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वृंद के दोहे
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  ✍️ पाठ–1 : वृंद के दोहे

📌 कवि का जीवन परिचय

प्रश्न: वृंद कौन थे? उनका जीवन परिचय लिखिए।
उत्तर:
वृंद का पूरा नाम वृंदावन था। उनका जन्म लगभग 1643 ई. में हुआ। उनके पूर्वज बीकानेर के रहने वाले थे, लेकिन उनका जन्म मेड़ता में हुआ।
वे ब्राह्मण परिवार से थे और बचपन से ही बहुत बुद्धिमान थे।

उन्होंने काशी में रहकर व्याकरण, वेदांत, गणित, साहित्य और दर्शन का अध्ययन किया।
वे मुगल बादशाह औरंगज़ेब के दरबार में कवि थे और उसके पुत्र के शिक्षक भी रहे।

प्रमुख रचनाएँ:

  • बारहमासा
  • नयन पच्चीसी
  • पदम पच्चीसी
  • यमक सतसई

📖 दोहे, संदर्भ, प्रसंग, व्याख्या


🌿 दोहा (1)

नीकी पै फीकी लगे, बिन अवसर की बात।
जैसे बरनत जुद्ध में, नहि सिंगार सुहात।।

✍️ संदर्भ

यह दोहा कवि वृंद द्वारा रचित है।

📖 प्रसंग

कवि यहाँ उचित समय के महत्व को बता रहे हैं।

💡 व्याख्या

कवि कहते हैं कि अच्छी बात भी अगर गलत समय पर कही जाए तो बुरी लगती है।
जैसे युद्ध के समय श्रृंगार (सजना-संवरना) अच्छा नहीं लगता।


🌿 दोहा (2)

जाही ते कछु पाइये, करिये ताकी आस।
रोते सरकर पर गये, कैसे बुझत पिआस।।

💡 व्याख्या

हमें उसी से उम्मीद करनी चाहिए जिससे कुछ मिल सके।
समुद्र में जाकर रोने से प्यास नहीं बुझती।


🌿 दोहा (3)

अपनी पहुँच विचारि कै, करतब करिये दौर।
तेते पाँव पसारिये जेते लांबी सौर।।

💡 व्याख्या

हमें अपनी क्षमता के अनुसार काम करना चाहिए।
जितनी चादर हो, उतने ही पैर फैलाने चाहिए।


🌿 दोहा (4)

विद्या धन उद्यम बिना, कहा जु पार्दै कौन।
बिना बुलाये ना मिलै, ज्यों पंखा की पौन।।

💡 व्याख्या

बिना मेहनत के विद्या नहीं मिलती।
जैसे बिना पंखा चलाए हवा नहीं मिलती।


🌿 दोहा (5)

सबै सहायक सबल को, कोई न निबल सहाय।
पवन जगावत आग को, दीपहि देत बुझाय।।

💡 व्याख्या

सब लोग ताकतवर का साथ देते हैं, कमजोर का नहीं।
जैसे हवा आग को बढ़ाती है और दीपक को बुझा देती है।


🌿 दोहा (6)

कहूं-कहूं गुन ते अधिक, उपजत दोष सरीर।
मधुरी बानी बोलि कै, परत पाजरा कौर।।

💡 व्याख्या

कभी-कभी अच्छाई भी नुकसान कर देती है।
मीठी बोली से भी लोग धोखा खा जाते हैं।


🌿 दोहा (7)

दान दीन को दीजिए, मिटै दरिद की पीर।
औषधि वाको दीजिए, जाके रोग शरीर।।

💡 व्याख्या

दान उसी को देना चाहिए जो गरीब हो।
और दवा उसी को देनी चाहिए जो बीमार हो।


🌿 दोहा (8)

दुष्ट न छाड़े दुष्टता, बड़ी ठौर हूँ पाय।
जैसे तजत न स्यामला, विष शिव कंठ बसाय।।

💡 व्याख्या

बुरा व्यक्ति अपनी बुराई नहीं छोड़ता, चाहे वह कितनी भी ऊँची जगह पर पहुँच जाए।


🌿 दोहा (9)

प्रभु को चिन्ता सबन की, आपु न करिये ताहिं।
जनम आगरू भरत है, दूध मातृ-धन माहिं।।

💡 व्याख्या

भगवान सबकी चिंता करते हैं, इसलिए हमें चिंता नहीं करनी चाहिए।


🌿 दोहा (10)

कबहूँ प्रीति न जोरिये, जोरि तोरिये नाहिं।
ज्यों तोरे-जोरे बहुरि, गाँठ परति गुन माहिं।।

💡 व्याख्या

प्रेम कभी ज़बरदस्ती नहीं करना चाहिए।
अगर जबरदस्ती जोड़ेंगे, तो बाद में टूटकर गाँठ पड़ जाएगी।


वृंद के दोहे का optional question 


(क ) कवि के अनुसार सब लोग किसकी सहायता करते है?

उत्तर :- सबल की

(ख ) हमें दान किसको देना चाहिए ?

उत्तर :-दीन को

(ग )कौन आग को बड़ा देता है और दीपक को बुझा देता है?

उत्तर :-हँवा

वृंद के दोहे का short  question 

(क )दान किसको देना चाहिए ?

उत्तर :-दान दीन को देना चाहिए।

(ख )विद्या की प्राप्ति के लिए  किया करना चाहिए ?

उत्तर :-विधा की प्राप्ति के लिए कठिन परिश्रम करना चाहिए।

(ग ) मीठी बोली बोलकर  तोता कहाँ कैद हो जाता है ?

उत्तर : –मीठी बोली बोलकर  तोता दिल के पिंजरे में कैद हो जाता है।

(घ ) कौन अपनी दुष्टता नहीं छोड़ता ?

उत्तर :- दुष्ट अपनी दुष्टता नहीं छोड़ता।

(ड. )विष कौन सा गुण नहीं त्यागता है ?

उत्तर :-विष स्यामला गुण नहीं त्यागता है।

वृंद के दोहे का long  question 

(क ) दुष्ट की  दुष्टता का क्या प्रभाव पड़ता है। 

उत्तर :दुष्ट की  दुष्टता का क्या प्रभाव बुरा पड़ता है।  दुष्ट के संगत में   रहने  वाला व्यक्ति भी दुष्ट बन जाता है। और वो कभी भी  अपने दुष्टता के करण कामयाब  नहीं हो पता है। 

(ख ) बिना अवसर की बात कैसी लगती है ?

उत्तर :-बिना अवसर की बात  नीकी पे फीकी लगती है। जिस तरह युद्ध में श्रृंगार  नहीं अच्छा लगता उसी प्रकार अवसर नहीं रहने पर बात अच्छा नहीं लगता। 

(क )   जाही  ते कहु  पाइये ,करिये ताकी आस। वृंद के दोहे

                  रीती सरवर पर गये ,कैसे बुझत पिआस। 

(1 ) पाठ और कवि का नाम बताओ ?

उत्तर :-पाठ का नाम वृंद के दोहे और कवि का नाम वृन्द है। 

(२ ) उपयुक्त अंश की व्याख्या कीजिए ?

उत्तर :-जिस प्रकर किसी प्यासे व्यक्ति की प्यास  सरोवर में जाने से नहीं  बुझती। उसे प्यास बुझाने के लिए जलाशय में जाना होता है। ठीक उसी प्रकर जहाँ से मिलने की उम्मीद हो वहीँ की आश लगाना चाहिए। 

(ख ) विधा धन उधम बिना , कहा  जु पावै कौन। 

                           बिना डुलाये ना मिलै ,ज्यों पंखा की पौन

(१)विधा रूपी धन की प्राप्ति कैसे हो सकती है।

उत्तर :-विधा रूपी धन की प्राप्ति प्रयास और परिश्रम करने से हो सकती है l

(२ ) उपयुक पंक्तियो का भाव स्पष्ट कीजये ?

उत्तर:-उपयुक पंक्तियो में कवि कहते है विधा रुपी धन की प्राप्ति  बिना मेहनत करे नही हो सकती । जिस प्रकर बिना मेहनत करके पंखा हिलाए शारीर को ठंडक नही मिल सकता उसी प्रकार बिना कठिन परिश्रम के विधा रुपी धन की प्राप्ति नही हो सकता ।

(ग) “कबहूँ प्रीति न जोरिये………….. गाँठ परति गुन माहि”

❓ प्रश्न–उत्तर

📌 (i) कवि यहाँ क्या नहीं करने को कहता है?

उत्तर:कवि कहता है कि प्रेम को कभी ज़बरदस्ती नहीं करना चाहिए।


📌 (ii) इस दोहे से कवि क्या संदेश देना चाहता है?

उत्तर:इस दोहे से कवि यह संदेश देना चाहता है कि
सच्चा प्रेम हमेशा स्वाभाविक होता है।
जबरदस्ती का प्रेम टिकाऊ नहीं होता और बाद में संबंध खराब हो जाते हैं।


✨ छोटा सार (Blog Summary)

वृंद के दोहों में जीवन की सच्चाइयाँ बहुत सरल भाषा में बताई गई हैं।
इन दोहों से हमें सीख मिलती है कि:

  • समय का ध्यान रखें
  • मेहनत करें
  • अपनी सीमा में रहें
  • अच्छे लोगों की मदद करें
  • और सच्चा प्रेम करें

(क ) शब्दों के शुद रूप –

सिंगार-श्रृंगर

पिआस –प्यास 

करतब –कर्तव्य 

पोंन –पवन 

सबन –सब 

प्रीति-प्रेम 

(ख ) पर्यावाची शब्द 

अवसर –समय ,संयोग

सरवर-तालाब,जलाशय 

पवन –वायु , हवा 

आग –अनल ,पावक 

शरीर –तन ,देह 

 

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कवि के अनुसार सबलोग सबल की सहायता करते हैं 

विधा रूपी धन की प्राप्ति प्रयास और परिश्रम करने से हो सकती है l

notice :  वृंद के दोहे वृंद ने लिखा है। इस article लिखने के लिए हमने west bengal sylabus के साहित्य मेला  help लिए। हमारा उद्देश्य केवल छात्रों को शिक्षित करना है। Google से गुजारिश है हमारे post को रैंक करे और छात्रों को शिक्षित करने में हमारी मदद करे।

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