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श्रम की प्रतिष्ठा

– आचार्य विनोबा भावे

✍️ लेखक परिचय — आचार्य विनोबा भावे

आचार्य विनोबा भावे का पूरा नाम विनायक राव भावे था। उनका जन्म 11 सितंबर 1895 को महाराष्ट्र के गागोदा गाँव में हुआ था। बचपन से ही वे अत्यंत प्रतिभाशाली थे और उन्होंने गणित तथा संस्कृत का गहन अध्ययन किया। 

विनोबा भावे महात्मा गांधी के विचारों से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने सत्य, अहिंसा, सेवा और सर्वोदय को अपने जीवन का आधार बनाया। वे जीवनभर समाज के गरीब और वंचित लोगों के कल्याण के लिए कार्य करते रहे।

उनका सबसे प्रसिद्ध सामाजिक आंदोलन भूदान आंदोलन था। उन्होंने लोगों से अपनी भूमि का कुछ हिस्सा भूमिहीन लोगों को दान करने की अपील की। उनका उद्देश्य समाज में समानता, सहयोग और भाईचारे की भावना को बढ़ाना था।

विनोबा भावे का मानना था कि प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन में शारीरिक श्रम अवश्य करना चाहिए। वे श्रम को केवल रोजी-रोटी कमाने का साधन नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन का सम्मानजनक और आवश्यक अंग मानते थे।

उनका निबंध ‘श्रम की प्रतिष्ठा’ इसी विचार को सामने रखता है। इसमें उन्होंने समाज में शारीरिक श्रम करने वाले लोगों को कम समझने की मानसिकता का विरोध किया है और प्रत्येक प्रकार के ईमानदार श्रम को सम्मान देने का संदेश दिया है। 


📖 ‘श्रम की प्रतिष्ठा’ का सारांश

आचार्य विनोबा भावे के निबंध ‘श्रम की प्रतिष्ठा’ का मुख्य विषय है—श्रम का सम्मान और श्रमिकों की गरिमा।

लेखक बताते हैं कि हमारा पूरा समाज मेहनत करने वाले लोगों के श्रम पर टिका हुआ है। किसान खेत में अन्न पैदा करता है, मजदूर भवन और सड़क बनाता है तथा अनेक श्रमिक अपने शारीरिक परिश्रम से समाज की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। इसलिए विनोबा भावे ने श्रमिकों की तुलना शेषनाग से की है, जिस पर पृथ्वी टिकी हुई मानी जाती है। 

लेखक समाज की उस मानसिकता की आलोचना करते हैं जिसमें दिमागी काम करने वाले व्यक्ति को अधिक सम्मान और अधिक मूल्य दिया जाता है, जबकि शारीरिक श्रम करने वाले व्यक्ति को कम समझा जाता है। विनोबा जी के अनुसार यह सोच उचित नहीं है।

वे महात्मा गांधी के उदाहरण से बताते हैं कि केवल बौद्धिक कार्य करना पर्याप्त नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुसार कुछ न कुछ शारीरिक श्रम भी करना चाहिए। गांधी जी स्वयं भी चरखा चलाकर श्रम करते थे। 

निबंध में यह विचार भी दिया गया है कि केवल मजबूरी में काम करना ही कर्मयोग नहीं है। सच्चा कर्मयोगी वही है जो अपने काम को ईमानदारी, श्रद्धा और सेवा-भाव से करता है।

लेखक का मानना है कि समाज में श्रम की प्रतिष्ठा तभी स्थापित होगी जब हर व्यक्ति श्रम को सम्मान देगा और हर प्रकार के काम को उचित मूल्य मिलेगा। सभी लोगों को थोड़ा-बहुत शारीरिक श्रम करना चाहिए और जो लोग अपना जीवन शारीरिक श्रम में लगाते हैं, उन्हें सम्मान तथा उचित पारिश्रमिक मिलना चाहिए। (Mis Patna)

⭐ पाठ का मुख्य संदेश

कोई भी ईमानदार काम छोटा नहीं होता। श्रम करने वाला व्यक्ति सम्मान का अधिकारी है। समाज और देश की वास्तविक प्रगति तभी संभव है, जब हम शारीरिक और मानसिक—दोनों प्रकार के श्रम का समान रूप से सम्मान करें।

📌 परीक्षा के लिए याद रखें

  • रचना: श्रम की प्रतिष्ठा

  • लेखक: आचार्य विनोबा भावे

  • विधा: निबंध

  • वास्तविक नाम: विनायक राव भावे

  • मुख्य विषय: श्रम का सम्मान

  • श्रमिक की तुलना: शेषनाग से

  • मुख्य संदेश: हर ईमानदार श्रम सम्माननीय है। 

श्रम की प्रतिष्ठा निबंध का वस्तुनिष्ठ प्रश्न :

(क) ‘श्रम की प्रतिष्ठा’ किस विधा की रचना है?

उत्तर:  निबंध

(ख) श्रम की प्रतिष्ठा के लेखक का नाम है-

उत्तर:  आचार्य विनोबा भावे

(ग) जो शख्स पसीने से रोटी कमाता है वह हो जाता है-

उत्तर: धर्म पुरुष

(घ) आज समाज में किसकी प्रतिष्ठा नहीं है?

उत्तर: (i) श्रम की

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श्रम की प्रतिष्ठा निबंध का लघुत्तरीय प्रश्न :

1. आचार्य विनोबा भावे का वास्तविक नाम क्या था?

उत्तर: आचार्य विनोबा भावे का वास्तविक नाम विनायक राव  भावे था ।

2. पृथ्वी का भार किसके मस्तक पर स्थित है?

उत्तर: पृथ्वी का भार उस व्यक्ति के मस्तक पर स्थित है जो श्रम करता है।

3. किसने मजदूरों को कर्मयोगी कहा है?

उत्तर: आचार्य विनोबा भावे ने मजदूरों को कर्मयोगी कहा है।

4. कौन सा शख्स धर्म-पुरुष हो जाता है?

उत्तर: जो व्यक्ति अपने पसीने की मेहनत से रोटी कमाता है, वह धर्म-पुरुष हो जाता है।

5. अपने समाज में किसकी प्रतिष्ठा नहीं है?

उत्तर: अपने समाज में श्रम की प्रतिष्ठा नहीं है।


श्रम की प्रतिष्ठा निबंध का बोधमूलक प्रश्न :

1. धर्मपुरुष आचार्य विनोबा भावे का  निबंध श्रम की प्रतिष्ठा किसे कहा जाता है?

उत्तर: धर्मपुरुष उस व्यक्ति को कहा जाता है जो ईमानदारी से मेहनत करके अपनी जीविका कमाता है। श्रम का सम्मान और उसकी महत्ता समझने वाला व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में धर्म का पालन करता है।

2. कौन से लोग हैं जो खा सकते हैं और आशीर्वाद दे सकते हैं, काम नहीं कर सकते?

उत्तर: वृद्ध और असहाय लोग, जो अब काम नहीं कर सकते, उन्हें यह विशेषाधिकार प्राप्त है कि वे केवल भोजन ग्रहण कर सकते हैं और दूसरों को आशीर्वाद दे सकते हैं। उनके पास श्रम करने की शक्ति नहीं होती, इसलिए वे समाज में आशीर्वाद देने वाले के रूप में देखे जाते हैं।

3. ‘श्रम की प्रतिष्ठा’ निबंध का सारांश लिखिए।

उत्तर: आचार्य विनोबा भावे के निबंध ‘श्रम की प्रतिष्ठा’ में समाज में श्रम की उपेक्षा के प्रति चिंता व्यक्त की गई है। निबंध में बताया गया है कि हमारे समाज में श्रम को उचित स्थान और सम्मान नहीं दिया जाता, जबकि हर प्रकार का श्रम महत्वपूर्ण है। विनोबा भावे ने इसे कर्मयोग के रूप में देखा और मजदूरों को कर्मयोगी कहा। उन्होंने इसे समाज के विकास का मूल आधार बताया और हमें श्रम के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा दी।

4. ‘श्रम की प्रतिष्ठा’ निबंध से क्या प्रेरणा मिलती है?

उत्तर: इस निबंध से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि हम श्रम का सम्मान करें और यह समझें कि हर कार्य, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, समाज के लिए महत्वपूर्ण है। श्रम का महत्व समझते हुए, हर इंसान को अपने कार्य में गर्व महसूस करना चाहिए और दूसरों के श्रम का भी आदर करना चाहिए।

5. “लेकिन सिर्फ कर्म करने से कोई कर्मयोगी नहीं होता” इसके रचनाकार का नाम बताते हुए पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: इस कथन के रचनाकार आचार्य विनोबा भावे हैं। इसका आशय यह है कि कर्म करना मात्र ही कर्मयोग नहीं कहलाता, बल्कि कर्म में समर्पण, ईमानदारी, और समाज के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण आवश्यक होता है। कर्मयोगी वह है जो निःस्वार्थ भाव से कार्य करता है और अपने श्रम के प्रति पूर्ण निष्ठा रखता है।

भाषा-बोध — उत्तर

1. निम्नलिखित शब्दों का वाक्य में प्रयोग कर लिंग-निर्णय करें

शब्दवाक्य में प्रयोगलिंग
पृथ्वीपृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है।स्त्रीलिंग
कर्मयोगीसच्चा कर्मयोगी अपने कार्य को पूरी निष्ठा से करता है।पुल्लिंग
तालीमअच्छी तालीम मनुष्य के जीवन को बेहतर बनाती है।स्त्रीलिंग
प्रतिष्ठामेहनत करने वाले व्यक्ति की समाज में प्रतिष्ठा होती है।स्त्रीलिंग
मजदूरमजदूर दिन-रात मेहनत करता है।पुल्लिंग
इज्जतहमें सभी लोगों की इज्जत करनी चाहिए।स्त्रीलिंग
व्यवस्थाविद्यालय में पढ़ाई की अच्छी व्यवस्था है।स्त्रीलिंग

2. वाक्य में आए कारक-विभक्तियों का नाम लिखिए

(क) रामायण में भी कहानी है।

उत्तर: ‘में’ — अधिकरण कारक

(ख) सीता का जाना कैसे होगा?

उत्तर: ‘का’ — संबंध कारक

(ग) धर्मराज ने राजसूय यज्ञ किया था।

उत्तर: ‘ने’ — कर्ता कारक

(घ) बूढ़ों को काम से मुक्त रहना ही चाहिए।

उत्तर: ‘को’ — कर्म कारक


3. विपरीतार्थक शब्द

शब्दविपरीतार्थक शब्द
पृथ्वीआकाश
पापपुण्य
नालायकलायक
जीवनमृत्यु
उपकारीअपकारी
उचितअनुचित
नीचउच्च

4. पर्यायवाची शब्द

शब्दपर्यायवाची
पृथ्वीधरती, धरा, भूमि, वसुंधरा
भगवानईश्वर, परमात्मा, प्रभु, परमेश्वर
रातरात्रि, रजनी, निशा, यामिनी
शरीरदेह, तन, काया, अंग
इज़्ज़तसम्मान, प्रतिष्ठा, मान, आदर

⭐ परीक्षा के लिए याद रखें

पृथ्वी → धरती, धरा
भगवान → ईश्वर, प्रभु
रात → रात्रि, निशा
शरीर → देह, तन
इज़्ज़त → सम्मान, मान

notice : श्रम की प्रतिष्ठा class -8 की कविता है। इस article लिखने के लिए हमने west bengal sylabus के सहित्य मेला पुस्तक का help लिए। हमारा उद्देश्य केवल छात्रों को शिक्षित करना है। Google से गुजारिश है हमारे post को रैंक करे और छात्रों को शिक्षित करने में हमारी मदद करे।

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