओं में क्रोमोजोम की संख्या मातृ कोशिका की आधी हो जाती है।

4. इस विभाजन में getting over की क्रिया होती है।

5. इस विभाजन के फलस्वरूप लैंगिक प्रजनन की इकाई (unit) बनती हैं; जैसे – स्पर्म (sperm) डिम्ब (ova) ।

6. यह एक ह्रास विभाजन (reductional division) है।

7. इसके प्रोफेज में पांच उप अवस्थायें पायी जाती हैं।

(2 .b )प्रजनन (reproduction )

(Q )प्रजनन (Multiplication) किसे कहते है। 

 उत्तर :-सजीव द्वारा अपने ही सदृश सन्तति को उत्पन्न करने की क्रिया को प्रजनन कहते हैं।” या, “जिस जैविक प्रक्रिया द्वारा कोई सजीव अपनी सन्तति की सृष्टि कर अपनी वंश परम्परा को कायम रखते हैं तथा वंश वृद्धिन करते हैं, उसे प्रजनन कहते हैं।

(Q )प्रजनन  का महत्तव लिखो। 

उत्तर :-(I) वंश परम्परा को कायम रखकर वंश वृद्धि करना (ii) पृथ्वी पर प्रजनन के द्वारा जीवों का संतुलन बना रहता है। (ii) प्रजनन के द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी वंश परम्परा कायम रहती है। अन्यथा प्रजनन की क्रिया न होने से जीवों का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। (iv) लैंगिक प्रजनन के माध्यम से जीवों के लक्षणों में विभिन्नतायें उत्पन्न होती हैं। ये विभिन्नतायें क्रम विकास (Development) में सहायक हैं। (v) लैंगिक प्रजनन द्वारा जीवों में उत्परिवर्तन (Transformation) की क्रिया होती है जो जीव विकास में सहायता करती है।

(Q )प्रजनन का प्रकार कितने प्रकार के होते है?उनके नाम लिखो और किसी एक का विस्तारपूर्वक वर्णन करो।

उत्तर :- प्रजनन का प्रकार (Kinds of multiplication) प्रजनन प्रायः चार प्रकार का होता है-

1. वर्धी  प्रजनन (Vegetative multiplication) 2. अलैंगिक प्रजनन (Agamic multiplication) 3. लैंगिक प्रजनन (Sexual multiplication) 4. पार्थेनोजनेसिस (Parthenogenesis)

वर्धी प्रजनन (Vegetative Spread) – प्रजनन की वह प्रक्रिया जिसमें पौधे के शरीर का कोई कायिक या वर्धी भाग (Vegetative Part); जैसे-जड़, तना, पत्ती इत्यादि पौधे से अलग होकर नये पौधे का निर्माण करता है। इसके द्वारा विकसित पौधे जनक सदृश होते हैं तथा जनकों से अलग होकर स्वतन्त्र रूप से जीवनयापन में सक्षम होते हैं। यह प्रजनन प्राकृतिक (normal) व कृत्रिम (fake) दो प्रकार से होता है।

प्राकृतिक वर्धी प्रजनन (Regular vegetative proliferation)- पौधे के किसी वर्षी अंग द्वारा प्राकृतिक रूप से नये पौधे का विकास प्राकृतिक वर्षी प्रजनन कहलाता है। प्राकृतिक वर्षी प्रजनन पौधों में कुछ निम्न विधियों द्वारा होता है-

जीवन की निरन्तरता पाठ  में पत्ती और जड़ द्वारा वर्धी प्रजनन (a) पत्तियों द्वारा (Leaves)- पथरचट्टा (bryophyllum) की पत्तियों में पत्र कलिकायें मिलती हैं। ये अपस्थानिक कलिकायें (extrinsic buds) स्वतंत्र रूप से अनुकूल परिस्थितियाँ पाकर एक-एक पौधे को विकसित करने में समर्थ होती हैं।

(b) जड़ द्वारा (Roots)- शकरकन्द, डाहलिया इत्यादि पौधों में प्रजनन जड़ द्वारा होता है। इनकी जड़ों पर अनेक वर्षी कलिकायें मिलती हैं जो अनुकूल परिस्थिति पाकर जमीन के अन्दर विकसित होकर नये पौधों का निर्माण करती हैं।

(c) तना द्वारा (Stems)- जलकुम्भी (water hyacinth), खट्टी-बूटी ब्यदि पौधों का तना जल को सतह पर अथवा जमीन की सतह पर क्षैतिज दिशा में फैलता है। ऐसे पौधे संब एरियल पौधों तथा उनके तने कहलाते हैं। ऐसे पौधे अपनी गाँठों (hubs) पर ऊपर की और पत्तियों तथा नीचे की ओर जड़ों का समूह धारण करते हुए आगे बढ़ते हैं। मातु पौधे से टूटकर अलग होने पर ये स्वतंत्र रूप से नये पौधे का विकास कर लेते हैं।

 जलकुम्भी (eichhornia) में वर्धी प्रजनन भूस्तरिका (offset) द्वारा इतनी तीव्रगति से होता है कि जलाशय में अन्य जीव-जन्तुओं का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है। साथ ही मछलियों की संख्या भी कम हो जाती है। इस विदेशी पौधे को “महाविपत्ति बंगाल का आतंक (fear of Bengal) भी कहते हैं। 

आलू, हल्दी, अदरख जैसे कुछ भूमिगत जनों पर कलिकायें मिलती है जो अनुकूल परिस्थित्तियों में एक-एक पौधे का विकास करती हैं। दूब घास, पुदीना सरीखे कुछ पौधे भू प्रसारी होते हैं। इन पौधों की गाँठों में अपस्थानिक जहें (unusual roots) तथा कलिकायें निकलली है जिनसे नये-नये प्ररोह का निर्माण होता है और अलग होकर स्वतंत्र रूप में विकसित करते हैं।

कलम द्वारा कृतिम वर्धी प्रजनन कृत्रिम वर्धी  प्रजनन (Fake vegetative proliferation)- कृत्रिम विधि द्वारा जब किसी पौधे का कोई भानी विभाजन के भाग काट कर अलग किया जाता है तथा कटा हुमा भाग नये पौधे के रूप में विकसित जाता है तो इसे कृत्रिम प्रका अन्य हार्मोनयुक्त कहते हैं। यह प्रजनन निम्न प्रकार से होता है-

(1) कलम लगाना (Cutting)- इसके लिए परिपक्व तने को (जो स्वस्थ हो) चुनते हैं तथा यह भी देख लेते हैं कि उसमें एक या दो गाँउँ अवश्य हो। ऐसे तने की एक शाखा को तेज धार वाले हथियार से काट लेते है ताकि उसके सभी अलक सुरक्षित रहें एवं तैयार की गई मिट्टी में गाह देते हैं। रोपने से पहले मदि ऑक्सीन के बोल में डुबाया जाय ती जड़ें जल्दी निकलती हैं। कुछ दिनों के बाद जड़ एवं अपस्थानिक कालिकायें विकसित होकर एक नया पौधा बनाती हैं। यह विधि गना, गुलाब, गुदहल जैसे पौधों में व्यवहार में लाई जाती है।

रोपण द्वाव कृतिम वर्धी प्रजनन (2) रोपण (Uniting)- इस विधि में एक जड़युक्त पौधे को शाखा को छील कर उस पर उसी जाती के अच्छी किस्म के कटे हुए शाखा को खोल कर बाँधते हैं। एक जड़ युक्त पौधे की शाखा को स्टॉक (stock) तथा दूसरी कटी हुई शाखा को सियर्यान (scion) कहते है। दोनों शाखाओं (stock and scion) की मोटाई समान होनी चाहिए। 

 उत्तर :- वर्धी प्रजनन का महत्व (Meaning of vegetative generation) 1. इस वर्धी द्वारा उत्पन्न पौधे अपने जनक पौधों (parent plants) के समान फल तथा फूल उत्पन करते हैं। 2. इस विधि द्वारा कम समय से अधिक से अधिक पौधे उत्पन किये जा सकते हैं। 3. वर्षी प्रजनन में खर्च कम पड़ता है। 4. यह पौधों में प्रजनन की सबसे सरल विधि है। 5. बीज रहित पौधों में यही प्रजनन की विधि लागू होती है। 6. इस विधि द्वारा उत्पन पौधे शीघ्र फल तथा फूल उत्पन्न करने लगते हैं। 7. इस प्रजनन में उत्पन्न होने वाले पौधे जनक पौधे से अपनी खुराक ग्रहण करते रहते हैं।

उत्तर :-लैंगिक प्रजनन का महत्व (Meaning of sexual Generation) 1. कि इनर में उत्पन्तान में माता-पिता दोनों के गुणों का समावेश होता है। 2. प्रजनन की यह एक अतविधि है। इस प्रकार के जनन में विनिम (Getting over) की क्रिया होती है जिससे विभित्रतायें उत्पन होती हैं। 4. इन जीवों में अनुकूलन की प्रदुर क्षमता पायी जात है। 5. सन्तान अधिक स्वस्थ तथा प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है। 6. अनुवांशिक क्षणों के संयोग से क्रमविकास में अधिक सहायक है।

मुलकुन  द्वारा अलिंगी परजन उत्तर :-अलैंगिक प्रजनन का महत्व (Significance of Abiogenetic Multiplication): 1. यह प्रजनन की सरल विधि है। 2. इस प्रजनन में केवल एक ही जनक (Parent) की आवश्यकता पड़ती है। 3. इस प्रजनन में वंश वृद्धि की निश्चितता होती है जिससे सजीव के अस्तित्व को खतरा नहीं होता है। 4. वे प्राणी जिनमें लौगिक प्रजनन सम्भव नहीं होता उनमें अलैंगिक प्रजनन ही एक मात्र विधि है। 5. इस प्रजनन में वंश वृद्धि की दर तीव्र होती है। 6. इस प्रजनन द्वारा उत्पन्न जीव अपने जनक के सदृश होते हैं।

 

पर्थेनोजेनेसिस (Parthenogenesis)- प्रजनन की वह विशेष विधि जिसमें अण्डा बिना निषेचित हुए एक नये जीव के रूप में विकसित हो जाता है। इस क्रिया को पर्थेनोजेनेसिस करते हैं। नसिकीय क्षेत्री के पौधों, जैसे-भालबॉक्स, स्पाइरोगाइरा म्यूकर आदि में होती है तथा अमेदण्ड जन्तुओं (Spineless creatures) जैसे-चौडी, मधुमक्खी, बरें आदि में होती है।

 

उत्तर :-अलैंगिक प्रजनन (Abiogenetic proliferation)

1. इसमें अर्द्धसूत्री (Meiosis) का होना आवश्यक नहीं है।

2. इसमें युग्मक की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

3. इसमें उत्पन्न जीव जनक के समान होते हैं तथा विभिन्नतायें उत्पन्न नहीं होती हैं।

4. इस विधि में सन्तान उत्पन्न होने की निश्चितता रहती है।

5. इसमें युग्मज (zygote) का निर्माण नहीं होता है।

6. इस विधि द्वारा उत्पन्न सन्तानों में अनुकूलन की क्षमता बहुत कम होती है।

7. इस प्रजनन की इकाई बीजाणु (spore) है।

लैंगिक प्रजनन (Sexual generation)

1. इस विधि में अर्द्धसूत्री (Meiosis) विभाजन आवश्यक है।

2. इस प्रजनन में नर तथा मादा युग्मक का संयोग होता है।

3. इस प्रजनन में उत्पन्न जीव में माता तथा पिता दोनों के गुणों का समावेश होता है फलस्वरूप विभिन्नतायें उत्पन्न होती हैं।

4. इस विधि में सन्तान उत्पन्न होने की निश्चितता नहीं रहती।

5. इसमें युग्मज (zygote) का निर्माण होता है।

6. इस विधि द्वारा उत्पन्न सन्तानों में अनुकूलन की क्षमता अधिक होती हैं।

7. इस प्रजनन की इकाई युग्मक (gamete) है।

(2 .c )पुष्पीय पौधों में लैंगिक प्रजनन

(Q )कंजुगेसन क्या है ?

उत्तर :-कंजुगेसन (formation), लैंगिक प्रजनन की वह विधि है जिसमें एक ही प्रजाति के दो अलग-अलग गैमीट्स का अस्थायी संयोग होता है। इस क्रिया में दोनों कोशिकाओं का जीवद्रव्य स्थायी रूप से आपस में मिलकर नये जीव की उत्पत्ति करते हैं।

(Q )पूर्ण फूल किसे कहते है ?

उत्तर :-चारों चक्र वाले फूल को पूर्ण फूल (complete blossom) कहते हैं। जैसे-गुड़हल, कमल इत्यादि। कुम्हड़ा का पुष्प अपूर्ण (inadequate) होता है क्योंकि इसमें चारों चक्र नहीं मिलते। 

(Q )उभयलिंगी या द्विलिंगी किसे कहते है ?

उत्तर :-कुछ फूलों में नर तथा मादा दोनों जनन अंग उपस्थित होते हैं। ऐसे फूल उभयलिंगी या द्विलिंगी कहलाते हैं। जैसे-मटर, जवा इत्यादि। 

(Q )पौधों में परागण की प्रकिर्या का विस्तार पूर्वक वर्णन करो ?

उत्तर :-परागण (Pullination) :-परागकोष से उत्पन्न परागकणों के उसी फूल या उस जाति के दूस फूलों के वर्तिकाग्र  (disgrace) तक पहुँचने की क्रिया परागण कहलाती है। परागण दो प्रकार का होता है

(a) स्व-परागण (Self fertilization)- जब एक ही फूल के परागकण उसी फूल के वर्तिकारता या उसी पौधे के दूस फूल के वर्तिकाय पर पहुंचते हैं, तो इसे स्व-परागण कहते हैं। उदाहरण उभयलिंगी पैौध जैसे-सूर्यमुखी। (b) पर-परागण (Cross fertilization)- जब एक फूल के परागकण दूसरे पौधे पर स्थित फूल के वर्तिवपत्र तक पहुँचते हैं, तो इसे पर-परागण कहते हैं।

स्व-परागण के गुण (Benefits of self fertilization) – (1) पुंकेसर और अण्डप दोनों एक ही समय पर परि होते हैं इसलिए निषेचन का होना निश्चित है। (2) इस परागण द्वारा आनुवांशिक लक्षण संरक्षित रहते हैं। (3) पराग मिलन में सम्भावना अधिक होती है क्योंकि परागकण व्यर्थ नहीं जाते। (4) पराग मिलन के लिए बाहरी कारकों की आवश्यकता नई होती। (5) जाति की शुद्धता बनी रहती है।

स्व-परागण के दोष (Negative marks of self fertilization)- (1) लगातार स्वपरागण से सन्तति कमजोर होने लगते है। (2) बीज की गुणवत्ता घटने लगती है। (3) सनाति में प्रतिरोधक क्षमता पौड़ी-दर-पीड़ी पहनी जाती है।

(b )पर-परागण के गुण (Benefits of cross fertilization)- (1) संताने काफी स्वस्थ होती हैं तथा जीवन संघर्ष को क्षमता वाली भी। (2) बीज स्वस्थ, अधिक मात्रा में तथा अधिक दिनों तक जीवित रहने वाले होते हैं। (3) बीजों में अंकुरण का प्रतिशत अधिक होता है। (4) पर-परागण से नई किस्में विकसित होती है। (5) इस विधि से उत्पन हुए पौधों में अपने वातावर के अनुकूल हो जाने की क्षमता होती है।

पर-परागण के दोष (Negative marks of cross fertilization)- (1) इसके लिए पौधों को बाहरी कारकों पर निर्भर रह है। (2) यह निश्चित नहीं होता। (3) परागकणों का नुकसान अधिक होता है। (4) संतति में ग्रानिकारक प्रभावी गुण एकट हो जाते है।

(Q )कोशिकायें युग्मक किसे कहते है ?

उत्तर :-दो विशेष प्रकार की कोशिकाओं के आपस में संयोग करने से जब नये जीव का विकास हो, तब इस प्रजनन को लिंगी प्रजनन कहते हैं। प्रजनन की ये विशेष कोशिकायें युग्मक (gametes) कहलाती हैं।

(Q )ओभा किसे कहते है ?

उत्तर :-लैंगिक प्रजनन में भाग लेने वाले नर तथा मादा गैमीट्स भिन्न प्रकृति के होते हैं, तो उन्हें एनाइसोगैमीट्स (anisogametes) कहते हैं तथा इनके समकेन को एनाइसोगैमी कहते हैं। इसमें नर गैमीट छोटा एवं चल होता है तथा स्पर्म कहलाता है और मादा बड़ा तथा निष्क्रिय होता है जिसे ओभा (Ova) कहते हैं। 

(2 .d )वृद्धि और विकाश

(Q ) वृद्धि की परिभाषा लिखो ?

उत्तर :-जीवन द्रव्य की मात्रा के बढ़ने से किसी जिव के शारीरिक लम्बाई अथवा आयतन में होने वाले  अपरिवर्तनशील विस्तार को उस जिव की वृद्धि कहते है। 

(Q )पोधो में वृद्धि का वर्णन करो ?

उत्तर :-जिस प्रकार सभी जिव में वृद्धि होती है। ठीक उसी प्रकर पौधों में भी वृद्धि होती है। पौधों में वृद्धि के निम्न लिखित तीन चरण है। (1 )कोशिका विभाजन   (2 )कोशिका दीर्घन (3 )कोशिका विभेदन। 

(Q ) पौधों में वृद्धि  और जिव में वृद्धि  में अंतर लिखो। 

उत्तर :-पौधों में वृद्धि (Development in plants)

1. यह पौधों के शीर्ष भाग में होती है।

2. यह जीवन-पर्यन्त होती रहती है।

3. पौधों में वृद्धि असिमेट्रिकल होती है।

4. वृद्धि निश्चित नहीं होती।

5. भ्रूणीय अवस्था में वृद्धि कुछ समय तक सुप्त-अवस्था में रहती है।

6. पौधों में वृद्धि के लिए प्रकाश एवं ०, आवश्यक कारक होते हैं।

जीवों में वृद्धि (Development in creatures)

1. यह सम्पूर्ण शरीर में होती है।

2. यह एक निश्चित उम्र तक होती है।

3. प्राणियों में वृद्धि सिमेट्रिकल होती है।

4. वृद्धि निश्चित होती है।

5. प्राणियों में ऐसा नहीं होता।

6. प्राणियों की वृद्धि के लिए ये आवश्यक नहीं हैं।

(Q ) विकास किसे कहते है ?

उत्तर :-वह क्रिया को जन्म  लेने से शुरू  होती है और मृत्यु के बाद समाप्त हो जाती है उसे विकाश कहते है। जिव -जंतु का हमेशा  विकाश होता रहता है। 

(Q ) मनुष्य में विकास  की क्रिया का वर्णन करो ?

उत्तर :- परुष की शुक्राणु और मादा का अंडाणु मिलने  मनुष्य का जन्म होता है। परन्तु  इसके बाद भी  विकाश नहीं रुकता। मादा के गर्भ में सम्पूर्ण शरीर  का  विकाश होता है। इसमें नौ  महीने का समय लगता है। 

बच्चे के विकास की चर्चा करें तो उसका विकास जन्म से पहले गर्भ में ही शुरू हो जाता है तथा वह गर्भावस्था, शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था जैसी अवस्थाओं से गुजरते हुए परिपक्वता की प्राप्ति करता है। यद्यपि वृद्धि एवं विकास का व्यवहार हम एक ही प्रकार की क्रियाशीलता के लिए करते हैं पर वास्तव में दोनों भिज क्षेत्र है। जिस तरह परिवेश व वातावरण में हम अन्तर करते हैं वैसे ही वृद्धि एवं विकास समानार्थी नहीं। 

विकास एक सतत प्रक्रिया है जबकि वृद्धि आजीवर होना संभव नहीं। विकास का व्यवहार हम परिवर्तनों के साथ-साथ व्यावहारिक परिवर्तनों के लिए भी करते हैं जबकि वृद्धि केवल परिमाणात्मक परिवर्तनों के लिए। आओ। मानव विकास की विभित्र अवस्थाओं का अध्ययन किया जाये जो निम्न हैं-

शैशवावस्था (Beginning phases)- जन्म से 6 वर्ष तक की उम्र शैशवावस्था कहलाती है। इसमें से 03 वर्ष की उम्र तक बच्चों का शारीरिक तथा मानसिक विकास तीख गति से होता है। इसी अवस्था में बच्चों में अनुकरण तथा दोहराने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। इसलिए शिक्षा के दृष्टिकोण से यह अवस्था अत्यन्त महत्वपूर्ण है तथा परिवार से बढ़कर इस कार्य के लिए दूसरी कोई पाठशाला नहीं हो सकती। अतः बच्चों में अच्छे गुणों के विकास के लिए अभिभावकों का जीवन तथा परिवार का वातावरण आदर्श होने चाहिए।

बाल्यावस्था (Youth)- 06 से 12 वर्ष की अवस्था चाल्यावस्था है जिसमें बच्चों के चिन्तन तथा तर्क शक्तियों का विकास होता है। पारिवारिक वातावरण से अलग विद्यालयों वातावरण में बच्चों को बहुत कुछ सीखने का अवसर प्राप्त होता है जिसको वे घर पर नहीं सीख पाते।

किशोरावस्था (Youth)- 12 वर्ष से 18 वर्ष तक की आयु किशोरावस्था है। किशोरावस्था में होने वाले कुछ परिवर्तन बालक एवं बालिकाओं में सदृश होते हैं। किशोरावस्था की सबसे बड़ी समस्या यौन समस्या की होती है क्योंकि इस काल में प्रजनन अंगों का तेजी से विकास होता है, फलस्वरूप अपने जैसे विपरीत लिंग वाले व्यक्तियों के प्रति आकर्षण उत्पन्न होने लगता है। किशोरावस्था में होने वाले परिवर्तन की अवस्था यौवनारम्भ (pubescence) कहलाती है। इस समय शरीर में होने वाले सभी परिवर्तन अन्तःस्रावी ग्रन्थियों द्वारा स्स्रावित हार्मोन्स के प्रभाव से होते हैं।

(Q )शैशवावस्था में शिक्षा का स्वरूप का वर्णन करो। 

उत्तर :-शैशवावस्था में शिक्षा का स्वरूप (1) बच्चा सुरक्षित वातावरण की आवश्यकता को महसूस करता है। इसलिए पर तथा विद्यालय का वातावरण तद्नुरूप होना बाहिए। (2) बच्चों में आत्म-प्रदर्शन की भावना को ध्यान में रखते हुए, उसे ऐसे कार्य दिए जाने चाहिए जिससे वह अपनी भावना को व्यक्त कर सके। (3) बच्चों को खेल द्वारा शिक्षा अधिक प्रभावकारी होगा।

(Q )बल्यावस्था में शिक्षा का स्वरूप का वर्णन करो। 

उत्तर :-बल्यावस्था में शिक्षा का स्वरूप (1) विषय वस्तुओं को बच्चों की रूचि के अनुसार विकसित किया जाना चाहिए ताकि शिक्षा के प्रति उसका आकर्षण बना रहे। (2) शारीरिक-दण्ड, बल-प्रयोग, डॉट-फटकार आदि बच्चों की पसन्द नहीं, इसलिए उनकी शिक्षा प्रेम एवं सहानुभूति पर आधारित होनी चाहिए। (3) कौल एवं दूस ने इस काल को संदेशात्मक विकास का काल माना है। अतः बच्चों के संवेगों का दमन करना उचित नहीं, नहीं तो डौन-भावना के विकास से उसका अपना विकास बाधित होगा। (4) बच्चे जिज्ञासु प्रवृति के होते हैं इसलिए उन्हें दी जाने वाली शिक्षा ऐसी हो जो उन्हें सन्तुष्ट कर सके।

(Q )किशोरावस्था में शिक्षा का स्वरूप वर्णन करो। 

उत्तर :-किशोरावस्था में शिक्षा का स्वरूप (1) सामूहिक खेल, स्काउटिंग/गाइडिंग जैसे क्रिया-कलाप बच्चों की मानसिक शक्तियों के साथ-साथ शारीरिक विकास के लिए अत्याधिक आवश्यक हैं जिसे उनकी शिक्षा में शामिल किया जाना चाहिए। (2) किशोरावस्था में निराशा की भावना से बच्चे आपराधिक प्रवृत्ति की ओर अग्रसर हो जाते हैं। अतः नकारात्मक सोच को घर एवं विद्यालय के वातावरण से दूर रखने की आवश्यकता है

notice : इस article लिखने के लिए हमने west bengal sylabus के class 10 के life science book का help लिए। हमारा उद्देश्य केवल छात्रों को शिक्षित करना है। Google से गुजारिश है हमारे post को रैंक करे और छात्रों को शिक्षित करने में हमारी मदद करे।

learn with afreen

📚 क्या आप पढ़ाई को आसान और मज़ेदार बनाना चाहते हैं?

📖 आसान भाषा में पढ़ाई करें! Learn with Afreen पर Free Video Classes, Hindi Grammar, History, Geography और Board Exam Preparation उपलब्ध है। 🎥 अभी देखें।

jeeodigital.com

JeeoDigital

"Dreaming of a professional website like Educated India? JeeoDigital makes it happen — reach out now!"

educatedindia786.com

free classes

"Struggling with Hindi or English? Not anymore! Join our free basic language courses today!"

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top