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Toggleअंधा युग – धर्मवीर भारती
1. लेखक परिचय – धर्मवीर भारती
धर्मवीर भारती हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि, लेखक, नाटककार और पत्रकार थे। उनका जन्म 25 दिसंबर 1926 को इलाहाबाद (प्रयागराज) में हुआ था। हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में उनका महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने कविता, उपन्यास, कहानी, नाटक, निबंध और पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया।
धर्मवीर भारती की साहित्यिक प्रतिभा बहुआयामी थी। उनकी रचनाओं में प्रेम, मानवता, इतिहास, संस्कृति, सामाजिक परिस्थितियों और व्यक्ति के आंतरिक संघर्षों का प्रभावशाली चित्रण मिलता है। उनकी भाषा भावपूर्ण, प्रतीकात्मक और प्रभावशाली है।
उनकी प्रमुख कृतियों में ‘कनुप्रिया’, ‘अंधा युग’, ‘गुनाहों का देवता’, ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’, ‘ठेले पर हिमालय’ आदि उल्लेखनीय हैं। उनका उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ हिंदी साहित्य की लोकप्रिय रचनाओं में गिना जाता है।
‘अंधा युग’ धर्मवीर भारती की सबसे प्रसिद्ध कृतियों में से एक है। यह महाभारत के युद्ध के अंतिम चरण और युद्ध के बाद की परिस्थितियों पर आधारित एक प्रसिद्ध पद्य-नाटक है। इसमें महाभारत की कथा के माध्यम से आधुनिक मनुष्य के सामने उपस्थित हिंसा, युद्ध, नैतिक संकट और विनाश जैसे प्रश्नों को उठाया गया है।
‘अंधा युग’ केवल महाभारत की कहानी नहीं है। इसके माध्यम से लेखक यह बताना चाहते हैं कि जब मनुष्य विवेक खो देता है और बदले, अहंकार तथा हिंसा को अपना मार्ग बना लेता है, तब पूरा समाज विनाश की ओर बढ़ता है। नाटक में धृतराष्ट्र, गांधारी, अश्वत्थामा, विदुर, संजय और कृष्ण जैसे पात्रों के माध्यम से अलग-अलग मानवीय स्थितियों को सामने रखा गया है।
धर्मवीर भारती को साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में अनेक सम्मान प्राप्त हुए। वे लंबे समय तक प्रसिद्ध पत्रिका ‘धर्मयुग’ के संपादक रहे। उनका निधन 4 सितंबर 1997 को मुंबई में हुआ।
2. ‘अंधा युग’ का परिचय
‘अंधा युग’ धर्मवीर भारती द्वारा रचित प्रसिद्ध पद्य-नाटक है। इसकी कथा महाभारत के युद्ध के अठारहवें दिन के बाद की घटनाओं पर आधारित है।
कौरवों की सेना लगभग समाप्त हो चुकी है। हस्तिनापुर के राजपरिवार और युद्ध में बचे हुए लोगों के सामने चारों ओर विनाश दिखाई देता है। युद्ध ने केवल सैनिकों को ही नहीं मारा, बल्कि मनुष्य के भीतर की संवेदनाओं और नैतिक मूल्यों को भी घायल कर दिया है।
नाटक में युद्ध के बाद की इसी मानसिक और नैतिक स्थिति को केंद्र में रखा गया है।
3. ‘अंधा युग’ का पूरा सारांश
‘अंधा युग’ की कथा महाभारत के युद्ध की समाप्ति के बाद शुरू होती है। कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हो चुका है। कौरवों की विशाल सेना नष्ट हो चुकी है। हस्तिनापुर के राजपरिवार के सामने अपने प्रियजनों की मृत्यु और युद्ध की भयावहता का दुख है।
युद्ध में कौरवों की हार हो चुकी है और पांडव विजयी हुए हैं। लेकिन इस विजय में भी खुशी नहीं है, क्योंकि दोनों पक्षों ने भारी विनाश झेला है।
नाटक के आरंभ में प्रहरी युद्ध के बाद की भयावह स्थिति का वर्णन करते हैं। चारों ओर मृत्यु, विनाश और निराशा का वातावरण है। इससे स्पष्ट होता है कि युद्ध में कोई वास्तविक विजेता नहीं होता; युद्ध अंततः मनुष्य और मानवता दोनों को घायल करता है।
धृतराष्ट्र की स्थिति
धृतराष्ट्र जन्म से अंधे हैं। लेकिन नाटक में उनका अंधापन केवल शारीरिक नहीं है। वे अपने पुत्र दुर्योधन के प्रति मोह के कारण सत्य को स्वीकार नहीं कर पाए। उन्होंने अपने पुत्र की गलतियों को समय रहते रोकने का प्रयास नहीं किया।
युद्ध के बाद धृतराष्ट्र अपने सभी पुत्रों को खो चुके हैं। उनके भीतर दुख, क्रोध और निराशा है। उनका चरित्र इस बात का प्रतीक बन जाता है कि मोह और सत्ता का अंधापन मनुष्य को सत्य से दूर कर देता है।
गांधारी का दुख
गांधारी भी अपने सौ पुत्रों की मृत्यु से अत्यंत दुखी हैं। उनका मातृ-हृदय अपने पुत्रों के विनाश से टूट चुका है।
गांधारी के मन में पांडवों और विशेष रूप से कृष्ण के प्रति आक्रोश उत्पन्न होता है। उन्हें लगता है कि कृष्ण चाहते तो इस विनाश को रोक सकते थे। इसी भावावेश में गांधारी कृष्ण को शाप देती हैं कि जिस प्रकार कुरुवंश का विनाश हुआ है, उसी प्रकार यादव वंश भी नष्ट होगा।
यह प्रसंग नाटक के सबसे महत्वपूर्ण प्रसंगों में से एक है।
अश्वत्थामा का प्रतिशोध
युद्ध के बाद अश्वत्थामा अपने पिता द्रोण की मृत्यु और कौरवों की हार से अत्यंत क्रोधित है। उसके भीतर बदले की भावना प्रबल हो जाती है।
अश्वत्थामा के साथ कृपाचार्य और कृतवर्मा भी हैं। अश्वत्थामा पांडवों से बदला लेना चाहता है। वह रात में पांडव शिविर पर आक्रमण करने का निर्णय करता है।
वह सोए हुए लोगों की हत्या करता है। इस घटना से उसके चरित्र का प्रतिशोध और हिंसा के अंधेपन में बदल जाना स्पष्ट होता है।
बाद में अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करता है। उसके इस कृत्य से विनाश की स्थिति और भी गंभीर हो जाती है।
4. कृष्ण की भूमिका
‘अंधा युग’ में कृष्ण केवल महाभारत के पात्र नहीं हैं। वे विवेक, धर्म, चेतना और मानवीय आशा के प्रतीक के रूप में सामने आते हैं।
युद्ध और विनाश के बीच कृष्ण मनुष्य को उसके कर्मों के परिणाम का बोध कराते हैं। वे यह संकेत देते हैं कि अंधकार कितना भी गहरा हो, मनुष्य को सत्य और विवेक का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।
गांधारी के शाप को भी कृष्ण स्वीकार करते हैं। इससे उनके चरित्र की गंभीरता और भविष्य के प्रति उनकी दृष्टि दिखाई देती है।
5. ‘अंधा युग’ शीर्षक की सार्थकता
‘अंधा युग’ शीर्षक अत्यंत प्रतीकात्मक है।
यहाँ ‘अंधापन’ केवल धृतराष्ट्र की आँखों का अंधापन नहीं है। नाटक में अनेक प्रकार के अंधेपन दिखाई देते हैं—
- धृतराष्ट्र का पुत्र-मोह का अंधापन
- दुर्योधन का अहंकार का अंधापन
- अश्वत्थामा का प्रतिशोध का अंधापन
- गांधारी का शोक और क्रोध का अंधापन
- युद्ध में मनुष्य का विवेक खो देना
इसलिए ‘अंधा युग’ उस समय और मानसिकता का प्रतीक है जिसमें मनुष्य सत्य, विवेक और मानवता को भूलकर हिंसा और विनाश का रास्ता चुन लेता है।
6. नाटक का मूल संदेश
‘अंधा युग’ का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है कि हिंसा और प्रतिशोध अंततः विनाश को जन्म देते हैं।
लेखक महाभारत की कथा के माध्यम से आधुनिक समाज को चेतावनी देते हैं कि यदि मनुष्य सत्ता, अहंकार, बदले और हिंसा के पीछे विवेक को छोड़ देगा, तो उसका परिणाम विनाशकारी होगा।
नाटक निराशा के बीच भी मानवता, विवेक और नैतिक चेतना को बनाए रखने का संदेश देता है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
- रचना: अंधा युग
- लेखक: धर्मवीर भारती
- विधा: पद्य-नाटक / काव्य-नाटक
- आधार: महाभारत
- समय: महाभारत युद्ध के बाद की परिस्थितियाँ
- मुख्य पात्र: धृतराष्ट्र, गांधारी, अश्वत्थामा, संजय, विदुर, कृष्ण आदि।
- मुख्य समस्या: युद्ध, हिंसा, प्रतिशोध और नैतिक पतन
- धृतराष्ट्र का अंधापन: पुत्र-मोह और सत्य से विमुखता का प्रतीक
- अश्वत्थामा: प्रतिशोध और हिंसा का प्रतीक
- गांधारी: मातृ-दुःख, आक्रोश और शाप का प्रतीक
- कृष्ण: विवेक, धर्म और चेतना के प्रतीक
- मुख्य संदेश: विनाशकारी हिंसा और प्रतिशोध से बचकर मानवता तथा विवेक का मार्ग अपनाना।
अंधा युग – महत्वपूर्ण Short Questions with Answers
1. ‘अंधा युग’ के रचनाकार कौन हैं?
उत्तर: ‘अंधा युग’ के रचनाकार प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार धर्मवीर भारती हैं।
2. ‘अंधा युग’ किस विधा की रचना है?
उत्तर: ‘अंधा युग’ एक पद्य-नाटक या काव्य-नाटक है।
3. ‘अंधा युग’ की कथा किस महाकाव्य पर आधारित है?
उत्तर: इसकी कथा महाभारत के युद्ध और उसके बाद की घटनाओं पर आधारित है।
4. ‘अंधा युग’ में किस युद्ध के बाद की स्थिति दिखाई गई है?
उत्तर: इसमें कुरुक्षेत्र के महाभारत युद्ध के बाद की विनाशकारी स्थिति दिखाई गई है।
5. धृतराष्ट्र किस प्रकार के अंधेपन के प्रतीक हैं?
उत्तर: धृतराष्ट्र केवल शारीरिक रूप से अंधे नहीं हैं, बल्कि वे पुत्र-मोह और नैतिक विवेक के अंधेपन के प्रतीक हैं।
6. धृतराष्ट्र के कितने पुत्र थे?
उत्तर: धृतराष्ट्र के एक सौ पुत्र थे, जिन्हें सामूहिक रूप से कौरव कहा जाता है।
7. गांधारी ने कृष्ण को क्यों शाप दिया?
उत्तर: अपने पुत्रों की मृत्यु और कुरुवंश के विनाश से दुखी होकर गांधारी ने कृष्ण को भी इस विनाश के लिए जिम्मेदार माना और उन्हें शाप दिया।
8. अश्वत्थामा किस भावना से प्रेरित था?
उत्तर: अश्वत्थामा मुख्य रूप से क्रोध, प्रतिशोध और बदले की भावना से प्रेरित था।
9. अश्वत्थामा ने पांडव शिविर पर कब आक्रमण किया?
उत्तर: अश्वत्थामा ने रात्रि के समय सोए हुए पांडव पक्ष के शिविर पर आक्रमण किया।
10. अश्वत्थामा के साथ कौन-कौन थे?
उत्तर: अश्वत्थामा के साथ कृपाचार्य और कृतवर्मा थे।
11. ‘अंधा युग’ शीर्षक का क्या अर्थ है?
उत्तर: ‘अंधा युग’ उस ऐसे समय का प्रतीक है जिसमें मनुष्य विवेक, नैतिकता और मानवता से दूर होकर हिंसा तथा प्रतिशोध के मार्ग पर चला जाता है।
12. ‘अंधा युग’ में कृष्ण किसके प्रतीक हैं?
उत्तर: कृष्ण विवेक, धर्म, चेतना और सही मार्गदर्शन के प्रतीक हैं।
13. संजय की विशेषता क्या है?
उत्तर: संजय को दिव्य दृष्टि प्राप्त थी, जिसके कारण वे दूर घट रही घटनाओं को देख और उनका वर्णन कर सकते थे।
14. ‘अंधा युग’ का प्रमुख वातावरण कैसा है?
उत्तर: नाटक का वातावरण विनाश, दुख, निराशा, पश्चाताप, क्रोध और नैतिक संकट से भरा हुआ है।
15. ‘अंधा युग’ में युद्ध का क्या परिणाम दिखाई देता है?
उत्तर: युद्ध के परिणामस्वरूप चारों ओर मृत्यु, विनाश, शोक और मानवीय मूल्यों का पतन दिखाई देता है।
16. अश्वत्थामा का चरित्र किसका प्रतीक है?
उत्तर: अश्वत्थामा प्रतिशोध, क्रोध और विवेकहीन हिंसा का प्रतीक है।
17. गांधारी के चरित्र की प्रमुख विशेषता क्या है?
उत्तर: गांधारी के चरित्र में मातृ-स्नेह, दुःख, क्रोध, आक्रोश और नैतिक प्रश्न प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं।
18. ‘अंधा युग’ का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: इसका मुख्य संदेश है कि हिंसा, अहंकार और प्रतिशोध मनुष्य तथा समाज को विनाश की ओर ले जाते हैं।
19. ‘अंधा युग’ में महाभारत का प्रयोग क्यों किया गया है?
उत्तर: लेखक ने महाभारत की कथा के माध्यम से आधुनिक युग के युद्ध, हिंसा, सत्ता-संघर्ष और नैतिक संकट को समझाने का प्रयास किया है।
20. नाटक में अंधापन किस व्यापक अर्थ में प्रयुक्त हुआ है?
उत्तर: अंधापन यहाँ विवेकहीनता, सत्य से दूरी, मोह, अहंकार और नैतिक पतन के व्यापक अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
Long Questions with Answers
प्रश्न 1. ‘अंधा युग’ शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘अंधा युग’ शीर्षक अत्यंत अर्थपूर्ण और प्रतीकात्मक है। पहली दृष्टि में यह नाम धृतराष्ट्र के शारीरिक अंधेपन की ओर संकेत करता है, लेकिन नाटक में ‘अंधापन’ इससे कहीं अधिक व्यापक अर्थ रखता है।
धृतराष्ट्र आँखों से अंधे होने के साथ-साथ अपने पुत्र दुर्योधन के मोह में नैतिक रूप से भी अंधे हो जाते हैं। वे जानते हुए भी अपने पुत्र की गलत नीतियों को रोक नहीं पाते। दुर्योधन सत्ता और अहंकार के कारण सत्य को स्वीकार नहीं करता। अश्वत्थामा पिता की मृत्यु और कौरवों की हार का बदला लेने के लिए विवेक खो देता है।
युद्ध में दोनों पक्षों के लोग हिंसा और प्रतिशोध में इतने डूब जाते हैं कि मानवता पीछे छूट जाती है। इस प्रकार पूरा युग ही विवेकहीनता के अंधकार में दिखाई देता है।
इसलिए ‘अंधा युग’ केवल धृतराष्ट्र के अंधेपन का नाम नहीं है, बल्कि मानव के नैतिक, मानसिक और सामाजिक अंधेपन का प्रतीक है। यही कारण है कि यह शीर्षक नाटक के उद्देश्य को पूरी तरह व्यक्त करता है।
प्रश्न 2. ‘अंधा युग’ में युद्ध की विभीषिका का चित्रण कीजिए।
उत्तर:
‘अंधा युग’ की पृष्ठभूमि महाभारत का विनाशकारी युद्ध है। युद्ध समाप्त होने के बाद भी चारों ओर शांति नहीं दिखाई देती, बल्कि मृत्यु, शोक और विनाश का वातावरण बना रहता है।
कौरवों की सेना समाप्त हो चुकी है। असंख्य योद्धा मारे जा चुके हैं। राजपरिवार अपने प्रियजनों को खो चुका है। विजय प्राप्त करने वाले पांडव भी इस विनाश से अछूते नहीं हैं।
युद्ध मनुष्य की बाहरी दुनिया को नष्ट करने के साथ-साथ उसके भीतर की संवेदनाओं को भी घायल करता है। अश्वत्थामा का प्रतिशोध इसी विनाशकारी मानसिकता को आगे बढ़ाता है। वह सोए हुए लोगों की हत्या करके यह सिद्ध करता है कि बदले की भावना मनुष्य से नैतिक विवेक छीन सकती है।
धर्मवीर भारती युद्ध के माध्यम से यह संदेश देते हैं कि युद्ध का वास्तविक परिणाम विजय नहीं, बल्कि व्यापक मानवीय विनाश होता है।
प्रश्न 3. धृतराष्ट्र के चरित्र की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
धृतराष्ट्र ‘अंधा युग’ के महत्वपूर्ण पात्र हैं। वे जन्म से अंधे हैं, लेकिन उनका अंधापन केवल शारीरिक नहीं है। वे पुत्र-मोह के कारण नैतिक दृष्टि से भी कमजोर हो जाते हैं।
वे अपने पुत्र दुर्योधन से अत्यधिक प्रेम करते हैं। इसी मोह के कारण वे उसके गलत कार्यों का उचित विरोध नहीं कर पाते। वे जानते हैं कि युद्ध की परिस्थितियाँ विनाशकारी हैं, फिर भी उसे रोकने के लिए निर्णायक कदम नहीं उठा पाते।
युद्ध के बाद उनके सभी पुत्र मारे जाते हैं और वे गहरे शोक में डूब जाते हैं। उनके चरित्र के माध्यम से लेखक यह दिखाते हैं कि मोह मनुष्य की निर्णय लेने की क्षमता को कमजोर कर सकता है।
धृतराष्ट्र इसलिए केवल महाभारत का पात्र नहीं रह जाते, बल्कि वे उस व्यक्ति और व्यवस्था के प्रतीक बन जाते हैं जो सत्य को जानते हुए भी अपने स्वार्थ और मोह के कारण उसका सामना नहीं करती।
प्रश्न 4. अश्वत्थामा के चरित्र का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अश्वत्थामा ‘अंधा युग’ का अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली पात्र है। उसके भीतर पिता द्रोण की मृत्यु तथा कौरवों की हार का गहरा आघात है। इसी आघात से उसके भीतर प्रतिशोध की भावना जन्म लेती है।
वह बदला लेने के लिए इतना अधीर हो जाता है कि उचित-अनुचित का अंतर भूल जाता है। वह रात में पांडव शिविर पर हमला करता है और सोए हुए लोगों की हत्या करता है।
अश्वत्थामा का चरित्र यह दिखाता है कि जब दुख और क्रोध विवेक पर हावी हो जाते हैं, तब मनुष्य हिंसा को उचित समझने लगता है। उसका प्रतिशोध केवल उसके शत्रुओं को ही नहीं, बल्कि स्वयं उसके व्यक्तित्व को भी नष्ट करता है।
इस प्रकार अश्वत्थामा क्रोध, प्रतिशोध, हिंसा और विवेकहीनता का प्रतीक है।
प्रश्न 5. गांधारी के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
गांधारी एक माँ के रूप में अत्यंत संवेदनशील और भावुक पात्र हैं। उन्होंने अपने सभी पुत्रों को खो दिया है। इस कारण उनके भीतर गहरा मातृ-दुःख और शोक है।
पुत्रों की मृत्यु के लिए वे युद्ध की परिस्थितियों और उससे जुड़े लोगों को जिम्मेदार मानती हैं। उनके मन में कृष्ण के प्रति भी आक्रोश उत्पन्न होता है। इसी आक्रोश में वे कृष्ण को शाप देती हैं।
गांधारी के चरित्र में एक ओर माँ का अपार प्रेम है, तो दूसरी ओर पुत्र-विनाश से पैदा हुआ क्रोध और दुःख है। उनका चरित्र यह प्रश्न भी उठाता है कि क्या केवल भावनाओं के आधार पर किसी व्यक्ति को पूरे विनाश के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
इस प्रकार गांधारी नाटक में मातृत्व, शोक, क्रोध और नैतिक द्वंद्व की प्रतिनिधि हैं।
प्रश्न 6. ‘अंधा युग’ की आधुनिक प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यद्यपि ‘अंधा युग’ की कथा महाभारत के युद्ध पर आधारित है, लेकिन इसके प्रश्न आधुनिक समाज के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। आज भी दुनिया में सत्ता, स्वार्थ, अहंकार, हिंसा और प्रतिशोध के कारण संघर्ष होते हैं।
धर्मवीर भारती ने महाभारत की कथा के माध्यम से यह दिखाया है कि युद्ध केवल सैनिकों की मृत्यु नहीं लाता, बल्कि समाज की नैतिक और मानवीय संरचना को भी कमजोर करता है।
धृतराष्ट्र का मोह, दुर्योधन का अहंकार और अश्वत्थामा का प्रतिशोध आज के मनुष्य के भीतर भी अलग-अलग रूपों में दिखाई दे सकता है। इसलिए नाटक हमें अपने निर्णयों में विवेक, मानवता और नैतिकता बनाए रखने की प्रेरणा देता है।
इसी कारण ‘अंधा युग’ आज भी युद्ध, हिंसा और नैतिक संकट से जूझती दुनिया के लिए प्रासंगिक रचना है।
प्रश्न 7. ‘अंधा युग’ में कृष्ण की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘अंधा युग’ में कृष्ण का व्यक्तित्व विवेक, धर्म और चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। वे युद्ध की घटनाओं से जुड़े होने के बावजूद केवल एक राजनीतिक पात्र नहीं हैं।
कृष्ण परिस्थितियों के गहरे अर्थ को समझते हैं। वे जानते हैं कि मनुष्य के कर्मों का परिणाम अवश्य सामने आता है। गांधारी जब उन्हें शाप देती हैं, तब वे उस शाप को स्वीकार करते हैं।
नाटक के अंधकारपूर्ण वातावरण में कृष्ण एक ऐसी चेतना का संकेत देते हैं जो मनुष्य को सत्य और धर्म की ओर लौटने की प्रेरणा देती है।
इसलिए कृष्ण नाटक में विवेक और नैतिक चेतना के प्रतीक के रूप में महत्वपूर्ण हैं।
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