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राजे ने अपनी रखवाली की
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राजे ने अपनी रखवाली की

सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ — जीवन-परिचय (सारांश)

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हिंदी साहित्य के महाकवि और छायावाद के प्रमुख स्तंभ थे। उनका जन्म वसंत पंचमी के दिन 21 फरवरी 1896 को हुआ था। उनकी माता बचपन में ही गुजर गई थीं, इसलिए पालन-पोषण पिता ने किया।

निराला अत्यंत सिद्धांतवादी, साहसी और संघर्षशील व्यक्तित्व के धनी थे।

उन्होंने अपनी रचनाओं में प्रेम, करुणा, देशभक्ति, विद्रोह, सामाजिक असमानता के खिलाफ आवाज और प्रकृति-अनुराग जैसे विविध भावों को स्थान दिया। वे खड़ी बोली के साथ ब्रज व अवधी में भी सुंदर काव्य रचने में सक्षम थे।


उनकी प्रमुख काव्य कृतियाँ—अनामिका, परिमल, अणिमा, नये पत्ते, अर्चना, कुकुरमुत्ता आदि हैं। उपन्यास, कहानियों और निबंधों में भी उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया।


15 अक्टूबर 1961 को प्रयाग में उनका देहावसान हुआ, परंतु उनकी रचनाएँ आज भी सत्य, संघर्ष और समाज परिवर्तन की जीवित आवाज बनी हुई हैं।


कविता “राजे ने अपनी रखवाली की” — सारांश

इस कविता में निराला ने शासक वर्ग की स्वार्थपरता और जनता को भ्रमित करने वाले समाज-तंत्र का पर्दाफाश किया है।

कवि बताता है कि राजा ने अपने हित सुरक्षित रखने के लिए मजबूत किला बनवाया, बड़ी सेना रखी और चापलूस सामंतों तथा प्रपंची ब्राह्मणों का सहारा लिया। कवियों-लेखकों ने राजा की प्रशंसा कर जनता को प्रभावित किया, और नाट्य कलाकारों ने भी उसके पक्ष में माहौल बनाया।

धर्म और सभ्यता के नाम पर जनता को धोखे में रखा गया। लोग आँख-कान बंद करके खून की नदियों में भी डुबकियाँ लगाते रहे। अंत में जब जनता की आँख खुली तो उसे समझ आया कि राजा हमेशा अपनी ही सुरक्षा और स्वार्थ के लिए सक्रिय था, जनता के लिए नहीं।


कविता की व्याख्या (Vekhya / Vyakhya)

इस कविता में निराला ने शोषक राजशाही व सामंती व्यवस्था पर तीखा प्रहार किया है। राजा अपनी सत्ता बचाने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाता है—किला, सेना, चापलूस दरबारी, धर्मगुरु और प्रचार-तंत्र।

कवि बताता है कि राजा ने फौजें रखकर अपनी रक्षा सुनिश्चित की, पंडितों और ब्राह्मणों ने पोथियों के माध्यम से जनता को भ्रमित किया और कवियों-इतिहासकारों ने उसकी झूठी बहादुरी का गुणगान कर जनमानस को प्रभावित किया।

धर्म और सभ्यता के नाम पर हिंसा फैलाई गई और जनता को मूर्ख बनाकर खून की नदियों में डुबकी लगवाई गई। पर जब जनता की आँख खुली, तब उसे मालूम हुआ कि राजा ने कभी उसके लिए नहीं, बल्कि सिर्फ अपनी रखवाली की थी।

यह कविता अन्याय, अंधभक्ति और दमन की व्यवस्था के विरुद्ध जनता को चेतने का संदेश देती है।


One-Liner Questions with Answers (1 अंक)

  1. कविता के कवि कौन हैं?
    सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’।

  2. राजा ने अपनी रक्षा के लिए क्या बनाया?
    किला।

  3. राजा के पक्ष में इतिहास किसने लिखा?
    ऐतिहासिकों ने।

  4. कविता में किसके धोखे का उल्लेख है?
    धर्म के नाम पर धोखा।

  5. कविता का मुख्य विषय क्या है?
    शासक वर्ग का स्वार्थ और जनता का शोषण।


2 Marks Questions with Answers (2 अंक)

प्र.1. राजा ने अपनी रक्षा के लिए कौन-कौन से उपाय किए?

उ. राजा ने अपनी सुरक्षा के लिए मजबूत किला बनवाया, बड़ी फौजें रखीं, चापलूस सामंतों और पंडितों का साथ लिया तथा कवि-लेखकों से अपने पक्ष में प्रचार करवाया।

प्र.2. जनता राजा की चाल में कैसे फँस गई?

उ. धर्म, सभ्यता, इतिहास, नाटक और प्रचार के माध्यम से जनता को भ्रमित किया गया। लोगों ने आँख-कान मूँदकर इन बातों पर विश्वास किया और सत्य से दूर हो गई।

प्र.3. कविता में ब्राह्मणों की भूमिका क्या बताई गई है?

उ. ब्राह्मण पोथियों के माध्यम से जनता को बाँधकर राजा के हितों की रक्षा करते दिखाए गए हैं।


5 Marks Questions with Answers (5 अंक)

प्र. कविता ‘राजे ने अपनी रखवाली की’ में समाज की कौन-सी विडंबनाएँ उजागर की गई हैं?

उत्तर:
कवि निराला ने इस कविता में सामंती समाज की कई विडंबनाओं को उजागर किया है—

  1. शासक का स्वार्थ: राजा जनता के लिए नहीं, केवल अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित था।

  2. चापलूसी का तंत्र: सामंत, पंडित, कवि और इतिहासकार सभी राजा की चापलूसी में लगे थे।

  3. धर्म के नाम पर धोखा: धर्म को हथियार बनाकर जनता को भ्रमित किया गया।

  4. हिंसा का महिमामंडन: सभ्यता व धर्म के नाम पर खून की नदियाँ बहाई गईं।

  5. जनता की अंधभक्ति: जनता आँख-कान बंद करके इन सब को सच मानती रही।
    इस प्रकार कविता समाज में व्याप्त शोषण, अंधविश्वास और झूठे प्रचार की सच्चाई सामने लाती है।


10 Marks Question with Answer (10 अंक)

प्र. कविता ‘राजे ने अपनी रखवाली की’ का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।

उत्तर (पूर्ण 10 अंक योग्य):

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की यह कविता सामंती शासन-प्रणाली और सत्ताधारी वर्ग की स्वार्थपरता का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करती है।

राजे ने अपनी रखवाली की कवि दिखाता है कि राजा ने अपनी सत्ता और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए विशाल किला बनवाया, बड़ी-बड़ी फौजें रखीं और चापलूस सामंतों तथा ब्राह्मणों का सहारा लिया। पंडितों ने पोथियों के माध्यम से जनता को बांधा और कवियों-लेखकों ने राजा की बहादुरी का झूठा गुणगान कर जनमानस को भ्रमित किया।


इतिहासकारों ने झूठे इतिहास लिखे और नाट्य कलाकारों ने नाटक रचकर राजा की छवि चमकाई। इस प्रकार एक पूरा प्रचारतंत्र तैयार किया गया, जिसने राजा को आदर्श और ईश्वरतुल्य सिद्ध किया।

कवि बताता है कि धर्म की आड़ में जनता को धोखे में रखा गया और सभ्यता के नाम पर हिंसा फैलाई गई। जनता इतनी भ्रमित हुई कि खून की नदियाँ बहने के बावजूद आँख-कान मूँदकर झूठी मान्यताओं में डूबी रही।

लेकिन जब जनता की आँख खुली, तब उसे एहसास हुआ कि राजा ने कभी उसकी चिंता नहीं की, वह तो केवल अपनी रखवाली और अपने स्वार्थ की रक्षा में लगा रहा। यह कविता जनता को चेताती है कि अंधभक्ति और प्रचार के जाल में न फँसकर सत्य को पहचानना आवश्यक है।

पूरी कविता एक सामाजिक संदेश देती है—अन्याय और छल पर आधारित सत्ता लंबे समय तक टिक नहीं सकती, जनता को जागरूक होना ही पड़ता है।

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