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Toggleसजीवों में नियंत्रण व समन्वय chapter-1
सबसे पहले Chapter का मुख्य विचार समझें
हमारे शरीर में एक साथ हजारों काम होते रहते हैं।
जैसे—
हम चलते हैं।
भोजन पचता है।
हृदय धड़कता है।
आँखें प्रकाश को पहचानती हैं।
हाथ किसी गर्म वस्तु से हट जाता है।
शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है।
बच्चे का शरीर धीरे-धीरे बढ़ता है।
इन सभी क्रियाओं को नियंत्रित और आपस में समन्वित करना आवश्यक है।
यही काम मुख्य रूप से दो प्रकार से होता है—
1. तंत्रिका नियंत्रण (Nervous Coordination)
2. रासायनिक नियंत्रण (Chemical Coordination)
मनुष्य में तंत्रिका तंत्र और हार्मोन दोनों मिलकर शरीर की विभिन्न जैविक क्रियाओं का नियंत्रण करते हैं। आपके अध्याय के MCQ में भी शरीर की विभिन्न जैविक क्रियाओं के नियंत्रण में तंत्रिका और रसायन दोनों की भूमिका बताई गई है।
1.a सजीव में नियंत्रण और समन्वय
1. नियंत्रण क्या है?
किसी जीव के शरीर में होने वाली विभिन्न क्रियाओं को आवश्यकता के अनुसार संचालित करना नियंत्रण कहलाता है।
उदाहरण
जब हम बहुत गर्म वस्तु को छूते हैं, तो हमारा हाथ तुरंत पीछे हट जाता है।
यह क्रिया अपने-आप सही समय पर होती है। इसका उद्देश्य शरीर को नुकसान से बचाना है।
2. समन्वय क्या है?
शरीर के अलग-अलग अंगों द्वारा मिलकर किसी कार्य को सही ढंग से पूरा करना समन्वय कहलाता है।
उदाहरण
जब हम गेंद पकड़ते हैं—
आँख गेंद को देखती है → मस्तिष्क सूचना प्राप्त करता है → तंत्रिकाएँ आदेश पहुँचाती हैं → हाथ की मांसपेशियाँ सिकुड़ती हैं → हाथ गेंद पकड़ लेता है।
यहाँ आँख, मस्तिष्क, तंत्रिकाएँ और मांसपेशियाँ मिलकर काम कर रहे हैं।
इसी को समन्वय कहते हैं।
3. उद्दीपन क्या है?
पर्यावरण में होने वाला ऐसा परिवर्तन जिससे जीव में कोई प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है, उसे उद्दीपन (Stimulus) कहते हैं।
उदाहरण
तेज प्रकाश
गर्मी
ठंड
ध्वनि
स्पर्श
पानी
गुरुत्वाकर्षण
रसायन
ये सभी उद्दीपन हो सकते हैं।
4. अनुक्रिया क्या है?
किसी उद्दीपन के कारण जीव द्वारा दिखाई गई प्रतिक्रिया को अनुक्रिया (Response) कहते हैं।
उदाहरण
तेज प्रकाश आँख पर पड़ा → आँख की पुतली छोटी हो गई।
यहाँ—
प्रकाश = उद्दीपन
पुतली का सिकुड़ना = अनुक्रिया
आपके अध्याय में भी उद्दीपन, प्रतिचार/अनुक्रिया और उत्तेजनशीलता को पौधों की संवेदनशीलता के महत्वपूर्ण भाग के रूप में रखा गया है।
5. उत्तेजनशीलता क्या है?
उद्दीपन को पहचानकर उसके प्रति प्रतिक्रिया करने की जीव की क्षमता को उत्तेजनशीलता (Irritability/Excitability) कहते हैं।
सरल उदाहरण
यदि कोई व्यक्ति आपके हाथ को छूता है और आपको स्पर्श का अनुभव होता है, तो यह उद्दीपन को महसूस करने और प्रतिक्रिया देने की क्षमता है।
6. पौधों में भी संवेदनशीलता होती है
बहुत से विद्यार्थी सोचते हैं कि केवल मनुष्य और जानवर ही वातावरण को महसूस कर सकते हैं।
लेकिन पौधे भी विभिन्न उद्दीपनों के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं।
उदाहरण—
पौधे प्रकाश की ओर बढ़ते हैं।
जड़ें पानी की ओर बढ़ती हैं।
जड़ें गुरुत्वाकर्षण की दिशा में बढ़ती हैं।
कुछ पौधे स्पर्श के कारण गति करते हैं।
आपके स्रोत में आचार्य जगदीश चंद्र बोस द्वारा पौधों की संवेदनशीलता के अध्ययन का उल्लेख है तथा बोस विज्ञान मंदिर की स्थापना 1917 में बताई गई है।
7. पौधों में गति
पौधों की गति को मुख्य रूप से उद्दीपन के आधार पर समझा जा सकता है।
आपके अध्याय में निम्न प्रकार की गतियों का उल्लेख है—
स्वतः गति
प्रेरित गति
प्रकाश प्रेरण गति
उष्मा प्रेरण गति
रसायन प्रेरण गति
वक्रण गति
वृद्धि गति
अनुवर्तन गति
अनुकुंचन गति
8. अनुवर्तन गति क्या है?
जब पौधे के किसी अंग की वृद्धि या गति किसी बाहरी उद्दीपन की दिशा से प्रभावित होती है, तो उसे अनुवर्तन गति (Tropic Movement) कहते हैं।
इसे तीन प्रकार से समझें—
धनात्मक अनुवर्तन
उद्दीपन की दिशा में गति।
ऋणात्मक अनुवर्तन
उद्दीपन की विपरीत दिशा में गति।
लम्बवत् अनुवर्तन
उद्दीपन की दिशा के लम्बवत् गति।
9. प्रकाशानुवर्तन
प्रकाश के प्रभाव से पौधे के अंगों में होने वाली दिशा-विशिष्ट गति को प्रकाशानुवर्तन (Phototropism) कहते हैं।
उदाहरण
पौधे का तना प्रकाश की ओर बढ़ता है।
इसलिए तने में सामान्यतः धनात्मक प्रकाशानुवर्तन दिखाई देता है।
जड़ प्रकाश से दूर जाती है, इसलिए जड़ में ऋणात्मक प्रकाशानुवर्तन देखा जाता है।
10. गुरुत्वानुवर्तन
पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से पौधे के अंगों में होने वाली दिशा-विशिष्ट गति को गुरुत्वानुवर्तन (Geotropism) कहते हैं।
जड़
जड़ गुरुत्वाकर्षण की दिशा में नीचे जाती है।
→ धनात्मक गुरुत्वानुवर्तन
तना
तना गुरुत्वाकर्षण के विपरीत ऊपर की ओर बढ़ता है।
→ ऋणात्मक गुरुत्वानुवर्तन
आपके स्रोत में सुन्दरी पौधों के श्वसन मूल (Pneumatophores) में ऋणात्मक जियोट्रोपिक गति का उदाहरण दिया गया है।
11. जलानुवर्तन
पानी की दिशा के प्रभाव से पौधे के अंगों की गति को जलानुवर्तन (Hydrotropism) कहते हैं।
उदाहरण
पौधों की जड़ें पानी के स्रोत की ओर बढ़ती हैं।
इसलिए जड़ों में सामान्यतः धनात्मक जलानुवर्तन पाया जाता है।
1.b पौधों में अनुक्रिया और रासायनिक समन्वय — हार्मोन्स
पौधे चलते-फिरते नहीं हैं, फिर भी उनमें वृद्धि, विकास, फूल आना, फल बनना आदि क्रियाएँ होती हैं।
इन क्रियाओं के नियंत्रण में पादप हार्मोन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
12. पादप हार्मोन क्या हैं?
पौधों में बहुत कम मात्रा में बनने वाले ऐसे रासायनिक पदार्थ जो पौधों की वृद्धि, विकास और विभिन्न क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं, उन्हें पादप हार्मोन या फाइटोहार्मोन कहते हैं।
आपके स्रोत में पादप हार्मोनों की विशेषताओं में कम मात्रा में कार्य करना, विशिष्ट कोशिकाओं द्वारा स्रावित होना और परिवहन तंत्र द्वारा स्थानांतरण जैसी बातें दी गई हैं।
13. पादप हार्मोन की मुख्य विशेषताएँ
सरल शब्दों में—
ये बहुत कम मात्रा में कार्य करते हैं।
ये पौधों की वृद्धि और विकास को नियंत्रित करते हैं।
इनका प्रभाव कम या अधिक मात्रा के अनुसार बदल सकता है।
इन्हें पौधे के विशेष भागों में बनाया जा सकता है।
ये पौधे के दूसरे भागों तक पहुँचकर प्रभाव डाल सकते हैं।
14. ऑक्सिन (Auxin)
ऑक्सिन पौधों का एक महत्वपूर्ण वृद्धि हार्मोन है।
यह मुख्य रूप से पौधे की वृद्धि और प्रकाश की ओर तने के मुड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
ऑक्सिन के प्रमुख कार्य
कोशिकाओं की वृद्धि में सहायता।
तने की लंबाई बढ़ाने में सहायता।
जड़ों के विकास को प्रभावित करना।
प्रकाशानुवर्तन में भूमिका।
पौधे के विकास को नियंत्रित करना।
आसान उदाहरण
जब किसी पौधे पर एक तरफ से प्रकाश पड़ता है, तो तना प्रकाश की ओर झुकता है।
इस प्रक्रिया में ऑक्सिन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
15. जिबरेलिन (Gibberellin)
जिबरेलिन भी पौधों का एक महत्वपूर्ण वृद्धि हार्मोन है।
आपके स्रोत के अनुसार जिबरेलिन पौधों की वृद्धि को नियंत्रित करता है और इसकी खोज जापानी वैज्ञानिक कुरोसावा से संबंधित बताई गई है।
जिबरेलिन के प्रमुख कार्य
1. तने की लंबाई बढ़ाना
यह तने के पर्वों की लंबाई बढ़ाने में सहायता करता है।
2. फूल और पत्तियों के आकार में वृद्धि
यह पौधे के कुछ भागों के आकार को बढ़ाने में सहायता करता है।
3. बीज के अंकुरण में सहायता
यह बीज की सुप्तावस्था समाप्त करके अंकुरण में सहायता कर सकता है।
4. बीजरहित फल निर्माण
कुछ परिस्थितियों में जिबरेलिन का उपयोग बीजरहित फल प्राप्त करने के लिए किया जाता है।
5. बौनेपन को दूर करना
कुछ बौने पौधों में वृद्धि को बढ़ाने में इसका उपयोग किया जा सकता है।
आपके स्रोत में जिबरेलिन के इन कार्यों सहित फूल खिलने और लिंग निर्धारण में भूमिका का भी उल्लेख है।
16. अन्य महत्वपूर्ण पादप हार्मोन
कक्षा 10 के विद्यार्थियों को इन नामों को भी पहचानना चाहिए—
| हार्मोन | प्रमुख कार्य |
|---|---|
| ऑक्सिन | वृद्धि एवं प्रकाशानुवर्तन |
| जिबरेलिन | तने की वृद्धि, अंकुरण |
| साइटोकाइनिन | कोशिका विभाजन |
| एथिलीन | फल पकने में सहायता |
| एब्सिसिक अम्ल | वृद्धि को रोकने तथा सुप्तावस्था में भूमिका |
आपके अध्याय के MCQ में एथिलीन को फल पकने में उपयोगी बताया गया है।
1.c जन्तुओं में अनुक्रिया और रासायनिक समन्वय — हार्मोन्स
अब पौधों से जन्तुओं की ओर आते हैं।
जन्तुओं में नियंत्रण और समन्वय के लिए दो प्रमुख माध्यम हैं—
तंत्रिका तंत्र + हार्मोन
हार्मोन शरीर के अंदर होने वाली अनेक धीमी लेकिन महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं।
17. हार्मोन क्या है?
अंतःस्रावी ग्रंथियों द्वारा स्रावित ऐसे रासायनिक संदेशवाहक पदार्थ, जो शरीर के दूसरे अंगों या कोशिकाओं की क्रियाओं को प्रभावित करते हैं, हार्मोन कहलाते हैं।
आपके स्रोत में हार्मोन को विशेष प्रकार का कार्बनिक पदार्थ तथा रासायनिक दूत बताया गया है।
इसे उदाहरण से समझें
मान लीजिए शरीर में किसी विशेष कार्य की आवश्यकता है।
अंतःस्रावी ग्रंथि → हार्मोन बनाती है → हार्मोन रक्त में जाता है → लक्षित अंग तक पहुँचता है → उस अंग की क्रिया बदलती है।
18. ग्रंथियाँ कितने प्रकार की होती हैं?
मुख्य रूप से—
1. अंतःस्रावी ग्रंथि
इनमें नलिकाएँ नहीं होतीं।
ये हार्मोन को सीधे रक्त में छोड़ती हैं।
2. बहिःस्रावी ग्रंथि
इनमें नलिकाएँ होती हैं और इनके स्राव नलिका के माध्यम से बाहर या किसी विशेष स्थान पर पहुँचते हैं।
उदाहरण—लार ग्रंथि।
3. मिश्रित ग्रंथि
जिस ग्रंथि में अंतःस्रावी और बहिःस्रावी दोनों प्रकार के कार्य पाए जाते हैं, उसे मिश्रित ग्रंथि कहते हैं।
अग्न्याशय (Pancreas) इसका प्रमुख उदाहरण है। आपके अध्याय के MCQ में भी अग्न्याशय को मिश्रित ग्रंथि और लार ग्रंथि को बहिःस्रावी ग्रंथि बताया गया है।
19. हार्मोन के प्रमुख कार्य
हार्मोन—
शरीर की वृद्धि को नियंत्रित करते हैं।
कोशिका विभाजन और विकास में सहायता करते हैं।
चयापचय को नियंत्रित करते हैं।
प्रजनन से संबंधित क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं।
शरीर में जल-संतुलन बनाए रखने में सहायता करते हैं।
विभिन्न जैविक क्रियाओं में समन्वय स्थापित करते हैं।
20. पीयूष ग्रंथि — Master Gland
पीयूष ग्रंथि (Pituitary Gland) को सामान्यतः मास्टर ग्रंथि कहा जाता है क्योंकि यह शरीर की कई अन्य अंतःस्रावी ग्रंथियों की क्रियाओं को नियंत्रित करने वाले हार्मोन बनाती है।
यह मस्तिष्क के नीचे स्थित होती है। आपके स्रोत में इसे मस्तिष्क के नीचे स्थित छोटी अंतःस्रावी ग्रंथि के रूप में बताया गया है।
21. पीयूष ग्रंथि के महत्वपूर्ण हार्मोन
ACTH
यह अधिवृक्क ग्रंथि के बाहरी भाग की क्रियाओं को नियंत्रित करने में सहायता करता है।
TSH
यह थायराइड ग्रंथि की वृद्धि तथा थायरॉक्सिन के निर्माण को नियंत्रित करने में सहायता करता है।
FSH
यह जनन ग्रंथियों की क्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और मादा में अंडाशय तथा नर में शुक्राणु निर्माण से संबंधित प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है।
LH
यह स्त्री में अंडोत्सर्जन और पुरुष में टेस्टोस्टेरॉन स्राव जैसी जनन संबंधी प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। स्रोत में पुरुषों में टेस्टोस्टेरॉन स्राव तथा स्त्री में कॉर्पस ल्यूटियम से संबंधित भूमिका दी गई है।
LTH / Prolactin
यह स्तन ग्रंथियों के विकास और दूध के स्राव से संबंधित है।
ADH
यह शरीर में जल-संतुलन बनाए रखने में सहायता करता है।
Growth Hormone
यह शरीर की वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है।
इसकी कमी से बच्चों में बौनापन हो सकता है और अधिकता से अत्यधिक वृद्धि हो सकती है। वयस्कों में अधिकता से एक्रोमेगाली हो सकती है।
22. थायराइड ग्रंथि
थायराइड ग्रंथि गर्दन में श्वासनली के दोनों ओर स्थित होती है।
इससे मुख्य रूप से थायरॉक्सिन जैसे हार्मोन निकलते हैं। स्रोत में थायरॉक्सिन, ट्राईआयोडोथायरोनिन और थाइरोकैल्सिटोनिन का उल्लेख है।
थायरॉक्सिन का महत्व
यह शरीर के चयापचय, वृद्धि और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इसके निर्माण के लिए आयोडीन आवश्यक है।
23. थायरॉक्सिन की कमी
क्रेटिनिज्म
बच्चों में थायरॉक्सिन की गंभीर कमी से वृद्धि और मानसिक विकास प्रभावित हो सकता है।
मिक्सीडिमा
वयस्कों में थायरॉक्सिन की कमी से शरीर की चयापचय दर कम हो सकती है और कई शारीरिक परिवर्तन दिखाई दे सकते हैं।
ग्वाइटर
आयोडीन की कमी से थायराइड ग्रंथि बढ़ सकती है, जिससे गर्दन में सूजन दिखाई देती है। आपके स्रोत में इसका उल्लेख है।
थायरॉक्सिन की अधिकता
थायरॉक्सिन की अधिकता से शरीर का चयापचय बढ़ सकता है, हृदय की गति बढ़ सकती है और आँखों के बाहर निकलने जैसी स्थिति भी दिखाई दे सकती है। स्रोत में इसे Exophthalmic goiter से जोड़ा गया है।
24. अग्न्याशय और इंसुलिन
अग्न्याशय (Pancreas) एक मिश्रित ग्रंथि है।
यह पाचन से संबंधित बहिःस्रावी कार्य भी करता है और इंसुलिन जैसे हार्मोन का स्राव करके रक्त में ग्लूकोज के स्तर को नियंत्रित करने में सहायता करता है।
आपके स्रोत में अग्न्याशय और इंसुलिन पर अलग प्रश्न दिए गए हैं।
1.d जन्तुओं में अनुक्रिया और भौतिक समन्वय — तंत्रिका तंत्र
अब Chapter का सबसे महत्वपूर्ण भाग आता है—तंत्रिका तंत्र।
हार्मोन रासायनिक संदेश के माध्यम से नियंत्रण करते हैं, जबकि तंत्रिका तंत्र विद्युत-रासायनिक संकेतों के माध्यम से बहुत तेजी से सूचना पहुँचाता है।
25. तंत्रिका तंत्र क्या है?
शरीर के विभिन्न भागों से सूचना प्राप्त करना, उसका विश्लेषण करना और उचित प्रतिक्रिया के लिए आदेश भेजना जिस व्यवस्था द्वारा होता है, उसे तंत्रिका तंत्र कहते हैं।
इसका मुख्य कार्य है—
उद्दीपन → सूचना → विश्लेषण → आदेश → अनुक्रिया
26. न्यूरॉन — तंत्रिका तंत्र की इकाई
न्यूरॉन (Neuron) तंत्रिका तंत्र की संरचनात्मक और क्रियात्मक इकाई है।
आपके अध्याय के MCQ में भी तंत्रिका तंत्र की इकाई के रूप में न्यूरॉन दिया गया है।
एक सामान्य न्यूरॉन के तीन प्रमुख भाग समझें—
1. डेंड्राइट
यह दूसरे न्यूरॉन या रिसेप्टर से संकेत प्राप्त करता है।
2. कोशिका शरीर
इसमें केंद्रक और अन्य कोशिकीय संरचनाएँ होती हैं।
3. अक्षतंतु (Axon)
यह तंत्रिका संकेत को आगे पहुँचाता है।
27. तंत्रिका तंत्र के मुख्य भाग
मनुष्य के तंत्रिका तंत्र को मुख्य रूप से—
केंद्रीय तंत्रिका तंत्र (CNS)
और
परिधीय तंत्रिका तंत्र (PNS)
में समझा जाता है।
केंद्रीय तंत्रिका तंत्र
इसमें—
मस्तिष्क
मेरुरज्जु
शामिल होते हैं।
परिधीय तंत्रिका तंत्र
यह शरीर के विभिन्न भागों को केंद्रीय तंत्रिका तंत्र से जोड़ता है।
28. मस्तिष्क
मस्तिष्क शरीर का प्रमुख नियंत्रण केंद्र है।
यह—
सोचने,
समझने,
स्मरण,
देखने,
सुनने,
बोलने,
इच्छा से होने वाली गतिविधियों
आदि को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
आपके अध्याय में सेरिब्रम का संबंध बुद्धि से बताया गया है।
29. सेरिब्रम
सेरिब्रम मस्तिष्क का बड़ा भाग है।
इसके द्वारा—
बुद्धि
स्मृति
विचार
निर्णय
इच्छानुसार होने वाली गतिविधियाँ
संवेदनाओं की पहचान
जैसी महत्वपूर्ण क्रियाओं का नियंत्रण होता है।
30. मेरुरज्जु
मेरुरज्जु मस्तिष्क से निकलकर रीढ़ की हड्डी के अंदर स्थित रहती है।
यह मस्तिष्क और शरीर के विभिन्न भागों के बीच संदेशों का आदान-प्रदान करती है।
यह प्रत्यावर्ती क्रिया (Reflex Action) में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
31. प्रत्यावर्ती क्रिया क्या है?
किसी उद्दीपन के प्रति होने वाली बहुत तेज और स्वतः प्रतिक्रिया को प्रत्यावर्ती क्रिया कहते हैं।
उदाहरण
आपने गर्म वस्तु छू ली।
गर्मी → संवेदी तंत्रिका → मेरुरज्जु → मोटर तंत्रिका → हाथ की मांसपेशी → हाथ पीछे
हाथ को पीछे हटाने में पहले से सोचने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
इसलिए यह प्रत्यावर्ती क्रिया है।
32. प्रतिवर्ती चाप
प्रत्यावर्ती क्रिया के दौरान जिस मार्ग से तंत्रिका संदेश जाता है, उसे प्रतिवर्ती चाप (Reflex Arc) कहते हैं।
इसे इस तरह याद करें—
ग्राही → संवेदी न्यूरॉन → मेरुरज्जु → मोटर न्यूरॉन → मांसपेशी → प्रतिक्रिया
यह परीक्षा में बहुत महत्वपूर्ण है।
33. आँख और दृष्टि
आँख प्रकाश को ग्रहण करने वाला प्रमुख ज्ञानेन्द्रिय अंग है।
वस्तु से आने वाला प्रकाश आँख के विभिन्न भागों से होकर दृष्टिपटल (Retina) तक पहुँचता है।
आपके अध्याय में भी वस्तु का प्रतिबिंब दृष्टिपटल पर बनने और दृष्टिपटल में दंड तथा शंकु कोशिकाओं के पाए जाने का उल्लेख है।
दंड कोशिकाएँ
कम प्रकाश में देखने में सहायता करती हैं।
शंकु कोशिकाएँ
रंगों और तेज प्रकाश में देखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
1.e जन्तुओं में प्रचलन — एक प्रकार की अनुक्रिया
यह भाग बहुत आसान है।
34. प्रचलन क्या है?
किसी जन्तु का एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना प्रचलन (Locomotion) कहलाता है।
उदाहरण
मनुष्य का चलना
दौड़ना
पक्षी का उड़ना
मछली का तैरना
साँप का रेंगना
35. प्रचलन और गति में अंतर
इसे परीक्षा के लिए जरूर समझें।
गति (Movement)
शरीर के किसी अंग या पूरे शरीर की स्थिति में परिवर्तन को सामान्य रूप से गति कहते हैं।
प्रचलन (Locomotion)
जब पूरा जीव एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता है, तो उसे प्रचलन कहते हैं।
उदाहरण
मनुष्य का हाथ हिलाना → गति
मनुष्य का एक स्थान से दूसरे स्थान पर चलना → प्रचलन
36. प्रचलन के लिए क्या आवश्यक है?
जन्तुओं में प्रचलन के लिए मुख्य रूप से—
तंत्रिका तंत्र + मांसपेशियाँ + कंकाल तंत्र
का समन्वित कार्य आवश्यक होता है।
मनुष्य में हड्डियाँ स्वयं नहीं चलतीं। मांसपेशियाँ हड्डियों पर खिंचाव डालती हैं और जोड़ उनकी गति में सहायता करते हैं।
इसलिए—
मस्तिष्क आदेश देता है → तंत्रिकाएँ संदेश पहुँचाती हैं → मांसपेशियाँ सिकुड़ती/ढीली होती हैं → हड्डियाँ जोड़ों पर गति करती हैं → शरीर चलता है।
37. मनुष्य में प्रचलन
मनुष्य में प्रचलन मुख्य रूप से पैरों और मांसपेशियों की सहायता से होता है।
चलते समय अनेक मांसपेशियाँ एक-दूसरे के साथ समन्वय करके कार्य करती हैं।
उदाहरण के लिए पैर को आगे बढ़ाने, घुटने को मोड़ने और शरीर का संतुलन बनाए रखने में कई मांसपेशियों तथा तंत्रिका संकेतों का समन्वय होता है।
आपके अध्याय के MCQ में मनुष्य के चलन को द्विपद के रूप में पूछा गया है।
38. विभिन्न जन्तुओं में प्रचलन
| जन्तु | प्रचलन का तरीका |
|---|---|
| मनुष्य | चलना/दौड़ना |
| पक्षी | उड़ना |
| मछली | तैरना |
| साँप | रेंगना |
| अमीबा | कूटपाद द्वारा |
| पैरामीशियम | पक्ष्माभ द्वारा |
| यूग्लीना | कशाभ द्वारा |
आपके स्रोत में अमीबा में अमीबीय गति तथा मनुष्य में द्विपद चलन से संबंधित प्रश्न दिए गए हैं।
39. पूरे Chapter को एक Flow में समझें
अब पूरे अध्याय को एक कहानी की तरह समझिए:
पर्यावरण में परिवर्तन हुआ
↓
उद्दीपन उत्पन्न हुआ
↓
जीव ने उद्दीपन को महसूस किया
↓
सूचना का नियंत्रण केंद्र तक पहुँचना
↓
सूचना का विश्लेषण
↓
उचित आदेश
↓
मांसपेशी/ग्रंथि/अन्य अंग की प्रतिक्रिया
↓
अनुक्रिया
और यह नियंत्रण दो प्रमुख तरीकों से हो सकता है—
तंत्रिका नियंत्रण
तेज → न्यूरॉन → विद्युत-रासायनिक संकेत → तुरंत प्रतिक्रिया
हार्मोनल नियंत्रण
रासायनिक → हार्मोन → रक्त द्वारा परिवहन → अपेक्षाकृत धीमी लेकिन व्यापक/दीर्घ प्रभाव वाली प्रतिक्रिया
परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण अंतर
| आधार | तंत्रिका समन्वय | हार्मोनल समन्वय |
|---|---|---|
| माध्यम | तंत्रिकाएँ | हार्मोन |
| संकेत | तंत्रिका संकेत | रासायनिक संकेत |
| गति | बहुत तेज | सामान्यतः धीमी |
| प्रभाव | प्रायः कम समय का | कई बार अधिक लंबे समय तक |
| उदाहरण | गर्म वस्तु से हाथ हटाना | वृद्धि, चयापचय, प्रजनन |
Chapter का सबसे आसान Revision
उद्दीपन → कारण
अनुक्रिया → प्रतिक्रिया
उत्तेजनशीलता → उद्दीपन को पहचानकर प्रतिक्रिया देने की क्षमता
पादप हार्मोन → पौधों की वृद्धि और विकास नियंत्रित करते हैं
ऑक्सिन → वृद्धि और प्रकाशानुवर्तन
जिबरेलिन → तने की वृद्धि और अंकुरण
एथिलीन → फल पकना
हार्मोन → रासायनिक संदेशवाहक
पीयूष ग्रंथि → मास्टर ग्रंथि
TSH → थायराइड को प्रभावित करता है
FSH/LH → जनन संबंधी क्रियाएँ
ADH → जल संतुलन
Growth Hormone → शरीर की वृद्धि
थायरॉक्सिन → चयापचय और विकास
इंसुलिन → रक्त ग्लूकोज नियंत्रण
न्यूरॉन → तंत्रिका तंत्र की इकाई
मस्तिष्क → प्रमुख नियंत्रण केंद्र
मेरुरज्जु → संदेशों का मार्ग और प्रत्यावर्ती क्रिया में महत्वपूर्ण
प्रत्यावर्ती क्रिया → तेज, स्वतः प्रतिक्रिया
प्रचलन → पूरे जीव का एक स्थान से दूसरे स्थान जाना।
इस तरह “सजीवों में नियंत्रण व समन्वय” का मूल विचार है—सजीव अपने वातावरण से उद्दीपन ग्रहण करते हैं, उसका विश्लेषण करते हैं और उचित अनुक्रिया करते हैं; यह कार्य तंत्रिका तंत्र तथा रासायनिक संदेशवाहक हार्मोनों के समन्वय से होता है।
part-1
A. वास्तुनिष्ठ प्रशन (mcq ):
१.शरीर की विभिन जैविक क्रियाओ का नियंतरण होता है –
(a ) रसायनो द्वारा (b )तंत्रिका द्वारा
(c )तंत्रिका और रसायन द्वारा
(d)उपरोक्त में से कोई नहीं (ans )
२.रहित पौधों के उत्पादन में सहायक है-
(a ) साइटोकाइनिन (b )ऑक्सीन
(c ) गिबैरलिन (d)आक्सीन तथा
गिबैरलिन(ans )
३.इनमें से कौन फल पकने के लिए प्रयुक्त होता है –
(a )ऑक्सीन (b)गिबैरलिन
(c )एथिलीन (d )साइटोकाइनिन (ans )
४.अंतःस्रावी ग्रंथि का स्राव कहलाता है-
(a) लार (b )द्रव
(c ) हार्मोन्स (d )इनमें से कोई नहीं
(1 .a )पौधे में संवेदन तथा अनुक्रिया :

.chapter-1 question /ans
उत्तर :कोशिका को जीवन की रचनाशील तथा किर्याशील इकाई कहा गया है।
उत्तर :कोशिका सजीवों की शरीर का निर्माण करती है।
उत्तर :वातावरण में होने वाला वह परिवर्तन जिसके कारण पौधे में गति होती है उसे उद्दीपन कहते है।
उत्तर :उद्दीपन के कारण हुई प्रतिक्रिया को प्रतिचार अथवा अनुक्रिया के नाम से जाना जाता है। जैसे छुई -मुई को स्पर्श करना उद्दीपन है और पत्ते का बंद होना अनुक्रिया है।
उत्तर :उद्दीपन के कारण पौधे में प्रतिचार का होना ,जीवद्रव्य का विशेष लक्षण है जिसे उत्तेजनशीलता कहते है।
उत्तर :उत्तेजनशीलता का अर्थ है कि जीवद्रव्य वातावरण के परिवर्तनों के प्रति संवेदन शीलता की क्षमता रखना है। जीवद्रव की उत्तेजनशीलता के कारण ही पौधे अपनेको वातावरण के अनुकूल बनाए रखते है।
उत्तर :उद्दीपन दो प्रकार के होते है १. बाहरी उद्दीपन २.आन्तरिक उद्दीपन।

आचर्य जगदीश चन्द्र बोस :
आचार्य जगदीश चन्द्र बोस एक महान वैज्ञानिक थे। जिन्होंने पौधे में संवेदनशीलता का अध्ययन कर सम्पूर्ण विश्व को बताया की पौधो में भी जान होती है। उन्होंने 1991 में क्रेस्कोग्रॉफ नमक यंत्र का का अविष्कार किया और लोगो को बताया की मनुष्य की तरह पेड़ -पोधो भी सुख दुःख का अनुभव करते है। संवेदनशीलता को दर्शाने के लिए एक बड़े से वृक्ष को बेहोश करने के पक्ष्चात उसका transplantation किया गया। तब पता चला की वह पौधा नए स्थान में होश में आने के बाद विकसित होने लगा। अतः उन्होंने सिद्ध क्र दिया की पौधे में जान है। 1917 में बोस विज्ञान मंदिर की स्थापना की गई।
उत्तर :बोस विज्ञान मंदिर की स्थापना 1917 में की गई।
उत्तर :उद्दीपन के प्रभाव से सजीवों के शरीर के किसी विशेष भाग की स्थिति का परिवर्तन गति कहलाता है।
उत्तर :पौधे की गति निम्न्लिखित प्रकार की होती है, जैसे ( 1 )चालन गति (2 ) वक्रता गतियाँ (3 )आर्द्रताग्राही या स्फीत गति।
उत्तर :पौधे की गति निम्न्लिखित प्रकार की होती है, जैसे ( 1 )चालन गति (2 ) वक्रता गतियाँ (3 )आर्द्रताग्राही या स्फीत गति।
(1 )प्रचलन गति :जब पौधे का सम्पूर्ण शरीर स्वतः या किसी बाह्रा उद्दीपन के प्रभाव से एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्थानान्तरित होता है तो इस प्रकार की गति को प्रचलन गति कहते है।
(2 )वक्रणगति: उच्च श्रेणी के पोधो की जड़ें मिटटी को जकड़े रहती है ; अतः ये पौधे स्थान परिवर्तन नहीं कर सकते लेकिन इनके तनों के शीर्ष भाग, जड़ों के शीर्ष भाग, शाखाएँ तथा पत्तियाँ वृद्धि या वाह्य उद्दीपन के प्रभाव से अपने स्थान से स्थानान्तरित हो जाती हैं तथा विभिन्न प्रकार से टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं। इस प्रकार पौधों के अंगों में वक्र रूप से अपने स्थान से स्थनान्तरित होने की क्रिया को वक्रण गति कहते हैं।
(3 )आर्द्रताग्राही वा स्फीत गतियाँ (Hygroscopic or Turgor developments) अनुचलन तथा अनुवर्तन गतियों जीवद्रव की उत्तेजनशीलता के कारण होती है और मृत पौधों में नहीं होतीं। इसलिए ये जैव गतियाँ कहलाती हैं। इनके विपरीत कुछ गतियाँ ऐसी भी होती हैं जो पानी के अन्तःशोषण या उसके बाहर निकल जाने के कारण होती है। इन गतियों के लिए जीवित कोशिकाओं का होना आवश्यक नहीं है तथा ये यांत्रिक होती हैं। यांत्रिक गतियाँ मृत अंगों में भी हो सकती हैं। इन्हीं गतियों को आद्रताग्राही गतियाँ कहते हैं।
उत्तर :वह गति जो पोधो में बिना किसी बाहरी उद्दीपन के प्रभाव से स्वतः सम्पन होती है उसे स्वतः गति कहते है।
उत्तर :पौधों में होने वाली वह स्वतंत्र गति जिसके द्वारा किसी बाहरी उद्दीपन के प्रभाव से पौधों या पौधों के अंग में स्थान परिवर्तन होता है उसे प्रेरित गति कहते है।
उत्तर :जब प्रकाश उद्दीपन के प्रभाव से पौधों का सम्पूर्ण शरीर स्थान परिवर्तन करता है। इस प्रकार की गति को प्रकाश प्रेरण गति कहते है।
उत्तर :जब उष्मा उद्दीपन के प्रभाव से पौधों का सम्पूर्ण शरीर स्थान परिवर्तन करता है ,तो इस प्रकार की गति को उष्मा प्रेरण गति कहते है।
उत्तर :जब रासायनिक उद्दीपन के प्रभाव से पौधों का सम्पूर्ण शरीर परिवर्तन स्थान परिवर्तीत करता है तो इस प्रकार की गति को कीमोटेक्टिक गति कहते है
उत्तर : वह वक्रण गति जो पौधों के विभिन्न भागो में बिना किसी वाहन उद्दीपन के प्रभाव से प्रभावित हुये स्वतः होती हैं उसे स्वतः वक्रण गति कहते है।
उत्तर :पौधों में होने वाली वह वक्रण गति जो किसी वाह्रा उद्दीपन के प्रभाव से सम्पन्न होती है उसे प्रेरित वक्रण गति कहते है।
उत्तर :पौधों के वृध्दि प्रदेश में आसमान वृध्दि के कारण पौधों के अंगो में वक्रण गति उतपन्न होती है उसे वृध्दिजगत कहते हैं।
.अनुवर्तन गति का परिभाषा देते हुए उसके प्रकारो का वर्णन करो।
उत्तर :अनुवर्तन गति (Tropic movement) – परिभाषा जब पौधों के अंगों की गति वाहा उद्दीपन की दिशा के प्रभाव से प्रभावित होकर (उद्दीपन की दिशा की ओर या विपरीत दिशा की ओर) सम्पन्न होती है तो इस प्रकार की गति को अनुवर्तन गति (Tropic movement) कहते हैं। उद्दीपन की दिशा की ओर होने वाली पौधों के अंगों की गति को धनात्मक (Positive) ट्रोपिक गति, उद्दीपन की दिशा के विपरीत होने वाली गति को ऋणात्मक (Negative) अनुवर्तन गति तथा उद्दीपन के लम्बवत् होने वाली गति को डाया या प्लेजिया (Dia या Plageo) ट्रोपिक गति कहते हैं। वाह्य उद्दीपन के आधार पर अनुवर्तन गति निम्नलिखित प्रकार की होती है-
(a) प्रकाश अनुवर्तन गति (Phototropic development or Photograph tropism) प्रकाश उद्दीपन के प्रभाव से पौधों के अंगों में जो गति उत्पन्न होती है उसे प्रकाश अनुवर्तन गति (Phototropism) कहते हैं। जैसे-पौधों के तना तथा शाखायें प्रकाश की दिशा की ओर गति-शील होती हैं अतः इसे धनात्मक प्रकाशानुवर्तन (Positive phototropic) गति कहते हैं। लेकिन जड़ें प्रकाश की दिशा के विपरीत जमीन के अन्दर गति करती है, इसे ऋणात्मक प्रकाशानुवर्तन (Negative Phototropic) गति कहते हैं। पौधों की पत्तियाँ अधिक प्रकाश ग्रहण करने के लिए प्रकाश की दिशा के लम्बवत् गतिशील होती हैं अतः पत्तियों की इस गति को लम्बवत् अनुवर्तन (Diatropicor cross over phototropic) गति कहते हैं।


(b) गुरुत्वानुवर्ती गति (Geotropism)- परिभाषा – जब पौधों के अंगों की गति पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल की दिशा के प्रभाव से प्रभावित होती है तो इस गति को गुरुत्वानुवर्ती गति (Geotropism) कहते हैं। पौधों की प्राथमिक (Essential) जड़ें पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल की ओर जमीन के अन्दर गतिशील होती हैं अतः जड़ों की गति को धनात्मक गुरुत्वानुवर्तन (Positive geotropic) गति कहते हैं लेकिन पौधों का तना गुरुत्वाकर्षण बल के विपरीत भूमि से ऊपर की ओर गतिशील होता है अतः तना की गति को ऋणा-त्मक गुरुत्वानुवर्ती (Negative geotropic) गति कहते हैं। गौण जड़ें (Auxiliary root) तथा शाखायें गुरुत्व बल के लम्बवत् गतिशील होती हैं अतः इनकी गति को लम्बवत् गुरुत्वानुवर्ती (Cross over geotropic) गति कहते हैं।
(c) जलानुवर्ती गति (Hydrotropism) – पौधों के अंगों में गति जल स्रोत की दिशा के प्रभाव से प्रभावित होती है तो इस गति को hydrotropism कहते हैं। जैसे जड़ें भूमि के अन्दर जल स्रोत की दिशा की ओर मुड़ने लगती हैं।
पौधों की जड़ें जल स्रोत की ओर मुड़ती हैं अतः जड़ों की इस गति को Positive Hydrotropic गति कहते हैं। लेकिन पौधों का तना जल स्रोत से दूर भागता है अतः तना की इस गति को ऋणात्मक जलानुवर्ती (Negative hydrotropic) गति कहते हैं।

उत्तर :सुन्दरी पौधों के श्वसन मूल (Breathing roots or pneumatophores) में ऋणात्मक जियो ट्रोपिक (Negative geotropic) गति पायी जाती हैं।
उत्तर :अनुकुंचन गति (Nastic development) :जब पौधों के अंग की गति वाह्य उद्दीपन की दिशा पर निर्भर न रह कर उद्दीपन की तीव्रता (Force) द्वारा प्रभावित होती है तो इस गति को अनुकुंचन गति (Nastic development) कहते हैं।
अनुकुंचन गति उद्दीपन के अनुसार 5 प्रकार की होती है-(3) प्रकाशानुकुंचन (Photonasty) (b) तापानुकुंचन (Themonasty) (c) निशानुकुंचन (Nyctinasty) (d) रसायनानुकुंचन (Chemonasty) (e) स्पर्शानुकुंचन (Seismonasty)।
(a) प्रकाशानुकुंचन (Photonasty)- जब पौधों के अंगों में गति प्रकाश की तीव्रता द्वारा प्रेरित (prompt) होती है तो की गति को प्रकाशानुकुंचन (Photonasty) कहते हैं, जैसे कुमुदनी (lily), सूर्यमुखी (Sunflower), पापी (Poppy) आदि
फूल सूर्योदय के समय खिल जाते हैं तथा सूर्यास्त के समय बन्द हो जाते हैं। अतः फूल की इस गति को धनात्मक प्रकाशानुकुंचन कहते हैं। रात-रानी (Night sovereign) फूल रात में खिलता है अतः यह ऋणात्मक प्रकाशानुकुंचन (Negative photonasty) है।
आक्जे लिस (Oxalis), क्लोभर (Clover) आदि की पत्तियाँ संध्या होते हैं सिकुड़ जाती हैं तथा सुबह फैल जाती हैं।
(b) तापानुकुंचन (Thermonasty) ऊष्मा की तीव्रता के प्रभाव से पौधों के अंगों में जो गति उत्पन्न होती है उसे तापानुकुंचन (Thermonasty) कहते हैं। जैसे-दुलीप (Tulip), क्रोकस (Crocus) आदि फूल उच्च तापक्रम पर खिलते हैं तथा तापक्रम कम होते ही बन्द हो जाते हैं।
(c) रसायन अनुकुंचन (Chemonasty) रासायनिक पदार्थ की तीव्रता या सान्द्रता के प्रभाव से पौधों के अंगों में उत्पन्न गति को किमोनेस्टी (Chemonasty) कहते हैं। जैसे-प्रतान (Ringlet) क्लोरोफार्म से दूर भागता है, Sundew कीटभक्षी पौधे के स्पर्शाग (Limbs) प्रोटीन के घोल को स्पर्श करते ही सिकुड़ कर बन्द होने लगते हैं या कलश पादप के ढक्कन (top) कीटों के स्पर्श से बन्द हो जाते हैं।
(d) निशानुकुंचन (Nyctinasty)- जब पौधों के अंगों में गति प्रकाश तथा तापक्रम दोनों के संयुक्त प्रभाव से प्रभावित होती है तो इस प्रकार की गति को निक्टिनेस्टी (Nyctinasty) कहते हैं। शिम्बी जातीय पौधों जैसे अकाशिया (Acacia), बाउहिनिया (Bauhinia), मारशिलिया (Marsilea) आदि, नागफनी (Cactus), तम्बाकू (Tobacco) आदि के फूलों का खिलना तथा बन्द होना प्रकाश तथा तापक्रम दोनों पर निर्भर करता है।
(e) स्पर्शानुकुंचन (Seismonasty) स्पर्श, घर्षण, आघात आदि यांत्रिक उद्दीपनों के प्रभाव से पौधों के अंगों में उत्पन्न गति को स्पर्शानुकुंचन कहते हैं। जैसे छुई मुई (Delicate plant या Mimoso pudica) के पत्तियों को स्पर्श करते ही तुरन्त बन्द हो जाती हैं।
उत्तर :
अनुचलन (Strategy)
1. यह एक प्रेरित प्रचलन गति है।
2. इस गति में उद्दीपन की दिशा का प्रभाव पड़ता है।
3. यह गति प्रायः निम्न श्रेणी के पौधो में होती है।
4. इसमें स्थान परिवर्तन होता है।
5. इस प्रकार की गति पर पौधे के अंग की बनावट का प्रभाव नहीं होता है।
6. अनुचलन गति से पौधों के अंगों में वृद्धि नहीं होती है।
अनुवर्तन (Jungle)
1 .यह प्रेरित वक्र गति है।
2 .पौधों की यह गति उद्दीपन की दिशा पर निर्भर करती है।
3 .यह उच्च श्रेणी के पौधों में होती है।
4 .इसमें स्थान परिवर्तन नहीं होता है।
5 .यह गति पौधे के अंग की बनावट पर निर्भर नहीं करती है।
6 .पौधों के अंगों में वृद्धि होती है।
अनुकुचन (नैस्टिक)
1 .यह एक प्रेरित गति है।
2 .यह गति उद्दीपन की दिशा पर निर्भर नहीं करती है।
3 .यह गति उच्च श्रेणी के पौधों में होती है।
4 .इसमें पौधे स्थान परिवर्तन नहीं करते हैं।
5 .यह गति पौधे के अंग की बनावट पर निर्भर करती है।
6 .पौधों के अंगों में वृद्धि नहीं होती है।
(1.b )पौधों में प्रतिक्रिया व रासायनिक समन्वय -हार्मोन्स
.chapter-1 question /ans :
उत्तर :पादप हार्मोन्स की विशेषताएँ (Qualities of phyto chemicals) – (1) हार्मोन्स कम अणुभार वाले जटिल कुम्र्बनिक पदार्थ हैं जो जल में अति घुलनशील होते हैं। (2) ये विशिष्ट कोशिकाओं द्वारा स्रावित होते हैं। (3) में परिवहन तन्व द्वारा स्थानान्तरित होते हैं। (4) इनकी कमी और अधिकता प्रभावशाली होती है। (5) ये क्रिया के बाद समाप्त हो जाते हैं क्योंकि देर तक कायम नहीं रह सकते हैं। (6) ये प्रायः प्रोटीन प्रकृति के होते हैं। (7) हार्मोन्स अल्प मात्रा में क्रिया कर सकते हैं।
उत्तर :पादप हार्मोन को तीन भागों में बाँटा गया है-
(1) प्राकृतिक (Normal) – वे हार्मोन जो पौधों के कोशिकाओं में स्वतः संश्लेषित होते हैं।
(2) कृत्रिम (Counterfeit) – प्रयोगशालाओं में तैयार किये जाने वाले वे रासायनिक पदार्थ जिनकी प्रकृति पादप हार्मोन के समान होती है तथा जो पौधों की वृद्धि तथा कलिकाओं के खिलने में सहायता प्रदान करते हैं उन्हें कृत्रिम हार्मोन कहते हैं।
(3) परिकल्पित (Theoretical) – वे हार्मोन जिनके पौधों के अन्दर उपस्थित रहने की परिकल्पना की जा रही है उन्हें परिकल्पित हार्मोन कहते है।
उत्तर :वैज्ञानिक सोडिन ने 1915 ई. ऑक्सिन क्रिया को प्रमाणित किया।
उत्तर :ऑक्सीन की खोज कागल ने 1934 में किया था।
उत्तर :पौधों के वृध्दि प्रदेश से उतपन्न होने वाला अम्ली नाइट्रोजन युक्त पादप हार्मोन है जो पौधों के मूल तंत्र तथा प्ररोह तंत्र की वृध्दि को नियंत्रित करता है ,ऑक्सीन कहते है। इसका रासायनिक नाम इण्डाल एसिटिक एसिड है। यह मुख्यतः आक्सीजन ,हाइड्रोजन ,कार्बन तथा नाइट्रोजन द्वारा गठित रासायनिक योगिक है।
उत्तर :आक्सीन प्राकृतिक और कृत्रिम दो तरह के होते हैं। प्राकृतिक आक्सीन प्रायः तीन प्रकार का होता है (1) आक्सीन आक्जेनोटाइओलिक एसिड (2) आक्सीन b आक्जेनोलोनिक एसिड (3) हेट्रो आक्सीन-इन्डाल एसिटिक एसिड
उत्तर :ऑक्सीन के कार्य (Capability)
(1) वृद्धि नियंत्रण (Control of development)- आक्सीन का प्रमुख कार्य वृद्धि नियंत्रण है। यह वृद्धि में निम्न प्रकार से सहायक है- (a ) कोशिका विभाजन (Cell division), (b) कोशिका दीर्धीकरण (Cell stretching), (c) कैम्बियम को सक्रियता (Action of cambium), (d) जड़ में वृध्दि(Development of root), (e) शिखर प्रभुत्व (Apical predominance)
2. अनुवर्तन गति नियन्त्रण (Control of jungle development) – यह प्रकाशानुवर्तन (Phototropic) तथा गुरुत्वानुवर्तन (Geotropic) गतियों के नियंत्रण में सहायक है।
3. अंग विभेदन नियंत्रण (Control of organ separation) आक्सीन पौधों के विभिन्न अंग; जैसे-जड़, तना, पत्तियाँ, कलियाँ तथा फूलों के विकास तथा विभेदन में प्रमुख भूमिका अदा करता है। लेकिन जड़ तथा तना के अग्रभाग में आक्सीन अधिक परिणाम में उपस्थित रहता है फिर भी इन अग्र भागों में विभेदन की क्रिया नहीं होती।
4. फल का विकास परागण और अंडे के निषेचन के बाद अंडाशय में ऑक्सिन की मात्रा बढ़ जाती है और परिणामस्वरूप अंडाशय फल में बदलने लगता है।
5 .पत्तियों तथा फलो को गिरने से रोकना -ऑक्सीन के छिड़काव से फलों तथा पत्तियों का समय से पहले गिरना बंद हो जाता है।
उत्तर :अक्सिीन का व्यवहारिक उपयोग (Functional use of Auxin)-
1. कृषि के क्षेत्र में आक्सीन हार्मोन का उपयोग है-पार्थेनोकार्पी – Parthenocarpy अर्थात् बीजरहित फलों के निर्माण में।
2. कलम (Cutting) में आक्सीन के प्रयोग से कटे भागों से जड़ें शीघ्र निकल आती हैं।
3. अनावश्यक घासों को नष्ट करने के लिए कृत्रिम आक्सीन 2-4D का छिड़काव किया जाता है।
4. पत्ते, फूल तथा फलों को समय से पहले गिरने या झड़ने से रोकने के लिए आक्सीन का छिड़काव किया जाता है।
5. पौधों के ऊपरी भाग की छटाई करके कृत्रिम आक्सीन का छिड़काव करने से शीघ्र नयी नयी शाखायें निकल आती हैं।
जिबरेलिन का परिचय दिजीए :-
उत्तर : जिबरेलिन समूह वाला एक नाइट्रोजन विहीन कार्बनिक अम्ल है जो पौधों में वृध्दि को नोयंत्रित करता है।
जिबरेलिन (Gibberellin) यह आक्सीन के समान पौधों का एक वृद्धि कारक हार्मोन है। सर्वप्रथम जापानी वनस्पतिशास्त्री कूरोस्वा (Kuroswa) ने जिब्रेला फ्यूजिकूरोई (Gibbrella Fujikuroi) नामक फंगस से जिबरेलिन की खोज की। बाद में इंग्लैंड के यबूता ब्रेन (Yabuta Cerebrum) ने इसका नामकरण किया।
जिबरेलिन अंकुरित बिज ,बीजपत्र अदि में उत्पन होता है।

उत्तर :जिबरेलिन का मुख्य कार्य पौधों की वृद्धि करना है। (1) लम्बाई में वृद्धि (Development long). जिबरेलिन के प्रभाव से तने के पर्व (Internodes) की लम्बाई बढ़ जाती है जिससे पौधे अधिक लम्बे होने लगते हैं।
(2) आकार में वृद्धि (Expansion in size) – यह फूलों तथा पत्तियों के आकार में वृद्धि करता है।
(3) अंकुरण में सहायक (Impact on germination) – यह बीजों की सुसुप्ता अवस्था (Torpidity) को भंग कर अंकुरण में सहायता प्रदान करता है।
(4) विकर संश्लेषण (Blend of Protein) – यह हाइड्रोलिटिक इन्जाइम जैसे-एमाइलेज, प्रोटिपेज (Amylase, Protepase) आदि बीजों के अंकुरण के समय संश्लेषित करता है।
(5) पार्थेनोकार्थी (Parthenocarpy) – बीज रहित फलों के निर्माण में आकार है।
(6) अनुवंशिक बौनापन (Hereditary Dwarfism) – यह अनुवंशिक रूप से सहायक है। में छोटे फलों या पौधों का बौनापन दूर करता है।
(7) फूलों के खिलने में (Sprouting of blossoms) – यह सभी प्रकार के पौधों के फूलों को खिलने में सहायता करता है।
(8) लिंग निर्धारण (Sex assurance) – उच्च श्रेणी के पौधों के लिंग निर्धारण में सहायक है।
उत्तर :जिबरेलिन का व्यवहारिक उपयोग (Down to earth use of Gibberellin)- इसका व्यवहारिक उपयोग निम्नलिखित है
( 1) मक्का, मटर आदि कमजोर तना वाले पौधों की लम्बाई में वृद्धि जिबरेलिन के छिड़काव से किया जा सकता है।
(2)इसके प्रयोग से बीजों में अंकुरण शीघ्रतापूर्वक किया जा सकता है।
(3) द्वि-वर्षीय (Biennial) पौधों में इस हार्मोन के से प्रथम वर्ष में फल तथा फूल उत्पन किया जा सकता है।
(4) अंगूर, सेव, टमाटर आदि के पौधों पर छिड़काव के अधिक फल उत्पन्न किया जाता है।
उत्तर :पादप हार्मोन का कृषि में उपयोग (Use of plant chemical in agribusiness) कृषि के क्षेत्र में पादप हार्मोन का विशेष महत्व है। प्राकृतिक हार्मोन (Normal Chemical) के अतिरिक्त कृत्रिम हारमोन जैसे IBA, NAA, 2-40 आदि का उपयोग कृषि जगत के लिए वरदान साबित हुआ है। कुछ हार्मोन के उपयोग का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है-
1. वर्षी प्रजनन में कलम (Cutting) द्वारा वर्षी प्रजनन के समय पौधों के कटे भागों पर आक्सिन के छिड़काव से शीघ्र अपस्थानिक (extrinsic) जड़ें निकल आती हैं। फलस्वरूप नये पौधों का जन्म हो जाता है।
2. घावों को भरने में – पौधों के कटे या क्षतिग्रस्त भागों पर ट्राउमैटिक नामक ऑक्सीन हार्मोन के छिड़काव से कोशिका विभाजन की दर बढ़ जाती है फलस्वरूप कटे भाग के घाव शीघ्र भर जाते हैं।
3. आलू, प्याज का संरक्षण, आलू, प्याज, अदरख आदि के ऊपर ABA के छिड़काव से सुसुप्ता अवस्था को बढ़ा देता है। फलस्वरूप इनमें शीघ्र अंकुरण नहीं होता और अधिक दिनों तक सड़ने से सुरक्षित रहते हैं। फसल को नष्ट करने वाली अवांछनीय घासों को ऑक्सीन के छिड़काव द्वारा नष्ट कर दिया जाता है लेकिन फसलों को कोई क्षति नहीं होती तथा पैदावार बढ़ जाती है।
4. पार्थेनोकार्पी में।
5. पत्ते तथा फलों को झड़ने से रोकने में।
6. बिना मौसम फल उत्पन्न करने में।
7. बीजांकुरण में।
8. पौधों के पर्व बढ़ाने में।
9. फलों का आकार बढ़ाने में।
10. फूलों का उत्पादन में इनका उपयोग होता है। मुख्य वनस्पति हार्मोन्स के निर्माण-स्थल व कार्य की तालिका नीचे प्रस्तुत है:-
उत्तर :ऑक्सीन ,जिबरेलिन और काईनिन।
1 .c जन्तुओ में प्रतिक्रिया व रासायनिक समन्वय -हार्मोन्स :
उत्तर :हर्मोन्स विशेष प्रकार का कार्बनिक पदार्थ है।
उत्तर :ग्रंथियों को तीन भागो में विभाजित है। 1 .अन्तः स्रावी ग्रंथियाँ 2 .बहिः स्रावी ग्रंथियाँ 3 .मिक्ष्रित ग्रन्थियाँ।
उत्तर :हार्मोन की उतनी ही मात्रा स्रावित होती है जितनी उसकी आवश्यकता होती है। इसकी अधिकता अथवा कमी का प्रत्यक्ष प्रभाव शरीर पर दृष्टिगोचर होता है। इन ग्रन्थियों का स्राव हार्मोन्स (Chemicals) कहलाता है
उत्तर :सीधे रक्त के साथ शरीर के उन भागों में पहुँचा दी जाती हैं। जहाँ इनकी आवश्यकता होती है। चूँकि अन्तःस्राव के स्थानान्तरणं हेतु कोई नलिका (pipe) नहीं होती है, इसलिए अन्तःस्रावी ग्रन्थियों को निलिका विहीन ग्रन्थियाँ (ductless organs) कहते हैं; जैसे-पीयूष ग्रन्थि।
उत्तर :कुछ ग्रन्थियाँ अपने स्त्राव (discharge) को विशेष नलिकाओं द्वारा शरीर के आवश्यक भागों में छोड़ देते हैं। इन ग्रन्थियों को बहिःस्रावी ग्रन्थियाँ (exocrine organs) कहते हैं; जैसे-यकृत, लार ग्रन्थि इत्यादि
उत्तर :अन्तःस्रावी तथा बहिःस्रावी दोनों प्रकार की ग्रन्थियों का कार्य करने वाली ग्रन्थियाँ मिश्रित (blended) कहलाती हैं। जैसे अग्नाशय
उत्तर :हार्मोन्स को रासायनिक दूत (substance courier) की संज्ञा दी जाती है
उत्तर : हार्मोन्स कार्बनिक यौगिक के रूप में विभिन्न रासायनिक क्रियाओं को प्रभावित करते हैं। इसलिए इन्हें रासायनिक नियामक (synthetic co-ordinator) कहा जाता है।
उत्तर :अधिकांशतः हार्मोन्स अपने उत्पत्ति स्थल से दूर स्थित कोशिकाओं की क्रियाओं को प्रभावित एवं नियंत्रित करते हैं परन्तु कुछ ऐसे भी हार्मोन्स होते हैं जो जहाँ उत्पन्न होते हैं वहीं पर अपनी क्रिया-प्रतिक्रिया अथवा निष्क्रियता का प्रभाव दर्शाते हैं। ऐसे हार्मोन्स, को स्थानीय हार्मोन्स (nearby chemicals) कहते हैं।
उत्तर :परिभाषा (Definition): हार्मोन शब्द की उत्पत्ति ग्रीक शब्द hormao अथवा hormacin से हुई है जिसका अर्थ प्रेरित करना (to stir to action) होता है। सर्वप्रथम 1905 ई० में बेलिस (Bayliss) तथा स्टारलिंग (Starling) ने हार्मोन की व्यख्या की है।
“अन्तःस्रावी ग्रन्थियों द्वारा स्स्रावित विशेष प्रकार के कार्बनिक पदार्थ जो समस्त जैव रासायनिक क्रियाओं के नियंत्रण, नियमुत्र एवं सामंजस्य में सहायक होते हैं, हार्मोन्स कहलाते है। ये क्रिया के समाप्ति के बाद नष्ट हो जाते है।

.हर्मोन्स की विशेषता लिखो।
उत्तर :हार्मोन्स की विशेषताएँ (Qualities of Chemicals): हार्मोन्स की कुछ अग्रलिखित विशेषतायें होती हैं-1. हार्मोन्स कम अणुभार वाले जटिल कार्बनिक यौगिक हैं जो पानी में अतिघुलनशील होते हैं। 2. ये प्रायः प्रोटीन प्रकृति के होते हैं। परन्तु इनकी प्रकृति स्टेरॉयड, पॉली पेप्टाइड इत्यादि प्रकार की होती है। 3. ये विशेष प्रकार के कार्बनिक पदार्थ अन्तः स्त्रावी ग्रन्थियों द्वारा स्स्रावित किये जाते हैं तथा उत्पत्ति स्थान से दूर के अंगों की क्रियाओं को प्रभावित करते हैं। 4. हार्मोन रासायनिक दूत का कार्य करते हैं। 5. ये जिन कोशिकाओं में उत्पन्न होते हैं वहाँ कोई प्रभाव नहीं डालते।
.हर्मोन्स के कार्य :
उत्तर :हार्मोन्स के कुछ कार्य निम्न हैं-(a) हार्मोन्स कोशिका विभाजन (cell division) तथा वृद्धि (development) में सहायता पहुँचाते हैं। (b) इनके द्वारा मेटाबॉलिक क्रियाएं नियंत्रित होती हैं। (c) ये जैविक क्रियाओं के मध्य समन्वय स्थापित करते हैं।
उत्तर : स्थिति (Position)- यह सबसे छोटी अन्तः स्त्रावी ग्रन्थि है जिसका वजन 500mg (0.5gm) होता है। यह ग्रन्थि मस्तिष्क के नीचे स्फेनवाइड हड़ियों (sphenoid bone) से बने सेलाटर्सिया (sellaturcia) नामक गर्त में स्थित रहती है। यह तीन पिण्डों में बंटी रहती है- (1) अग्रपिण्ड (Anterior lobe or adenohypothysis) (ii) मध्यपिण्ड (Midlobe) – यह केवल शिशुकाल में ही क्रियाशील रहता है, प्रौढ़ अवस्था में निष्क्रिय हो जाता है। (iii) पश्च पिण्ड (Posterior lobe or Neurohypophysis) I
ACTH –Adrenocorticotrophic Hormone
TSH-Thyroid Stimulating Hormone
GTH-Gonadotrophic Hormone
FSH-Follicle Stimulating Hormone
LH-Luteinising Hormone
LTH-Lyutio Tropic Hormone
ADH-Anty dauretic hormone
GH-Groth Hormone
.एडिनो कार्टिकोट्राफिक हार्मोन ACTH (Adrenocorticotrophic Chemical):-
उत्पत्ति स्थान –अग्र पिट्यूटरी ग्रन्थि।
प्रकृति- प्रोटीन जातीय।
कार्य – (I) यह एड्रिनल कार्टेक्स की वृद्धि को नियंत्रित करता है। (ii) एड्रिनल कार्टेक्स के स्त्राव को नियंत्रित करता है।
कमी से होने वाली प्रभाव –कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता लेकिन एडीसन रोग (Addisions sickness) हो जाता है। जिससे प्रजनन क्षमता कम हो जाती है। अधिकता (Hypersecretion) – कूशि वर्ण का रोग हो जाता है।
• थाइराइड स्टिमुलेटिंग हार्मोन (Thyroid Animating Chemical, TSH)
उत्पत्ति स्थान-अग्र पिट्यूटरी ग्रन्थि
प्रकृति (Nature) – जल में घुलनशील ग्लाइको प्रोटीन है।
कार्य (Capability) – (I) यह थायराइड ग्रन्थि के सामान्य वृद्धि को नियंत्रित करता है। (ii) यह थाइराक्सीन (Thyrox-ine) हार्मोन के संश्लेषण में सहायता करता है। (iii) आयोडिन चयापचय पर नियंत्रण करता है।
कमी (Hyposecretion) – थायराइड ग्रन्थि का आकार छोटा हो जाता है तथा चयापचयी क्रियाओं की दर घट जाती है। अधिकता (Hypersecre-tion) – थाइराइड ग्रन्थि का आकार बढ़ जाता है तथा metabolic क्रियाओ दर बढ़ जाती है।
• गोनेडोट्रफिक हार्मोन या गोनेडोट्राफिज्म – यह एक ट्राफिक हार्मोन है जो जननांगों को प्रभावित करता है। यह दो प्रकार का होता है-
(a) FSH फालिकल स्टिमुलेटिंग हार्मोन (Follicle Invigorating Chemical) – घुलनशील प्रोटीन प्रकृति का यह हार्मोन पीयूषग्रंथि के अग्रपिण्ड द्वारा स्स्रावित होता है तथा मादा के अण्डाशय (ovary) के वृद्धि को नियंत्रित करता है तथा बृष्ण (पुरुषों में) sperm के निर्माण में सहायक होता है।
(b) LH ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन (Luteinising Chemical) – इस हार्मोन को इण्टरस्टिशियल स्टीमूलेटिंग हार्मोन भी कहते हैं। ग्लाइको प्रोटीन प्रकृति का यह हार्मोन मादा में कारपस ल्यूटियम (corpus lutium) के ऊतकों की वृद्धि करता है। तथा पुरुषों में वृष्ण द्वारा टेस्टोस्टेरॉन नामक हार्मोन के स्राव में सहायक होता है। गोनैडोट्रॉपिक हॉर्मोन की कमी के कारण गौण लैंगिक लक्षणों का विकास नहीं हो पाता तथा अधिकता से मनुष्यों में हृदम लैंगिक लक्षणों का विकास कम उम्र में हो जाता है।
• ल्यूटिओ ट्रॉपिक हार्मोन (LTH)- इसका अन्य नाम PH (प्रोलैक्टिन हार्मोन) अथवा लैक्टोजेनिक हार्मोन भी है। यह प्रोटीन होता है एवम् कार्पस ल्यूटियम को बनाये रखने तथा प्रोजेस्टेरॉन के स्त्राव को नियमित रखने में सहायक है। स्तन को का वृद्धि के साथ-साथ दूध के स्त्राव को बनाये रखता है।
• एण्टी बाईयूरेटिक हार्मोन (ADH) – इस हार्मोन को पिट्रेसिन (pitressin) अथवा वेसोप्रेसिन (vasopressin) के नाम से भी जानते हैं। पॉलीपेप्टाइड हार्मोन शरीर में जल संतुलन में सहायक है।
• वृद्धि हार्मोन (Development Chemical G.H.)- यह पीयूष ग्रन्धि के अग्रभाग से लावित होता है। इससे शरीर में वृद्धि होती है। कमी का प्रभाव (बौनापन) इसकी कमी से बच्चों में वृद्धि रुक जाती है जो लैंगिक रूप से कम विकसित होते हैं। अधिकता का प्रभाव (लम्बापन) इसके स्राव के बढ़ जाने से जिगैन्टीज्म हो जाता है जिससे उसकी वृद्धि (लम्बाई में) अधिक बढ़ जाती है और बच्चों में बौनापन आ जाता है। वयस्कों में इसकी अधिकता से एक्रोमेलैगी नामक रोग हो जाता है। इससे हाथ-पैर तथा निचले जबड़े तथा होंठ मोटे हो जाते हैं।
पिट्यूटरी हार्मोन का व्यवहारिक उपयोग (Viable use of Pituitary chemical)- पिट्यूटरी हार्मोन का टीका लगा कर, दूध देने वाले पशुओं से दूध का अधिक उत्पादन किया जाता है। मादा तथा नर मछलियों में इस हार्मोन का टीका (Infusion) लगाकर कृत्रिम प्रजनन की क्रिया कराई जाती है।
B. थायराइड ग्रन्थि (Thyroid organ) : स्थिति (Position) – इस ग्रन्थि का वजन लगभग 20 से 25 gm. होता है। श्वसन नली के दोनों ओर तथा स्वर-यंत्र के नीचे स्थित होती है। यह ग्रंथि द्विपिण्डक (Bilobed) होती है। इसकी आंतरिक यह बनावट घनाकार कोशिकाओं से निर्मित फोलिकल (Follicles) द्वारा होती है जिसके अन्दर एक प्रकार का प्रोटीन जातीय द्रव भरा रहता है जिसे कोलॉयड (colloid) कहते हैं। थायराइड ग्रन्थि द्वारा तीन हार्मोन का स्त्राव होता है-(I) थाइराक्सिन (Thyroxine) (ii) ट्राई आयडोथाइरोनिन (Tri-lodothyronine (iii) थाइरोकैलसिटोनिन (Thy-rocalcitonin)
थाइराक्सिन का उत्पति स्थान – थाइराइड प्रन्थि
प्रकृति (Nature) – आयोडिन युक्त पोटीन (Iodinated de rivatives of thyrosin) एक आवश्यक एमिनो एसिड है।
कार्य (Capability)- (I) यह शरीर में होने वाली सभी मेटाबोलिक के क्रियाभों का नियंत्रण करती है। इसकी उपस्थिति में कोशिकाएं अधिक मात्रा में ०, का उपयोग करने लगती हैं तथा अधिक ऊर्जा मुक्त होती है। (ii) यह रक्त में शर्करा की मात्रा को बढ़ा देता है लेकिन सीरम (serum), कोलेस्टरोल (Cholesterol) तथा फास्फोलिपिड की मात्रा कम कर देता है। (iii) यह शर्करा, मोटीन तथा वसा के पाचन में सहायता करता है। (iv) यह हड्डियों, पेशियों, लैंगिक (sexual) तथा मानसिक (mental) वृद्धि को नियंत्रित करता है। (v) यह RBC के निर्माण में सहायता करता है। इसकी कमी से एनेमिया (sickliness) हो जाता है।
कमी (Hyposecretion)- इस हार्मोन की कमी से बच्चों में क्रिटिनिज्म (Cretinism) तथा वयस्कों में मिक्सोडिमा (Mexoedema) तथा घेघा (Goiter) नामक रोग हो जाता है।
अधिकता (Hypersecretion) – इस हार्मोन की अधिकता से इक्सोप्थैल्मिक ग्वाइटर (Exophthalmic goiter) or ग्रेवस रोग (Grave’s infection) हो जाता है।
क्रेटिनिज्म (Cretinism) – थाइराक्सिन की कमी के कारण बच्चों की वृद्धि रुक जाती है। बुद्धि जड़ हो जाती है। यौर सक्षण का विकास नहीं हो पाता। पेट निकल जाता है तथा आधार चयापचयी दर (Basal Metabolic Rate) कम हो जाता है।
मिक्सोडिमा (Mexoedema) – थाइराक्सिन हार्मोन की कमी के कारण युवकों में आंखें तथा मुंह फूल जाता है। बाल (Hair) झड़ने लगता है, गले की आवाज मोटी हो जाती है। लैंगिक (Sexual) प्रवृति घट जाती है। BMR कम हो जाता है। स्मृति पर दे जाता है तथा रक्त में शर्करा की मात्रा घट जाती है। त्वचा के नीचे वसा का जमाव होने लगता है जिससे त्वचा मोटी तथा खुरदरी हो जाती है।
ग्वाइटर (Goiter) – थाइराक्सिन की कमी से आयोडिन की मात्रा कम हो जाती है। आयोडिन की कमी से थाइराइड ग्रन्थि फूल कर बाहर की ओर निकल जाती है।
इक्सोपथैल्मिक ग्वाइटर (Exophthalmic goiter) – थाइराक्सिन हार्मोन की अधिकता से थाइराइड ग्रन्थि बढ़ जाती है तथा गला फूल जाता है। आँखें बाहर निकल आती हैं। वसा का जमाव पलकों के नीचे होने लगता है जिससे पलकें मोटी ते जाती है। शरीर का वजन घटने लगता है। हृदय की गति बढ़ जाती। रक्त में शर्करा की मात्रा बढ़ जाती है।
उत्तर :अग्न्याशय: स्थिति- यह पेट के नीचे और ग्रहणी के ‘सी’ आकार की आंतरिक वक्रता के बीच स्थित है। इसमें अंतःस्रावी और बहिःस्रावी दोनों ग्रंथियाँ होती हैं। अग्नाशयी रस बहिःस्रावी ग्रंथियों द्वारा स्रावित होता है। लैंगरहैंस के आइलेट्स अंतःस्रावी ग्रंथियों के रूप में मौजूद होते हैं। लैंगर हंस के द्वीप – इसमें दो प्रकार की कोशिकाएँ मौजूद होती हैं जिन्हें क्रमशः a-कोशिका और ß-कोशिका कहा जाता है। a-cell द्वास ग्लूकोगान (glucogon) तथा ß-cell द्वारा इन्सुलिन (insulin) हार्मोन (Chemical) का स्त्राव होता है।
उत्तर :प्रकृति : प्रोटीन जातीय।
कार्य (Capability) : (1) इन्सुलिन रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित करता है। (ii) यह रक्त में प्रोटीन की मात्रा के सश्लेषित कर ग्लाइकोजनेसिस (glycogenesis) को रोकता है। (ii) यह रक्त में कोलेस्ट्राल (cholesterol) की मात्रा के नियंत्रित करता है। लीवर में किटोन के निर्माण को रोकता है।
कमी (Hypo discharge) – इन्सुलीन की कमी से लीवर में संचित ग्लूकोज कोशिकाओं में नहीं पहुँच पाता तथ उसकी आक्सीकरण (oxidation) नहीं हो पाता, जिससे रक्त में शर्करा की मात्रा बढ़ जाती है। इस घटना को हाइपर ग्लेसेमिय (Hyper glycemia) कहते हैं। रक्त में ग्लूकोज की सामान्य मात्रा (180 mg./100ml.) से बढ़ जाती है, तो ग्लूकोज मूत्र के साथ बाहर निकलने लगता है जिसे ग्लाइकोसुरिया कहते हैं। हाइपोग्लाइसेमिया (Hypoglycemia) तथा ग्लाइकोसुरिय (glycosuria) के संयुक्त रूप को डायबिटिज मेलिटस (diabetes mellitus) कहते हैं।
लिंग हार्मोनों का स्त्राव जनन ग्रंथि से होता है और ये हमारे शारीरिक विकास और स्तंभना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये हार्मोन जैसे कि ओइस्ट्रोजन, प्रोजेस्टोरोन, और टेस्टोस्टेरोन, पुरुषों और महिलाओं में अलग-अलग मात्राओं में पाए जाते हैं।
1. ओइस्ट्रोजन (Estrogen) – यह महिलाओं में प्रमुख हार्मोन है और उनके शारीरिक विकास में विशेष भूमिका निभाता है। इसकी कमी से महिलाओं में मस्तिष्क और स्तनों का विकास प्रभावित हो सकता है, साथ ही मासिक चक्र और गर्भनाली का सम्मान भी हो सकता है।
2. प्रोजेस्टोरोन (Progesterone) – यह हार्मोन गर्भाशय में गर्भाधान और बालन रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी कमी से गर्भाशय में संशोधित नियमित रहने की क्षमता कम हो सकती है।
3. टेस्टोस्टेरोन (Testosterone) – यह पुरुषों में प्रमुख हार्मोन है और उनके लैंगिक विकास और स्त्री लक्षणों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी कमी से पुरुषों में नपुंसकता गुण आ सकता है और लैंगिक विकास में देरी हो सकती है।
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