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📘 परिचय
“ग्लोबल गाँव के देवता” रणेन्द्र का एक महत्त्वपूर्ण कथा-संग्रह (विशेषकर आदिवासी जीवन, विस्थापन और विकास की विडम्बनाओं पर आधारित कहानियाँ) है। इन कहानियों में लेखक ने आधुनिक विकास मॉडल के पीछे छिपे शोषण, ग्लोबलाइजेशन के प्रभाव और आदिवासी संस्कृति पर पड़ने वाले खतरों को तीखे व्यंग्य और मार्मिक संवेदनाओं के साथ प्रस्तुत किया है।
इस संग्रह की प्रमुख कहानी—“ग्लोबल गाँव के देवता”—सबसे अधिक प्रसिद्ध है। नीचे मुख्य कहानी का विस्तृत सारांश दिया जा रहा है।
📜 विस्तृत सारांश — “ग्लोबल गाँव के देवता”
🌿 कहानी का परिवेश
कहानी झारखंड के एक आदिवासी गाँव की है, जहाँ लोग अपनी परंपराओं, धरती, जंगल और पहाड़ों को देवता मानकर रहते हैं। उनके लिए पहाड़ – देवता, जंगल – माता, और नदी – जीवन है।
लेकिन धीरे-धीरे इस शांत गाँव में “विकास” के नाम पर कंपनियों, सरकारी मशीनरी, और ग्लोबलाइजेशन का प्रवेश होता है।
💠 मुख्य कथा-सूत्र
1. ग्लोबलाइजेशन की आहट
गाँव के आसपास की जमीन में खनिज मिलता है। बड़ी-बड़ी कंपनियाँ सरकार के साथ मिलकर उस क्षेत्र को “विकास क्षेत्र” घोषित कर देती हैं।
गाँव वालों को समझाया जाता है कि यह “ग्लोबल गाँव” बन रहा है।
यहाँ सड़कें बनेंगी
कंपनियाँ होंगी
रोजगार मिलेगा
शिक्षा-स्वास्थ्य मिलेगा
लोग भ्रमित हो जाते हैं, परंतु समझदार बुज़ुर्ग इस विकास के पीछे छिपे खतरे को समझ लेते हैं।
2. देवताओं को हटाने की तैयारी
कंपनी की योजना में गाँव का प्राचीन पहाड़—स्थानीय देवता का स्थान—आ जाता है।
कंपनी ने कहा:
“यह पहाड़ बेकार है। इसके नीचे करोड़ों का खनिज दबा है। इसे हटाना ही प्रगति है।”
अधिकारी आधुनिक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं—
प्रोजेक्ट
ग्लोबल मॉडल
इंवेस्टमेंट
कॉर्पोरेट डेवलपमेंट
लेकिन असल में उनका लक्ष्य है—संसाधनों पर कब्ज़ा।
3. आदिवासियों की पीड़ा
गाँव वाले कहते हैं:
“यह पहाड़ हमारा देवता है, इसे खोदना पाप है।”
पर कंपनियाँ इसे अंधविश्वास बताकर खूब प्रचार करती हैं—
“यह पुरानी सोच है।”
“देवता को नए मंदिर में ले चलेंगे।”
“गाँववालों को मुआवजा मिलेगा।”
लोगों की भावनाओं को धीरे-धीरे तोड़ा जाता है।
4. ‘नकली देवताओं’ का आगमन – Global Gods
कहानी व्यंग्य करती है कि विकास के नाम पर जो लोग आते हैं—
कंपनी के अधिकारी
सरकारी अफसर
विदेशी निवेशक
इन्हें गाँव में “ग्लोबल देवता” कहा जाता है।
वे बड़ी गाड़ियों में आते हैं, सुरक्षा में चलते हैं, और गाँव वाले उनके आगे झुकते हुए दिखते हैं।
पर असल में ये शोषण और विनाश के देवता हैं।
5. संस्कृति का विस्थापन
कंपनी पहाड़ को काटना शुरू कर देती है।
इसके साथ-साथ—
जंगल कट जाते हैं
लोग पलायन को मजबूर होते हैं
परंपराएँ टूट जाती हैं
धर्मस्थल नष्ट हो जाते हैं
स्त्रियाँ-बच्चे बेरोजगारी और गरीबी से जूझते हैं
विकास के नाम पर गाँव अपना अस्तित्व खोने लगता है।
6. वास्तविक संघर्ष
कुछ युवा और बुज़ुर्ग विरोध करते हैं।
लेकिन उनके विरोध को—
नकली मुकदमों
पुलिस दमन
लालच
धोखे
से दबा दिया जाता है।
7. कहानी का मार्मिक अंत
अंत में पहाड़ लगभग पूरा काट दिया जाता है।
देवता का स्थान मिट जाता है।
गाँव के बुज़ुर्ग कहते हैं—
“हमारे असली देवता तो मिट गए, केवल ये ग्लोबल देवता बच गए हैं, जो हमारी जमीन, पानी, जंगल सब खा रहे हैं।”
कहानी दिखाती है कि—
➡ विकास के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है, वह वास्तविक विकास नहीं, विस्थापन और विनाश है।
➡ लोकतंत्र और सरकारें कंपनियों की कठपुतली बन चुकी हैं।
➡ आदिवासी संस्कृति, विश्वास और स्वाभिमान पर भारी हमला हो रहा है।
🎯 कहानी का मुख्य संदेश
✔ 1. ग्लोबलाइजेशन का वास्तविक चेहरा
ग्लोबलाइजेशन गरीबों के लिए विकास नहीं, बल्कि संसाधनों की लूट का साधन है।
✔ 2. आदिवासी जीवन संकट में
जिनके पास कम है, उनसे ही सब कुछ छीना जा रहा है—जंगल, जमीन, संस्कृति, देवता।
✔ 3. विकास का दोहरापन
जहाँ एक ओर सरकार विकास का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर वह जनता को ही उजाड़ देती है।
✔ 4. प्रकृति-पूजक समाज पर हमला
कहानी बताती है कि आधुनिकता के नाम पर प्रकृति और पर्यावरण को नष्ट करना मानवीय नहीं है।
🟣 पात्र-सूची (संक्षेप में)
1. गाँव के बुज़ुर्ग – परंपरा के संरक्षक
बुज़ुर्ग गाँव की संस्कृति, परंपरा और आस्था के प्रमुख संरक्षक हैं।
वे पहाड़, जंगल और नदी को देवता मानते हैं और उनका सम्मान करना सीखाते हैं।
दूरदर्शी और अनुभवशील हैं; वे समझते हैं कि आधुनिक विकास के पीछे छुपा शोषण कितनी बड़ी समस्या है।
युवा पीढ़ी को ज्ञान देते हैं और गाँव के मूल्य-संस्कार बचाने का प्रयास करते हैं।
उनका व्यक्तित्व शांत, गंभीर और चिंतनशील है।
कहानी में बुज़ुर्ग लोगों की हिम्मत, चेतना और सामाजिक चेतावनी का प्रतीक हैं।
2. युवा आदिवासी – संघर्ष और आशा के प्रतीक
युवा आदिवासी नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
वे शिक्षा प्राप्त हैं या कुछ हद तक आधुनिकता से प्रभावित हैं।
गाँव और प्रकृति से लगाव होने के बावजूद वे विकास के लालच और आधुनिक अवसरों के बीच उलझे रहते हैं।
कुछ युवा विरोध करते हैं, आंदोलन करते हैं और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करते हैं।
उनका व्यक्तित्व साहसी, आशावादी, लेकिन कभी-कभी भ्रमित और असहाय भी होता है।
वे कहानी में संघर्ष और आशा का प्रतीक हैं, जो दिखाते हैं कि बदलाव के समय युवाओं की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण होती है।
3. कंपनी अधिकारी – ग्लोबल देवता, विकास के ठेकेदार
ये अधिकारी कंपनियों और पूँजीवादी ताकतों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
ग्लोबलाइजेशन और विकास के नाम पर आदिवासियों की भूमि और संसाधनों पर कब्ज़ा करते हैं।
उनका व्यक्तित्व चालाक, अहंकारी और प्रभावशाली है।
वे आधुनिक शब्दों का इस्तेमाल करके लोगों को भ्रमित करते हैं—जैसे “प्रोजेक्ट”, “इन्वेस्टमेंट”, “ग्लोबल मॉडल”।
कहानी में ये अधिकारी शोषण और भ्रष्टाचार का प्रतीक हैं।
यह पात्र दिखाता है कि आर्थिक शक्ति के सामने स्थानीय संस्कृति और परंपरा कितनी असहाय होती है।
4. सरकारी अफसर – कंपनियों के सहयोगी
सरकारी अधिकारी कंपनियों के साथ मिलकर आदिवासी गाँव पर नियंत्रण करते हैं।
वे जनता की समस्याओं को नजरअंदाज करते हैं और लालच, भ्रष्टाचार और दबाव के माध्यम से कंपनियों के काम को सुगम बनाते हैं।
उनका व्यक्तित्व भ्रष्ट, दमनकारी और सत्ता-केंद्रित है।
वे विकास के नाम पर गाँववासियों के विरोध को दबाने का कार्य करते हैं।
कहानी में यह पात्र दिखाता है कि राजनीतिक और प्रशासनिक शक्ति का दुरुपयोग कैसे आदिवासी समाज को प्रभावित करता है।
5. गाँव की जनता – पीड़ित, विस्थापित, शोषित
गाँव के लोग सरल, ईमानदार और प्रकृति-निष्ठ हैं।
उनका जीवन खेती, जंगल और परंपराओं पर आधारित है।
जब कंपनियाँ आती हैं तो उन्हें अपने अधिकार और जमीन से हाथ धोना पड़ता है।
उनका व्यक्तित्व सहनशील, दुखी और कभी-कभी विरोधी है।
कहानी में गाँव की जनता शोषण और विस्थापन का वास्तविक उदाहरण हैं।
वे दिखाते हैं कि विकास की आड़ में समाज के कमजोर वर्ग कितना नुकसान सहता है।
📌 निष्कर्ष
“ग्लोबल गाँव के देवता” केवल कहानी नहीं, बल्कि हमारी वर्तमान विकास-व्यवस्था का करुण और तीखा चित्रण है।
यह कहानी बताती है कि यदि हम प्रकृति और संस्कृति का सम्मान नहीं करेंगे, तो ग्लोबलाइजेशन के देवता सब कुछ निगल जाएँगे।
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