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मीरा के पद
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Table of Contents

🌼 मीरा के पद — सम्पूर्ण नोट्स

1. कवयित्री मीरा बाई का जीवन परिचय 

मीरा बाई का जन्म लगभग सन् 1503 ईस्वी में राजस्थान के जोधपुर राज्य में राव रत्नसिंह के घर हुआ। बचपन में ही उनकी माता का देहांतमीरा के पद हो गया। मीरा बचपन से ही कृष्ण को अपना पति और आराध्य मानती थीं। सं. 1573 में उनका विवाह मेवाड़ के शासक राणा सांगा के पुत्र भोजराज के साथ हुआ। विवाह के कुछ वर्ष बाद ही भोजराज की मृत्यु हो गई।

इसके बाद मीरा ने सांसारिक जीवन से विरक्ति लेकर स्वयं को कृष्ण की अनन्य भक्त के रूप में समर्पित कर दिया। वे संतों-फकीरों के साथ रहकर भक्ति-मार्ग पर अग्रसर हुईं।

उनकी प्रमुख रचनाएँ—

  1. गीत गोविंद

  2. बरसीजीरो भायरो

  3. राग-सोरठा

  4. फुटकर पद

मीरा की भाषा सरल , भावपूर्ण, कोमल और ब्रज व राजस्थानी मिश्रित है। उनकी मृत्यु लगभग सं. 1603 में मानी जाती है।


2. मीरा के पद पाठ का सारांश (Summary)

इस पाठ में मीरा के भक्ति-परक पदों का संकलन है। इन पदों में मीरा ने कृष्ण के रूप-सौन्दर्य, भक्त-वत्सलता, संकटों से रक्षा, गोकुल के जीवन तथा कर्म-फल पर आधारित जीवन-संदेश को अत्यंत सरल और भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है।
कहीं मीरा अपने नयन में कृष्ण का सौन्दर्य बसाने की बात करती हैं, कहीं भक्तों की पीड़ा हरने वाले ‘हरि’ को पुकारती हैं, तो कहीं गोकुल की प्रभात बेला का मनोहारी चित्र खींचती हैं।


3. मीरा के पद  की व्याख्या 

पद 1 व्याख्या —

बसो मेरे नैनन में नन्दलाल । 

मोहिनि मूरति साँवरि सूरति, नैना बने विशाल।

मोर मुकुट मकराकृत कुंडल, अरुण तिलक दिये भाल।

अबर सुधारस मुरली राजति, उर वैजन्ती माल छुद्र घंटिका कटि तट सोभित,

नुपुर सबद रसाल मीरा के प्रभु सन्तन सुखदाई, भगत बछल गोपाल।

 

इस पद में मीरा कहती हैं कि हे नंदलाल! आप मेरे नेत्रों में बस जाइए। आपकी साँवली मूर्ति, मोर मुकुट, मकराकार कुंडल और लाल तिलक से सुशोभित मुख मुझे मोहित कर लेता है। आपके अधरों पर मुरली शोभायमान है और वक्षस्थल पर वैजयंती माला अत्यंत आकर्षक लगती है। आपके नूपुरों की मधुर ध्वनि मन को आनंदित करती है। मीरा के अनुसार कृष्ण संतों और भक्तों को सुख देने वाले गोपाल हैं।


पद 2 व्याख्या —

हरि तुम हरो जन को पीर द्रोपदी की लाज रख्यौ, तुम बढ़ायो डीर।

भक्त कारन रूप नरहरि, षर्यो आप सरीर।

हिरन कस्यप मारि लीन्हो, गर्यो नाहिन धीर।

डूबते गजराज राख्यौ, कियो बाहर नीर।

दासी मीरा लाल गिरधर, हरो मेरी पीर।

इस पद में मीरा भगवान से प्रार्थना करती हैं कि जैसे आप द्रौपदी की लाज बचाने, प्रह्लाद को नरसिंह रूप में बचाने, गजराज को डूबने से बचाने आए—उसी प्रकार मेरी पीड़ा भी मिटाइए।
भगवान हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। मीरा स्वयं को उनकी दासी मानकर उन्हें अपनी पीड़ा हरने के लिए पुकारती हैं।


पद 3 व्याख्या —

जागो वंशी वारे ललना, जागो मेरे प्यारे।

रजनी बीती भोर भयो है, घर घर खुले किवारे।

गोपी दषि मथत सुनियत है, कंगन के झनकारे ।।

उठो लाल जो भोर भयी है, सुरनर ठाढ़े द्वारे।

ग्वाल बाल सब करत कोलाहल, जय जय सबद उचारें माखन रोटी हाथ में लीनी, गठवन के रखवारे।‘मीरा’ के प्रभु गिरवर नागर, सरण गहे को तारे ।।

यह पद गोकुल की भोर का मनोहारी वर्णन है। मीरा कृष्ण को जगाते हुए कहती हैं कि रात बीत गई, सुबह हो गई है। घर-घर के दरवाज़े खुल रहे हैं, गोपियाँ दूध मथ रही हैं, कंगन की झनकार सुनाई दे रही है।
ग्वाल-बाल द्वार पर खड़े हैं और जय-जयकार कर रहे हैं। माखन-रोटी लेकर गायों के रखवाले कृष्ण को मीरा जल्दी उठाने की विनती करती हैं।


पद 4 व्याख्या —

करम गति टारे नाहिं टरे।

सतवादी हरिश्चन्द्र से राजा नीच घर नीर भरे।

पाँच पाण्डु अरु कुन्ती द्रोपदी, हाड़ हिमालय गरे यज्ञ किया बलि लेन इन्द्रासन, से पाताल घरे।

मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, विष से अमृत करे ।।

इस पद में मीरा कहती हैं कि कर्मों का फल अवश्य मिलता है। सत्यवादी हरिश्चन्द्र तक को कठिन परिश्रम करना पड़ा। पाण्डवों ने भी कष्ट सहकर हिमालय तक भ्रमण किया।
बलि ने यज्ञ किए, दान दिए—फिर भी इन्द्रासन के लोभ में पाताल पहुँचा दिया गया। मीरा कहती हैं कि गिरधर नागर तो विष को भी अमृत कर देते हैं।


1. मीरा के पद – वस्तुनिष्ठ प्रश्न – उत्तर सहित

(क) गिरधर का अर्थ है —

(iv) गिरि को धारण करने वाला।

(ख) कृष्ण ने किसकी लाज बचाई —

(ii) द्रोपदी की।

(ग) राजा हरिश्चन्द्र किसके यहाँ काम किए —

(iii) बैम (चांडाल) के यहाँ।

(घ) इन्द्रासन पाने के चक्कर में पाताल कौन गया ?

(iii) बलि।


2. मीरा के पद – लघु उत्तरीय प्रश्न – उत्तर सहित

(क) मीरा किसकी भक्तन थी ?

उत्तर:
मीरा भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्तन थीं। वे कृष्ण को ही अपना पति, मित्र और आराध्य मानती थीं।


(ख) द्रोपदी की लाज किसने और कैसे बचाई ?

उत्तर:
द्रोपदी की लाज भगवान श्रीकृष्ण ने बचाई। दुर्योधन द्वारा उनका चीरहरण किए जाने पर कृष्ण ने अनंत चीर प्रदान करके द्रोपदी की रक्षा की।


(ग) कृष्ण के होठों पर क्या सुशोभित हो रहा है?

उत्तर:
कृष्ण के होठों पर मधुर ध्वनि उत्पन्न करने वाली मुरली (बांसुरी) सुशोभित हो रही है।


(घ) गठवन के रखवारे किसे और क्यों कहा गया है?

उत्तर:
गठवन (गायों के समूह) के रखवारे कृष्ण को कहा गया है, क्योंकि वे गोकुल में गायों की रक्षा और पालन करते थे।


(ङ) ‘विष से अमृत करे’ का क्या अर्थ है?

उत्तर:
इसका अर्थ है— भगवान कृष्ण इतने शक्तिशाली हैं कि वे जहर को भी अमृत में बदल सकते हैं, अर्थात वे अपने भक्तों के जीवन की प्रत्येक कठिनाई को सुख में बदल देते हैं।


3. मीरा के पद – बोधमूलक प्रश्न – उत्तर सहित

(क) मीरा के नेत्रों में कृष्ण का कौन-सा रूप बस चुका है?

उत्तर:
मीरा के नेत्रों में कृष्ण का साँवला, मोहक, मुरलीधर, मोर मुकुटधारी रूप बस चुका है। वे हर क्षण अपने प्रभु को अपनी आँखों के सामने अनुभव करती हैं।


(ख) कृष्ण ने अपने किन-किन भक्तों की कैसे रक्षा की?

उत्तर:
कृष्ण ने समय-समय पर अपने भक्तों की अद्भुत प्रकार से रक्षा की—

  • द्रोपदी की चीर बढ़ाकर लाज बचाई।

  • प्रह्लाद की रक्षा हेतु नरसिंह रूप में प्रकट हुए और हिरण्यकश्यप का वध किया।

  • गजराज को मगर से बचाकर जीवनदान दिया।
    कृष्ण प्रत्येक भक्त के संकट में तुरंत उनके रक्षक बन जाते हैं।


(ग) गोकुल के प्रभात का वर्णन कीजिए।

उत्तर:
गोकुल का प्रभात अत्यंत मनोहर होता है। भोर होते ही घर-घर के द्वार खुल जाते हैं। गोपियाँ मथानी चलाती हैं, उनके कंगनों की झनकार वातावरण को मधुर बनाती है। ग्वालबाल कृष्ण का इंतजार करते हुए जय-जयकार करते हैं। पूरा गोकुल उत्साह और भक्ति से भर उठता है।


(घ) ‘करम गति टारे नाहि टरे’ के संदर्भ में मीरा ने किन उदाहरणों की प्रस्तुति की है?

उत्तर:
मीरा बताती हैं कि कर्मों का फल अवश्य मिलता है।
वे उदाहरण देती हैं—

  • सत्यवादी हरिश्चन्द्र को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

  • पांडव, कुन्ती और द्रोपदी ने हिमालय जैसा कष्ट सहा।

  • इन्द्रासन पाने की इच्छा में राजा बलि पाताल पहुँचे।
    इन सभी घटनाओं से स्पष्ट है कि कर्मों की गति को टाला नहीं जा सकता।


(ङ) मीरा के पद – सन्दर्भ सहित व्याख्या


(अ) पंक्ति –

“उठो लाल जो भोर भयी है, सुर नर खड़े द्वारे।
ग्वाल बाल सब करत कोलाहल, जयजय सबद उचारे।”

सन्दर्भ:

यह पंक्ति मीरा द्वारा रचित पद से ली गई है जिसमें वह कृष्ण-लीला का वर्णन करती हैं

व्याख्या:

मीरा कहती हैं कि हे कृष्ण, भोर हो गई है। देवता और मनुष्य सभी द्वार पर आपका दर्शन पाने के लिए खड़े हैं। ग्वालबाल उत्साह से कोलाहल कर रहे हैं और आपकी जय-जयकार कर रहे हैं। पूरा वातावरण भक्ति से भर गया है।


(ब) पंक्ति –

“यज्ञ किया बलि लेन इन्द्रासन, से पाताल करे।
मीरा के प्रभु गिरिवर नागर, विष से अमृत करे।”

सन्दर्भ:

यह पंक्ति ‘करम गति टारे नाहि टरे’ वाले पद में आती है जिसमें मीरा कर्म के फल और कृष्ण की महिमा का वर्णन करती हैं।

व्याख्या:

मीरा कहती हैं कि राजा बलि ने यज्ञ कर इन्द्रासन पाने की इच्छा की और उसी के परिणामस्वरूप वह पाताल लोक पहुँचे। परंतु मीरा के प्रभु ऐसे शक्तिशाली हैं कि वे विष को भी अमृत में बदल देते हैं। वे अपने भक्तों के दुखों को समाप्त कर उन्हें कल्याण प्रदान करते हैं।


4. मीरा के पद – व्याकरण एवं बोध

(क) निम्न शब्दों के शुद्ध रूप

  • सोभित → सुशोभित

  • सक्द → सकते

  • कारन → कारण

  • सरीर → शरीर

  • सतबादी → सत्यवादी


(ख) पर्यायवाची शब्द

  • नन्दलाल → कृष्ण, गोपाल

  • नीर → जल, पानी

  • शरीर → काया, देह

  • रजनी → रात्रि, निशा

  • विष → जहर, हलाहल


(ग) विलोम शब्द

  • अमृत → विष

  • पाताल → स्वर्ग

  • भक्त → अभक्त, नास्तिक

  • साँवरी → गोरी

  • दधि → जल, क्षीर (प्रसंग अनुसार)


(घ) शब्दों के अर्थ व वाक्य

  1. गिरिवर – बड़ा पर्वत

    • कृष्ण ने गिरिवर गोवर्धन को उठाकर गोकुलवासियों की रक्षा की।

  2. गजराज – हाथियों का राजा

    • गजराज को मगर ने पकड़ लिया था, तब भगवान ने उसकी रक्षा की।

  3. पीर – कष्ट, दुख

    • भगवान अपने भक्तों की हर पीर दूर करते हैं।

  4. माखन – मक्खन

    • कृष्ण को माखन बहुत प्रिय था।

  5. इन्द्रासन – इन्द्र का सिंहासन

    • राजा बलि ने इन्द्रासन पाने की इच्छा की थी।


5. मीरा के पद – पाठेत्तर प्रश्न 

प्रश्न:भगवान कृष्ण की भक्ति में डूबे सूरदास और रसखान के कुछ पदों को पढ़कर जो भावना प्राप्त होती है, उसे लिखिए।

उत्तर 

सूरदास और रसखान, दोनों ही कृष्ण भक्ति के महान कवि थे। उनके पदों में कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम, समर्पण और मधुर भावनाएँ झलकती हैं। सूरदास ने बाल-रूप कृष्ण की विलक्षण लीलाओं का कोमल एवं आत्मीय चित्रण किया है। उनके पदों को पढ़कर मन आनंद और भक्ति से भर उठता है।
रसखान मुस्लिम होते हुए भी कृष्ण-प्रेम में ऐसे डूबे कि उन्होंने गोपियों, ग्वालों और गोकुल की महिमा का अद्भुत वर्णन किया। उनके काव्य से यह संदेश मिलता है कि ईश्वर-भक्ति जाति-धर्म से परे होती है।
दोनों कवियों की रचनाओं से हमें निर्मल भक्ति, निष्काम प्रेम, और भगवान से आत्मिक जुड़ाव की एक सुंदर झलक मिलती है।

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